भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

[ ७ ] नीदरलैण्ड के तन्त्रशास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० तून गान्द्रियान और डॉ० संयुक्ता गुप्ता के संयुक्त प्रयास से "हिन्दू तान्त्रिक एण्ड शाक्त लिटरेचर" नामक ग्रन्थ निकला है। इसके तीसरे अध्याय (पृ० ५७-७४) में श्रीकुल शीर्षक के अन्तर्गत त्रिपुरा सम्प्रदाय के ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। अतः यहाँ हम बहुत संक्षेप में कुछ नई बातों की ही चर्चा करेंगे। १श्रीकुल और २कालीकुल नाम के ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है और सम्प्रदाय- विशेष के लिये भी ये शब्द प्रयुक्त हैं। हमारे एक मित्र का कहना है कि श्रीकुल ३पश्चिमा- म्नाय से संबद्ध है, अतः त्रिपुरा सम्प्रदाय के लिये इसका प्रयोग उचित नहीं है, क्योंकि यह दक्षिणाम्नाय से संबद्ध है। विद्यानन्द और अमृतानन्द कहते हैं कि श्रीविद्या ४चारों आम्नायों से संबद्ध है, तो भी दक्षिण आम्नाय के प्रति इसका विशेष अनुराग है। चूँकि श्रीविद्या चारों आम्नायों से संबद्ध है, अतः श्रीकुल शीर्षक के अन्तर्गत त्रिपुरा सम्प्रदाय के ग्रन्थों का परिचय देना हमारी दृष्टि में अनुचित नहीं है। आगे हम गुजराती भाषा में लिखित "शाक्त साहित्य" नामक ग्रन्थ की चर्चा करेंगे। वहाँ भी श्रीकुल और काली- कुल विभाग के अन्तर्गत ग्रन्थों का परिचय दिया गया है। तन्त्रशास्त्र के फ्रांसीसी विद्वान् डॉ० आन्द्रे पाद्यु के इस कथन को हम सही मानते हैं कि शाक्त साहित्य के स्रोतस्, आम्नाय, मत आदि विभाग ५अस्पष्ट हैं। इस सम्प्रदाय के प्राचीन साहित्य के, जो बहुत कुछ अप्रकाशित है, सामने आने पर ही इस विषय में निश्चित रूप से कुछ कहा जा सकता है। लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग के उपोद्घात (पृ० ११) में हमने अनेक नित्या-तन्त्रों के नाम दिये हैं और यथास्थान इनका परिचय भी दिया है। इनमें से अनेक ग्रन्थों को अमृतानन्द ने उद्धृत किया है। नि० बो० उपोद्घात (पृ० ३१-४९) में इनका परिचय दिया जा चुका है। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है उत्तरषट्क । इसको रुद्रयामल का अंश १. द्रष्टव्य - परमार्थसार की योगराजकृत विवृति, पृ. १८६ २. लुप्तागमसंग्रह द्वितीय भाग, उपोद्घात, पृ. २६ द्रष्टव्य । ३. श्रीकुल, श्रीक्रमकुल, श्रीकुलक्रम, श्रीक्रम आदि नामों में अभिहित होने वाला सम्प्रदाय पश्चिमशासन अथवा पश्चिमाम्नाय से संबद्ध है, इसकी सूचना आदिनाथ कृत कुलरत्नोद्योत से मिलती है। कालीकुल उत्तराम्नाय से संबद्ध है। इस विषय में विशेष विचार अपेक्षित है। ४. "इयं च विद्या चतुराम्नायसाधारण्यपि दक्षिणपक्षपातिनी" (अर्थरत्नावली, पृ. ४१), "दक्षिणस्रोतःपक्षपातिन्याः सौभाग्यदेवतायाः" (दीपिका, पृ. १३३-१३४) । ५. श्री गोपालचन्द्र सिंह स्मृत्यंक, ऋतम्, अखिल भारतीय संस्कृत परिषत् पत्रिका, भा. १६-१८, सन् १९८४-८६, पृ. १५१