योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १३ ] संकेतपद्धति के हो सकते हैं। यह विषय भी टिप्पणियों में अंकित किया गया है। १ज्ञानकारिका डॉ० प्रबोधचन्द्र बागची के कौलज्ञाननिर्णय के संस्करण में समाविष्ट है। वेदरहस्य के नाम से उपनिषद् के वचन उद्धृत हैं और महाकवि के नाम से कालिदास के रघुवंश और कुमारसंभव के। त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति के विषय में शिवानन्द का कहना है कि पहले इसकी उत्पत्ति २कश्मीर में हुई, किन्तु कश्मीरी विद्वान् जयरथ३ कहते हैं कि ईश्वरशिव और विश्वावर्त प्रथमतः इस सिद्धान्त को कश्मीर ले आये। ४हम बता चुके हैं कि लघुस्तव(स्तुति) के रचयिता धर्माचार्य भृगुकच्छ के निवासी थे और (त्रिपुरीसुन्दरी)- दण्डक५ के कर्ता दीपकनाथ के प्रभाव को राजा भोज ने देखा था। जयरथ ६दीपक- नाथ को नि० षो० का प्रथम व्याख्याकार मानते हैं। हमारा विचार है कि गुजरात और मध्यप्रदेश से यह सम्प्रदाय कश्मीर में पहुँचा और फिर वहाँ से दक्षिण देश में। हम देखते हैं कि दक्षिण देश के निवासी गुरुनाथपरामर्श के रचयिता मधुराज योगी अभिनवगुप्त के जीवनकाल में ही कश्मीर पहुँचे थे। वे वहाँ से अर्जित ज्ञान को दक्षिण में ले गये और बाद में दक्षिण में इस ज्ञान का विस्तार हुआ। दक्षिण के शिवानन्द आदि आचार्य अपने को धर्माचार्य, दीपकनाथ आदि सिद्धों की परम्परा से प्राप्त ज्ञान, जो कि ओघ या ओवल्ली के नाम से जाना जाता है, उत्तराधिकारी मानते हैं। लगता है यह परम्परा उनको कश्मीर से प्राप्त हुई। इसीलिये वे इस सम्प्रदाय की उत्पत्ति कश्मीर में मानते हैं। पुण्यानन्द और अमृतानन्द भी शिवानन्द, विद्यानन्द आदि की परम्परा में आते हैं। अतः इनकी स्थिति दक्षिण देश में ही माननी चाहिये, कश्मीर में नहीं। पुण्यानन्द और अमृतानन्द को कश्मीरी मानने की मान्यता का पुनरीक्षण अपेक्षित है। आज अद्वैतवादी शैवदर्शन को कश्मीर से तथा द्वैतवादी शैवदर्शन को दक्षिण से जोड़ने की प्रवृत्ति काम कर रही है। यह सही है कि अद्वैतवादी प्रत्यभिज्ञा दर्शन के १. दीपिका (पृ. ३२३) में उद्धृत “पिण्डे मुक्ताः” आदि श्लोक ज्ञानकारिका (११४-५) का बताया गया है, किन्तु यह वहाँ उपलब्ध नहीं है। २. "सम्प्रदायस्य कश्मीरोद्भूतत्वात्" (ऋजुविमर्शिनी, पृ. ११४)। ३. "वस्तुतो ह्यस्य दर्शनस्यैतदेवाचार्यद्वयं कश्मीरेष्ववतारकम्" (वाम. विव., पृ. ४८)। ४. द्रष्टव्य—आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ. ८६-८७ ५. “भोजदेवदृष्टचमत्कारो महादेशिकप्रवरः श्रीमान् दीपकाचार्यो दण्डककर्ता” (ऋजु. पृ. २२३)। ६. पृ. ८ की पांचवी टिप्पणी देखिये।