भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ ११ ] आफ बंगाल” (लेटर्स) के भा. ४, अ. ३, सन् १९३८ पृ. ४५५-४६५ पर छपे अपने “काशीनाथ भट्ट एण्ड हिज वर्क्स” शीर्षक निबन्ध में इसका परिचय दिया है। वे कहते हैं कि इसमें योगिनीहृदय के कुछ चुने हुए श्लोकों की व्याख्या की गई है और यह अमृतानन्द की दीपिका व्याख्या का अनुसरण करती है। १डॉ० तून गान्द्रियान ने भी यही बात कही है। मूल और टीका में स्मृत ग्रन्थ-ग्रन्थकार नि० बो० (पृ० ९९, २५३-२५४) में रुद्रयामल उद्धृत है, किन्तु यो० हृ० में उसका कोई उल्लेख नहीं है। यहाँ महाज्ञानार्णव (२।७७) और विद्यापीठनिबन्ध (२।७८) की चर्चा है। भास्करराय महाज्ञानार्णव को तन्त्रशास्त्र का ग्रन्थ मानते हैं, जब कि अमृतानन्द इस शब्द की यौगिक व्याख्या कर देते हैं। “तान्त्रिक साहित्य” अथवा आफ्रेक्ट की सूची में इस ग्रन्थ का कहीं उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु वामकेश्वरीमत के विवरणकार जयरथ महाज्ञानार्णव को षड्विध मन्त्रार्थ के प्रसंग में (पृ० १३९) उद्धृत करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि महाज्ञानार्णव एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है और इसके आधार पर ही योगिनीहृदय में यह विषय प्रतिपादित है। बहुत संभावना है कि महाज्ञानार्णव के समान ही विद्यापीठ सम्बन्धी तन्त्रों में भी षड्विध अर्थ का प्रतिपादन हो। ‘विद्यापीठ- निबन्ध’ पद का भी अमृतानन्द ने यौगिक अर्थ ही किया है, जब कि भास्करराय विद्यापीठ का काशी, काश्मीर आदि पीठ तथा निबन्ध का ‘ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थ’ अर्थ करते हैं। तन्त्रों के पीठ विभाग की चर्चा हम नि० षो० उपो० (पृ० ५६-५७) में कर चुके हैं। ब्रह्मयामल के प्रमाण से डॉ० प्रबोधचन्द्र बागची ने २योगिनीहृदय आदि को विद्यापीठ से संबद्ध तन्त्र कहा है। विद्या, मन्त्र, मुद्रा और मण्डल के प्रतिपादक भिन्न- भिन्न तन्त्रों की स्थिति उसी प्रकार की होनी चाहिये, जैसे कि बौद्ध तन्त्रों में क्रिया, चर्या, योग और अनुत्तर तन्त्रों की अलग-अलग उपलब्धि होती है। क्षेमराज ने ३‘स्वच्छन्दतन्त्र को चतुष्पीठ महातन्त्र कहा है। इससे ऐसा लगता है कि इन विषयों के स्वतन्त्र तन्त्र-ग्रन्थों के ही समान सिद्धान्त शैवागमों की पद्धति पर सभी विषयों का एक साथ वर्णन करने वाले तन्त्र-ग्रन्थ भी आविर्भूत होने लगे थे। विद्यापीठ से संबद्ध तन्त्रों अथवा निबन्ध ग्रन्थों में महातत्त्वार्थ आदि विषय प्रतिपादित हुए होंगे। यहीं (२।८५) विद्यार्णवगम शब्द प्रयुक्त हुआ है। हमारी दृष्टि में यहाँ भी विद्यापीठ सम्बन्धी आगम ग्रन्थों का उल्लेख है। १. हिन्दू तान्त्रिक लिटरेचर इन संस्कृत, पृ. ६२ की १७ संख्या की टिप्पणी देखिये। २. स्टडीज इन दी तन्त्राज, पृ. १०४-१०५ ३. ‘चतुष्पीठं महातन्त्रम्’ (स्व० तं० १. १) की उद्योत-टिप्पणी देखिये।

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