भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ १५ ] बाद के आचार्य मध्यदेश के। दक्षिण के आचार्यों का नाम अन्त में है। इससे हमारी यह मान्यता बनती है कि त्रिलोचन शिवाचार्य से दक्षिण भारत के पद्धतिकारों की परम्परा प्रारम्भ हुई और वहाँ द्वैतवादी शैवदर्शन की प्रतिष्ठा हुई। त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति के प्रसंग में अद्वैतवादी प्रत्यभिज्ञादर्शन तथा द्वैतवादी शैवसिद्धान्त की चर्चा हमने इसलिये की कि ज्ञान की इन धाराओं के विकास में पूरे देश का योगदान रहा है। त्रिपुरा सम्प्रदाय के विषय में यह विशेष रूप से कहा जा सकता है। त्रिपुरा मत के अन्दर विकसित कश्मीर, केरल और गौडीय सम्प्रदाय की चर्चा हम 'अन्यत्र कर चुके हैं। ये सम्प्रदाय पूरे देश को अपने में समेटे हुए हैं। इस ज्ञान का विकास केवल संस्कृत भाषा में ही नहीं, लौकिक भाषाओं में भी हुआ। "हिन्दू तान्त्रिक एण्ड शाक्त लिटरेचर" नामक ग्रन्थ की चर्चा हम कर चुके हैं। इस ग्रन्थ के दूसरे भाग का शीर्षक है—"तान्त्रिक शाक्त लिटरेचर इन मार्डन इण्डियन लैंग्वेजेज"। इस भाग में बंगला भाषा में रचित शाक्त साहित्य का कुछ विस्तार से तथा मैथिली, राज- स्थानी, व्रजभाषा और पंजाबी भाषा में रचित साहित्य का कुछ संक्षेप में वर्णन किया गया है। सौभाग्य से हमें इधर बड़ोदरा संस्कृत महाविद्यालय के प्राध्यापक शास्त्री श्री उदयन हरिशंकर शुक्ल से गुजराती भाषा में लिखी "शाक्त सम्प्रदाय"२ नामक पुस्तक मिली। इसमें गुजराती भाषा में निबद्ध शाक्त साहित्य पर पूरा एक प्रकरण है (पृ० १११- १४४)। यहाँ नाथ भवान, वल्लभ भट्ट, मीठू, जनो बाई, कवि बाल और नृसिंहाचार्य की जीवनी तथा उनके साहित्य पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। इनमें से मीठू ३हंस- विलास के रचयिता हंसमिट्ठु से अभिन्न हैं। "शाक्त सम्प्रदाय" नामक उक्त ग्रन्थ की यह विशेषता है कि इनमें बौद्ध और जैन धर्म में समाविष्ट शाक्त तत्त्वों की भी अलग अलग प्रकरणों में चर्चा की गई है। बौद्ध धर्म के विषय में लेखक बहुत ही उदारवादी हैं। उनका कहना है कि आधुनिक हिन्दू धर्म की स्वरूप-रचना में बौद्ध धर्म और तत्त्व- ज्ञान की बहुत बड़ी देन रही है (पृ० १५६)। बौद्ध और जैन धर्म के प्रति श्रद्धेय श्री श्री गोपीनाथ कविराज का भी यही दृष्टिकोण रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि बौद्ध और जैन धर्म के साथ हिन्दू धर्म की बात उठाने पर जो विरोध भावना जगती है, वह वैष्णव, शैव या शाक्त सम्प्रदायों की चर्चा करने पर नहीं उठती। इसका कारण यह १. शक्तिसंगम तन्त्र, छिन्नमस्ता चतुर्थ खण्ड, उपोद्घात पृ. ३०-३२, गायकवाड़ ओरियण्टल सिरीज, बड़ोदरा, सन् १९७८ २. श्री फार्बस गुजराती सभा, बम्बई द्वारा सन् १९३२ में प्रकाशित, श्री नर्मदाशंकर देवशंकर महेता द्वारा लिखित इस ग्रन्थ में शाक्त सम्प्रदाय के सिद्धान्तों, गुजरातमें उनके प्रचार और गुजराती साहित्य पर उनके प्रभाव पर विचार किया गया है। ३. यह ग्रन्थ गायकवाड़ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, बड़ोदरा से सन् १९३० में प्रकाशित हो चुका है।