योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १० ] शिवानन्द इस शब्द का प्रयोग विस्तृत अर्थ में करते हैं। कादिमत ( तन्त्रराज )¹ में ९ नित्यातन्त्रों का उल्लेख किया गया है और उसके टीकाकार ²सुभगानन्दनाथ ने अपनी टीका में इनके नाम दिये हैं। इन ९ नित्यातन्त्रों में सुन्दरीहृदय (योगिनीहृदय) भी एक है। हम समझते हैं कि इन अथवा इनसे भी प्राचीन त्रिपुरा सम्प्रदाय के ग्रन्थों का समावेश वामकेश्वर शास्त्र के नाम से किया जाता होगा, जिनके कि बीच में नित्या- षोडशिकार्णव की विशेष स्थिति मानी जाती होगी। बहुरूपाष्टक की गणना ६४ तन्त्रों में की गई है और विद्यानन्द का कहना है कि चतुःशती शास्त्र (नि० षो०) ³बहुरूपाष्टक शास्त्र का संक्षेप है। बहुरूपाष्टक के विषय में अभी हम नि० षो० उपोद्घात (पृ० २५) में दिये गये विवरण से अधिक कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। फलतः नि० षो० और यो० हृ० की भिन्नता ही माननी पड़ेगी। शिवानन्द के प्रमाण से वामकेश्वर शास्त्र के अन्तर्गत इन दोनों की स्थिति मान सकते हैं, किन्तु उस स्थिति में प्रश्न उठेगा कि नि० षो० से पहले के वामकेश्वर शास्त्र के उस भाग का नाम क्या है ? इस विषय को अभी हमें अनिर्णीत ही छोड़ना पड़ेगा। योगिनीहृदय की टीकाएँ योगिनीहृदय की दो टीकाओं से हम सभी परिचित हैं। संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित हुए योगिनीहृदय के द्वितीय तथा तृतीय संस्करण में इन दोनों टीकाओं का समावेश किया गया है। इनमें से पहली का नाम दीपिका तथा दूसरी का सेतुबन्ध है। दीपिकाकार (पृ० ३) का कहना है कि उनकी टीका से पहले इस पर कोई टीका नहीं लिखी गई थी। भास्करराय ने नित्याषोडशिकार्णव और योगिनीहृदय को एक ही ग्रन्थ मानकर आठ पटलों वाले नित्याषोडशिकार्णव पर सेतुबन्ध व्याख्या लिखी। उनके कथन के अनुसार इस पर अनेक व्याख्याएँ लिखी गई थी (पृ० ८)। यह सही है कि पाँच पटल वाले नित्याषोडशिकार्णव पर अनेक व्याख्याएँ लिखी गईं, किन्तु योगिनी- हृदय पर किसी प्राचीन टीका की उपलब्धि की सूचना हमें अभी तक नहीं मिली है। इन दो टीकाओं के अतिरिक्त तीसरी टीका इस ग्रन्थ पर काशीनाथ भट्ट की है। एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता की ६१४४ संख्या की मातृका का नाम चक्रसंकेत- चन्द्रिका है। डॉ० चिन्ताहरण चक्रवर्ती ने "जर्नल आफ दी रायल एशियाटिक सोसाइटी १. "नित्यानां षोडशानां च नव तन्त्राणि कृत्स्नशः" (१।२) । २. "नवतन्त्राणि सुन्दरीहृदय-नित्याषोडशिकार्णव-चन्द्रज्ञान-मातृकातन्त्र-संमोहनतन्त्र- वामकेश्वर-बहुरूपाष्टक-प्रस्तारचिन्तामणि-मेरुप्रस्ताराख्यानि" ( मनोरमाव्याख्या, पृ. २)। ३. "बहुरूपाष्टकं शास्त्रं संक्षिप्य चतुश्शतीसंख्यापरिमितैर्ग्रन्थैस्तत्सारमुद्धर्तुकाम····" (अर्थरत्नावली, पृ. ४)।