योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १२ ] अभियुक्तवचन के अन्तर्गत दीपिका में शिवानन्द के सुभगोदय, सुभगोदयवासना और सौभाग्यहृदय स्तोत्र¹ के वचन, प्रपंचसार, भट्ट गंगाधर, कुलार्णव, अम्बास्तव, काव्यप्रकाश, परापंचाशिका, भास्कररायसंमत नित्याषोडशिकार्णव तथा उद्याकरपद्धति के वचन उद्धृत हैं। भास्करराय नि० षो० के पंचम पटल के अन्त में कुछ अधिक श्लोकों का सन्निवेश कर उनकी व्याख्या करते हैं। ऐसे स्थलों पर हमने टिप्पणियाँ दी हैं। इन वचनों की ही तरह अमृतानन्द कुलार्णव और परापंचाशिका के वचनों को भी अभियुक्त वचन मानते हैं। स्पष्ट है कि उन्होंने इन वचनों को कुलार्णव तन्त्र से न लेकर किसी अभियुक्त द्वारा रचित ग्रन्थ से लिया है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि परापंचा- शिका के कर्ता आद्यनाथ कोई व्यक्ति है, शिव नहीं। परापंचाशिका का यहाँ (पृ. ३३३) उद्धृत एक श्लोक परापंचाशिका की किसी भी मातृका में नहीं मिलता। अस्मदुक्त शब्द से अमृतानन्द ने अपने ग्रन्थ सौभाग्यसुभगोदय, चिद्विलासस्तव और तत्त्वविमर्शिनी को उद्धृत किया है। आगमशास्त्र और चतुःशतीशास्त्र के नाम से यहाँ नित्याषोडशिकार्णव उद्धृत है। आगमान्तर से दीपिकाकार एक जगह (पृ० ३२९) शारदातिलक का ग्रहण करते हैं। अन्यत्र वे किस आगम को लेते हैं, इसका पता नहीं चलता। तन्त्रान्तर के नाम से उन्होंने कुसुमांजलिकारिका, न्यायभाष्य, दशरूपक, ब्रह्मसिद्धि, शारदातिलक, व्याकरणशास्त्र तथा सर्वमङ्गलाशास्त्र के वचनों को उद्धृत किया है। न्यायभाष्य का वचन यहाँ चार बार उद्धृत है। पृ० ३३२ का उद्धरण कुछ लम्बा है और इसका आगे वाला अंश वहाँ उपलब्ध नहीं है। शारदातिलक के दो वचन यहाँ उद्धृत हैं। इससे ज्ञात होता है कि शारदातिलक की रचना अमृतानन्द से पहले हो चुकी थी। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अमृतानन्द शारदातिलक को आगमान्तर अथवा तन्त्रान्तर के नाम से उद्धृत करते हैं, अतः वह श्रीशास्त्र का ग्रन्थ नहीं हो सकता, जैसा कि ²कुछ लोगों का मानना है। निघण्टु के नाम से दो वचन अमरकोश के हैं। बाकी एक वचन किस कोश का है, हम पता नहीं पा सके। कुछ अन्य उद्धरणों के भी मूलस्थान की खोज पाने में हम असफल रहे हैं। प्रमाणवचन कहाँ के हैं, इसका भी हम पता नहीं चला सके, किन्तु प्रामाणिकवचन के अन्तर्गत शिवानन्द का सौभाग्यहृदयस्तोत्र, स्तोत्रावली, भास्कररायसंमत नित्या- षोडशिकार्णव, कुलार्णव और ज्ञानकारिका ? के श्लोक उद्धृत हैं। स्तोत्रावली का वचन भट्ट उत्पल की शिवस्तोत्रावली में उपलब्ध नहीं हुआ। भास्कररायसंमत नि० षो० तथा कुलार्णव के विषय में ऊपर लिखा जा चुका है। हमारा अनुमान है कि ये वचन १. शिवानन्द के इन तीन ग्रन्थों पर किये गये शोध कार्य पर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से दिल्ली की डॉ० मधु खन्ना को अभी डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई है। २. लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग, उपोद्घात, पृ. ४६ की टिप्पणी देखिये।