योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १४ ] विकास में सर्वाधिक योगदान कश्मीर का तथा द्वैतवादी शैवदर्शन के संरक्षण और संव- र्धन में दक्षिण का रहा है, किन्तु यह प्रक्रिया एकान्ततः वहीं तक सीमित नहीं रही और कालक्रम से इसका संबन्ध अन्य प्रदेशों से भी रहा है। हम कह सकते हैं कि प्रत्यभिज्ञा दर्शन का प्रथमतः विकास कश्मीर में हुआ और फिर वह पूरे देश में फैल गया। इसी तरह से द्वैतवादी शैवदर्शन का विकास पहले मध्यदेश में हुआ और बाद में यह दक्षिण देश तक सीमित रह गया । १अभिनवगुप्त ने मध्यदेश को सभी शास्त्रों का सदन (घर) बताया है। उसके पूर्वज यहीं से कश्मीर गये थे। द्वैतवादी, द्वैताद्वैतवादी और अद्वैतवादी दर्शनों की प्रवृत्ति उनके अनुसार आमर्दक आदि मठों के माध्यम से हुई। डॉ० वासुदेव विष्णु मिराशी२ ने अनेक शिलालेखों के प्रमाण से द्वैतवादी शैवाचार्यों की मठीय परम्परा पर पर्याप्त प्रकाश डाला है कि उन्होंने किस प्रकार मध्यदेश में प्रसूत इस ज्ञान का सर्वत्र प्रसार किया। डॉ० वी० एस० पाठक३ ने त्रिलोचन शिवाचार्य की सिद्धान्तसारावली के वचन को उद्धृत कर यह बताया है कि यात्रा के प्रसंग में आये काँची के राजा राजेन्द्र चोल इनको काशी से अपने साथ ले गये। द्वैतवादी शैवसिद्धान्त के १८ पद्धतिकारों की सूचना देने वाले दो श्लोक४ उपलब्ध हैं। इनमें प्रारम्भ के कुछ आचार्य कश्मीर के हैं और १. "निःशेषशास्त्रसदनं किल मध्यदेशः" (तन्त्रालोक, ३७।३८) । त्र्यम्बकामर्दकाभिख्यश्रीनाथा अद्वये द्वये । द्वयाद्वये च निपुणाः क्रमेण शिवशासने ।। (तन्त्रा. ३६।१२) २. द्रष्टव्य—प्राच्यविद्या निबन्धावली, खण्ड ४ में प्रकाशित "पतंगशंभु का ग्वालियर संग्रहालय शिलालेख" शीर्षक निबन्ध, पृ. १७२-१८२, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, प्रथम संस्करण, सन् १९७४ ३. राजेन्द्रचोल इत्याख्यश्चोलभूपो महीं वसन् । गङ्गास्नानार्थमागत्य दृष्ट्वा शैवान् वरांस्तदा ।। स्नात्वा प्रतिनिवृत्तः सन् तान् समादाय शैवकान् । स्वराज्ये स्थापयामास शैवाचार्यवरांस्तदा ।। काञ्चीमध्ये चोलभूमौ सर्वत्रैव प्रविस्तराः । शैव कल्ट इन नार्दनं इण्डिया, पृ. ३८ टिप्पणी । ४. उग्रोत्तरज्योतिरथोपसद्यः श्रीरामकण्ठोऽपि च वैद्यकण्ठः । नारायणश्चापि विभूतिकण्ठः श्रीनीलकण्ठोऽपि च सोमशम्भुः ।। ईशानशम्भुर्हृदयादिना स्याद् विरञ्चिवैराग्यकयुग्मवाच्यौ । ज्ञानस्त्रिणेत्रो बहुणेश्वरी ज्ञावित्यादयस्ते स्युरघोरशम्भुः ।। द्रष्टव्य—शैवभूषण ।