भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ ८ ] माना गया है। रुद्रयामल के ही समान उसका यह अंश भी नि० षो० से प्राचीन हो सकता है। त्रिपुरासारसमुच्चय नागभट्ट की विशिष्ट रचना है। इसमें (२।२५) त्रिपुरार्णव का प्रमाण दिया गया है। संभवतः त्रिपुरार्णव की मातृका सरस्वती भवन में विद्यमान है । आजकल उसके बन्द रहने से इस विषय में हम निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कह सकते । विद्यानन्द की ज्ञानदीपविमर्शिनी में उदयाकरपद्धति और त्रिपुरसुन्दरीकल्पलता विशेष रूप से उद्धृत हैं। ऋजुविमर्शिनी में भी यह इसी नाम से उद्धृत है और अर्थरत्नावली में इसको महात्रिपुरसुन्दरीकल्पलता के नाम से याद किया गया है। ज्ञानदीपविमर्शिनी की १नेपाल मातृका में इसको अनन्तभट्टारक की कृति माना है। यहाँ का श्लोक २बड़ोदरा मातृका में अनन्तशक्तिभट्टारक का कहा गया है। दीपिका (२।९६) में उद्धृत ‘कस्तूरीघुसृण’ इत्यादि वचन उदयाकरपद्धति का है। संकेतपद्धति के महत्त्व के विषय में हम ३अन्यत्र लिख चुके हैं। ४लघुस्तव ही नहीं, पूरी पञ्चस्तवी धर्माचार्य की रचना है और त्रिपुर- सुन्दरीदण्डक के रचयिता दीपकाचार्य को ५जयरथ नि० षो० का प्रथम टीकाकार मानते हैं। प्रपञ्चसार में सामान्य तान्त्रिक विषयों का वर्णन करने के बाद पंचायतन पूजा का आरंभ करते हुए सर्वप्रथम नवम पटल में त्रिपुरा पूजा की विधि बतायी गई है । हंस- पारमेश्वर एवं रससारसंग्रह में भी त्रिपुरा सम्प्रदाय में संबद्ध विषय वर्णित हैं। त्रिपुरा सम्प्रदाय के अन्य प्राचीन आचार्यों के विषय में भी ६हम लिख चुके हैं। श्रीकुल (त्रिपुरा सम्प्रदाय) के साहित्य का परिचय देते समय इन सबकी चर्चा अपेक्षित हैं, क्योंकि समय-समय पर प्रादुर्भूत अन्य अनेक आगमों की अपेक्षा इस सम्प्रदाय के प्राचीन स्वरूप और विशेषताओं को समझने के लिये इन ग्रन्थों का अपना महत्त्व है। डॉ० कान्तिचन्द्र७ पाण्डेय ने कौल तन्त्रों की चर्चा के प्रसंग में कुछ नित्या-तन्त्रों की भी चर्चा की है। वहाँ उन्होंने ८ज्ञानार्णव को नित्याषोडशिकार्णव से प्राचीन माना है।


१. द्रष्टव्य—मातृका संख्या ५-४९०४, पत्र ४७ क । २. द्रष्टव्य—मातृका संख्या १९६१, पत्र ३८ क । ३. नित्याषोडशिकार्णव, उपोद्घात, पृ. ४६-४७ ४. आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ. ८६-८७, तन्त्रयात्रा, पृ. ७४ ५. “आ श्रीदीपकनाथतो ह्यगणितैरद्यापि वृत्तिः कृता” (वामकेश्वरीमतविवरण, पृ. ११५) । ६. तन्त्रयात्रा में प्रकाशित "त्रिपुरादर्शनस्यापरिचिता आचार्याः कृतयश्च" शीर्षक निबन्ध देखिये (पृ. ७२-७५) । ७. अभिनवगुप्त एन हिस्टोरिकल एण्ड फिलासफिक्ल स्टडी, पृ. ५६५-५९०, द्वितीय संस्करण, सन् १९६३ देखिये । ८. वही पुस्तक, पूर्वोक्त पृष्ठ देखिये ।