योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ९ ] यह उचित नहीं है। डॉ० ¹तून गान्द्रियान ने इसको सही जगह पर रखा है। नि० षो० के टीकाकारों में ²उन्होंने लक्ष्मण, गौरीकान्त, शंकरानन्दनाथ, श्रीहर्ष दीक्षित आदि के नाम भी गिनाये हैं। यह भी ठीक नहीं है। लक्ष्मण (लक्ष्मीधर) और गौरीकान्त सौन्दर्य- लहरी के और श्रीहर्ष दीक्षित शारदातिलक के टीकाकार हैं, नि० षो० के नहीं। शंकरानन्दनाथ पद्धतिकार हैं। ये ज्ञानार्णव तन्त्र के व्याख्याकार हैं, इस ³उक्ति की भी परीक्षा करनी होगी। डॉ० गान्द्रियान (पृ० १५२) ने बताया है कि इन्होंने अपनी पद्धति ज्ञानार्णव तन्त्र को आधार मानकर लिखी। वामकेश्वर तन्त्र के प्राचीन व्याख्याता दीपक- नाथ हैं, दीपिकानाथ नहीं। योगिनीहृदय और वामकेश्वर तन्त्र डॉ० आन्द्रे पाडु का " 'वामकेश्वरतन्त्रान्तर्गतं योगिनीहृदयम्' "⁴ शीर्षक निबन्ध अभी प्रकाशित हुआ है। जैसा कि शीर्षक से ही ज्ञात होता है, विद्वान् लेखक ने यहाँ यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि नित्याषोडशिकार्णव की तरह योगिनीहृदय भी वामकेश्वर तन्त्र का ही एक भाग है। इसमें उन्होंने दो प्रमुख प्रमाण दिये हैं। पहला शिवानन्द का "मध्ये शास्त्रस्य तस्याऽस्ति नित्याषोडशिकार्णवः" (पृ० ३) यह श्लोक तथा दूसरा योगिनीहृदय के दूसरे संस्करण के प्रथम पटल के अन्त की पुष्पिका का यह वाक्य—"वामकेश्वरतन्त्रयोगिनीहृदयदीपिकायाम्" (पृ. ८९)। यह पाठ उसी संस्करण की ख. मातृका को मान्य नहीं है, तथा अन्य सभी मातृकाएँ ख. मातृका का ही अनुसरण करती हैं। क. मातृका में भी केवल प्रथम पटल की पुष्पिका में यह मिलता है, अतः प्रस्तुत संस्करण में इस पाठ को मान्यता नहीं दी गई है। अमृता- नन्द स्वयं एक जगह लिखते हैं—"वामकेश्वरशास्त्र एवासामुद्धारः, अत्र त्वज्ञातार्थप्रति- पादनपरत्वादस्य शास्त्रस्येति" (पृ० १०६)। इस वाक्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे वामकेश्वर शास्त्र (तन्त्र) से योगिनीहृदय को भिन्न मानते हैं। वामकेश्वर शास्त्र से उनका अभिप्राय चतुःशती शास्त्र (नित्याषोडशिकार्णव) से है। यह विषय उनके ही एक अन्य उद्धरण से भी स्पष्ट हो जाता है—" 'नन्वयं कौलिकार्थो वामकेश्वरतन्त्रे कुत्र सूचितः ?....गणेश (नि० षो० १।१) इत्यत्र सूचितं कौलिकार्थं विवृणोति" (२।५७)। स्पष्ट है कि अमृतानन्द की दृष्टि में नित्याषोडशिकार्णव और योगिनीहृदय दो भिन्न शास्त्र हैं। १. हिन्दू तान्त्रिक एण्ड शाक्त लिटरेचर, पृ. ६७ २. अभिनवगुप्त, पृ. ५७० देखिये । ३. वहीं, पृ. ५६७ देखिये । ४. ऊपर निर्दिष्ट पत्रिका का विशेषांक (पृ. २५१–२५७) द्रष्टव्य ।