योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
[ ९ ] यह उचित नहीं है। डॉ० ¹तून गान्द्रियान ने इसको सही जगह पर रखा है। नि० षो० के टीकाकारों में ²उन्होंने लक्ष्मण, गौरीकान्त, शंकरानन्दनाथ, श्रीहर्ष दीक्षित आदि के नाम भी गिनाये हैं। यह भी ठीक नहीं है। लक्ष्मण (लक्ष्मीधर) और गौरीकान्त सौन्दर्य- लहरी के और श्रीहर्ष दीक्षित शारदातिलक के टीकाकार हैं, नि० षो० के नहीं। शंकरानन्दनाथ पद्धतिकार हैं। ये ज्ञानार्णव तन्त्र के व्याख्याकार हैं, इस ³उक्ति की भी परीक्षा करनी होगी। डॉ० गान्द्रियान (पृ० १५२) ने बताया है कि इन्होंने अपनी पद्धति ज्ञानार्णव तन्त्र को आधार मानकर लिखी। वामकेश्वर तन्त्र के प्राचीन व्याख्याता दीपक- नाथ हैं, दीपिकानाथ नहीं। योगिनीहृदय और वामकेश्वर तन्त्र डॉ० आन्द्रे पाडु का " 'वामकेश्वरतन्त्रान्तर्गतं योगिनीहृदयम्' "⁴ शीर्षक निबन्ध अभी प्रकाशित हुआ है। जैसा कि शीर्षक से ही ज्ञात होता है, विद्वान् लेखक ने यहाँ यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि नित्याषोडशिकार्णव की तरह योगिनीहृदय भी वामकेश्वर तन्त्र का ही एक भाग है। इसमें उन्होंने दो प्रमुख प्रमाण दिये हैं। पहला शिवानन्द का "मध्ये शास्त्रस्य तस्याऽस्ति नित्याषोडशिकार्णवः" (पृ० ३) यह श्लोक तथा दूसरा योगिनीहृदय के दूसरे संस्करण के प्रथम पटल के अन्त की पुष्पिका का यह वाक्य—"वामकेश्वरतन्त्रयोगिनीहृदयदीपिकायाम्" (पृ. ८९)। यह पाठ उसी संस्करण की ख. मातृका को मान्य नहीं है, तथा अन्य सभी मातृकाएँ ख. मातृका का ही अनुसरण करती हैं। क. मातृका में भी केवल प्रथम पटल की पुष्पिका में यह मिलता है, अतः प्रस्तुत संस्करण में इस पाठ को मान्यता नहीं दी गई है। अमृता- नन्द स्वयं एक जगह लिखते हैं—"वामकेश्वरशास्त्र एवासामुद्धारः, अत्र त्वज्ञातार्थप्रति- पादनपरत्वादस्य शास्त्रस्येति" (पृ० १०६)। इस वाक्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे वामकेश्वर शास्त्र (तन्त्र) से योगिनीहृदय को भिन्न मानते हैं। वामकेश्वर शास्त्र से उनका अभिप्राय चतुःशती शास्त्र (नित्याषोडशिकार्णव) से है। यह विषय उनके ही एक अन्य उद्धरण से भी स्पष्ट हो जाता है—" 'नन्वयं कौलिकार्थो वामकेश्वरतन्त्रे कुत्र सूचितः ?....गणेश (नि० षो० १।१) इत्यत्र सूचितं कौलिकार्थं विवृणोति" (२।५७)। स्पष्ट है कि अमृतानन्द की दृष्टि में नित्याषोडशिकार्णव और योगिनीहृदय दो भिन्न शास्त्र हैं। १. हिन्दू तान्त्रिक एण्ड शाक्त लिटरेचर, पृ. ६७ २. अभिनवगुप्त, पृ. ५७० देखिये । ३. वहीं, पृ. ५६७ देखिये । ४. ऊपर निर्दिष्ट पत्रिका का विशेषांक (पृ. २५१–२५७) द्रष्टव्य ।
[ १० ] शिवानन्द इस शब्द का प्रयोग विस्तृत अर्थ में करते हैं। कादिमत ( तन्त्रराज )¹ में ९ नित्यातन्त्रों का उल्लेख किया गया है और उसके टीकाकार ²सुभगानन्दनाथ ने अपनी टीका में इनके नाम दिये हैं। इन ९ नित्यातन्त्रों में सुन्दरीहृदय (योगिनीहृदय) भी एक है। हम समझते हैं कि इन अथवा इनसे भी प्राचीन त्रिपुरा सम्प्रदाय के ग्रन्थों का समावेश वामकेश्वर शास्त्र के नाम से किया जाता होगा, जिनके कि बीच में नित्या- षोडशिकार्णव की विशेष स्थिति मानी जाती होगी। बहुरूपाष्टक की गणना ६४ तन्त्रों में की गई है और विद्यानन्द का कहना है कि चतुःशती शास्त्र (नि० षो०) ³बहुरूपाष्टक शास्त्र का संक्षेप है। बहुरूपाष्टक के विषय में अभी हम नि० षो० उपोद्घात (पृ० २५) में दिये गये विवरण से अधिक कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। फलतः नि० षो० और यो० हृ० की भिन्नता ही माननी पड़ेगी। शिवानन्द के प्रमाण से वामकेश्वर शास्त्र के अन्तर्गत इन दोनों की स्थिति मान सकते हैं, किन्तु उस स्थिति में प्रश्न उठेगा कि नि० षो० से पहले के वामकेश्वर शास्त्र के उस भाग का नाम क्या है ? इस विषय को अभी हमें अनिर्णीत ही छोड़ना पड़ेगा। योगिनीहृदय की टीकाएँ योगिनीहृदय की दो टीकाओं से हम सभी परिचित हैं। संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्रकाशित हुए योगिनीहृदय के द्वितीय तथा तृतीय संस्करण में इन दोनों टीकाओं का समावेश किया गया है। इनमें से पहली का नाम दीपिका तथा दूसरी का सेतुबन्ध है। दीपिकाकार (पृ० ३) का कहना है कि उनकी टीका से पहले इस पर कोई टीका नहीं लिखी गई थी। भास्करराय ने नित्याषोडशिकार्णव और योगिनीहृदय को एक ही ग्रन्थ मानकर आठ पटलों वाले नित्याषोडशिकार्णव पर सेतुबन्ध व्याख्या लिखी। उनके कथन के अनुसार इस पर अनेक व्याख्याएँ लिखी गई थी (पृ० ८)। यह सही है कि पाँच पटल वाले नित्याषोडशिकार्णव पर अनेक व्याख्याएँ लिखी गईं, किन्तु योगिनी- हृदय पर किसी प्राचीन टीका की उपलब्धि की सूचना हमें अभी तक नहीं मिली है। इन दो टीकाओं के अतिरिक्त तीसरी टीका इस ग्रन्थ पर काशीनाथ भट्ट की है। एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता की ६१४४ संख्या की मातृका का नाम चक्रसंकेत- चन्द्रिका है। डॉ० चिन्ताहरण चक्रवर्ती ने "जर्नल आफ दी रायल एशियाटिक सोसाइटी १. "नित्यानां षोडशानां च नव तन्त्राणि कृत्स्नशः" (१।२) । २. "नवतन्त्राणि सुन्दरीहृदय-नित्याषोडशिकार्णव-चन्द्रज्ञान-मातृकातन्त्र-संमोहनतन्त्र- वामकेश्वर-बहुरूपाष्टक-प्रस्तारचिन्तामणि-मेरुप्रस्ताराख्यानि" ( मनोरमाव्याख्या, पृ. २)। ३. "बहुरूपाष्टकं शास्त्रं संक्षिप्य चतुश्शतीसंख्यापरिमितैर्ग्रन्थैस्तत्सारमुद्धर्तुकाम····" (अर्थरत्नावली, पृ. ४)।
[ ११ ] आफ बंगाल” (लेटर्स) के भा. ४, अ. ३, सन् १९३८ पृ. ४५५-४६५ पर छपे अपने “काशीनाथ भट्ट एण्ड हिज वर्क्स” शीर्षक निबन्ध में इसका परिचय दिया है। वे कहते हैं कि इसमें योगिनीहृदय के कुछ चुने हुए श्लोकों की व्याख्या की गई है और यह अमृतानन्द की दीपिका व्याख्या का अनुसरण करती है। १डॉ० तून गान्द्रियान ने भी यही बात कही है। मूल और टीका में स्मृत ग्रन्थ-ग्रन्थकार नि० बो० (पृ० ९९, २५३-२५४) में रुद्रयामल उद्धृत है, किन्तु यो० हृ० में उसका कोई उल्लेख नहीं है। यहाँ महाज्ञानार्णव (२।७७) और विद्यापीठनिबन्ध (२।७८) की चर्चा है। भास्करराय महाज्ञानार्णव को तन्त्रशास्त्र का ग्रन्थ मानते हैं, जब कि अमृतानन्द इस शब्द की यौगिक व्याख्या कर देते हैं। “तान्त्रिक साहित्य” अथवा आफ्रेक्ट की सूची में इस ग्रन्थ का कहीं उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु वामकेश्वरीमत के विवरणकार जयरथ महाज्ञानार्णव को षड्विध मन्त्रार्थ के प्रसंग में (पृ० १३९) उद्धृत करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि महाज्ञानार्णव एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है और इसके आधार पर ही योगिनीहृदय में यह विषय प्रतिपादित है। बहुत संभावना है कि महाज्ञानार्णव के समान ही विद्यापीठ सम्बन्धी तन्त्रों में भी षड्विध अर्थ का प्रतिपादन हो। ‘विद्यापीठ- निबन्ध’ पद का भी अमृतानन्द ने यौगिक अर्थ ही किया है, जब कि भास्करराय विद्यापीठ का काशी, काश्मीर आदि पीठ तथा निबन्ध का ‘ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थ’ अर्थ करते हैं। तन्त्रों के पीठ विभाग की चर्चा हम नि० षो० उपो० (पृ० ५६-५७) में कर चुके हैं। ब्रह्मयामल के प्रमाण से डॉ० प्रबोधचन्द्र बागची ने २योगिनीहृदय आदि को विद्यापीठ से संबद्ध तन्त्र कहा है। विद्या, मन्त्र, मुद्रा और मण्डल के प्रतिपादक भिन्न- भिन्न तन्त्रों की स्थिति उसी प्रकार की होनी चाहिये, जैसे कि बौद्ध तन्त्रों में क्रिया, चर्या, योग और अनुत्तर तन्त्रों की अलग-अलग उपलब्धि होती है। क्षेमराज ने ३‘स्वच्छन्दतन्त्र को चतुष्पीठ महातन्त्र कहा है। इससे ऐसा लगता है कि इन विषयों के स्वतन्त्र तन्त्र-ग्रन्थों के ही समान सिद्धान्त शैवागमों की पद्धति पर सभी विषयों का एक साथ वर्णन करने वाले तन्त्र-ग्रन्थ भी आविर्भूत होने लगे थे। विद्यापीठ से संबद्ध तन्त्रों अथवा निबन्ध ग्रन्थों में महातत्त्वार्थ आदि विषय प्रतिपादित हुए होंगे। यहीं (२।८५) विद्यार्णवगम शब्द प्रयुक्त हुआ है। हमारी दृष्टि में यहाँ भी विद्यापीठ सम्बन्धी आगम ग्रन्थों का उल्लेख है। १. हिन्दू तान्त्रिक लिटरेचर इन संस्कृत, पृ. ६२ की १७ संख्या की टिप्पणी देखिये। २. स्टडीज इन दी तन्त्राज, पृ. १०४-१०५ ३. ‘चतुष्पीठं महातन्त्रम्’ (स्व० तं० १. १) की उद्योत-टिप्पणी देखिये।
[ १२ ] अभियुक्तवचन के अन्तर्गत दीपिका में शिवानन्द के सुभगोदय, सुभगोदयवासना और सौभाग्यहृदय स्तोत्र¹ के वचन, प्रपंचसार, भट्ट गंगाधर, कुलार्णव, अम्बास्तव, काव्यप्रकाश, परापंचाशिका, भास्कररायसंमत नित्याषोडशिकार्णव तथा उद्याकरपद्धति के वचन उद्धृत हैं। भास्करराय नि० षो० के पंचम पटल के अन्त में कुछ अधिक श्लोकों का सन्निवेश कर उनकी व्याख्या करते हैं। ऐसे स्थलों पर हमने टिप्पणियाँ दी हैं। इन वचनों की ही तरह अमृतानन्द कुलार्णव और परापंचाशिका के वचनों को भी अभियुक्त वचन मानते हैं। स्पष्ट है कि उन्होंने इन वचनों को कुलार्णव तन्त्र से न लेकर किसी अभियुक्त द्वारा रचित ग्रन्थ से लिया है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि परापंचा- शिका के कर्ता आद्यनाथ कोई व्यक्ति है, शिव नहीं। परापंचाशिका का यहाँ (पृ. ३३३) उद्धृत एक श्लोक परापंचाशिका की किसी भी मातृका में नहीं मिलता। अस्मदुक्त शब्द से अमृतानन्द ने अपने ग्रन्थ सौभाग्यसुभगोदय, चिद्विलासस्तव और तत्त्वविमर्शिनी को उद्धृत किया है। आगमशास्त्र और चतुःशतीशास्त्र के नाम से यहाँ नित्याषोडशिकार्णव उद्धृत है। आगमान्तर से दीपिकाकार एक जगह (पृ० ३२९) शारदातिलक का ग्रहण करते हैं। अन्यत्र वे किस आगम को लेते हैं, इसका पता नहीं चलता। तन्त्रान्तर के नाम से उन्होंने कुसुमांजलिकारिका, न्यायभाष्य, दशरूपक, ब्रह्मसिद्धि, शारदातिलक, व्याकरणशास्त्र तथा सर्वमङ्गलाशास्त्र के वचनों को उद्धृत किया है। न्यायभाष्य का वचन यहाँ चार बार उद्धृत है। पृ० ३३२ का उद्धरण कुछ लम्बा है और इसका आगे वाला अंश वहाँ उपलब्ध नहीं है। शारदातिलक के दो वचन यहाँ उद्धृत हैं। इससे ज्ञात होता है कि शारदातिलक की रचना अमृतानन्द से पहले हो चुकी थी। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अमृतानन्द शारदातिलक को आगमान्तर अथवा तन्त्रान्तर के नाम से उद्धृत करते हैं, अतः वह श्रीशास्त्र का ग्रन्थ नहीं हो सकता, जैसा कि ²कुछ लोगों का मानना है। निघण्टु के नाम से दो वचन अमरकोश के हैं। बाकी एक वचन किस कोश का है, हम पता नहीं पा सके। कुछ अन्य उद्धरणों के भी मूलस्थान की खोज पाने में हम असफल रहे हैं। प्रमाणवचन कहाँ के हैं, इसका भी हम पता नहीं चला सके, किन्तु प्रामाणिकवचन के अन्तर्गत शिवानन्द का सौभाग्यहृदयस्तोत्र, स्तोत्रावली, भास्कररायसंमत नित्या- षोडशिकार्णव, कुलार्णव और ज्ञानकारिका ? के श्लोक उद्धृत हैं। स्तोत्रावली का वचन भट्ट उत्पल की शिवस्तोत्रावली में उपलब्ध नहीं हुआ। भास्कररायसंमत नि० षो० तथा कुलार्णव के विषय में ऊपर लिखा जा चुका है। हमारा अनुमान है कि ये वचन १. शिवानन्द के इन तीन ग्रन्थों पर किये गये शोध कार्य पर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से दिल्ली की डॉ० मधु खन्ना को अभी डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई है। २. लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग, उपोद्घात, पृ. ४६ की टिप्पणी देखिये।
[ १३ ] संकेतपद्धति के हो सकते हैं। यह विषय भी टिप्पणियों में अंकित किया गया है। १ज्ञानकारिका डॉ० प्रबोधचन्द्र बागची के कौलज्ञाननिर्णय के संस्करण में समाविष्ट है। वेदरहस्य के नाम से उपनिषद् के वचन उद्धृत हैं और महाकवि के नाम से कालिदास के रघुवंश और कुमारसंभव के। त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति के विषय में शिवानन्द का कहना है कि पहले इसकी उत्पत्ति २कश्मीर में हुई, किन्तु कश्मीरी विद्वान् जयरथ३ कहते हैं कि ईश्वरशिव और विश्वावर्त प्रथमतः इस सिद्धान्त को कश्मीर ले आये। ४हम बता चुके हैं कि लघुस्तव(स्तुति) के रचयिता धर्माचार्य भृगुकच्छ के निवासी थे और (त्रिपुरीसुन्दरी)- दण्डक५ के कर्ता दीपकनाथ के प्रभाव को राजा भोज ने देखा था। जयरथ ६दीपक- नाथ को नि० षो० का प्रथम व्याख्याकार मानते हैं। हमारा विचार है कि गुजरात और मध्यप्रदेश से यह सम्प्रदाय कश्मीर में पहुँचा और फिर वहाँ से दक्षिण देश में। हम देखते हैं कि दक्षिण देश के निवासी गुरुनाथपरामर्श के रचयिता मधुराज योगी अभिनवगुप्त के जीवनकाल में ही कश्मीर पहुँचे थे। वे वहाँ से अर्जित ज्ञान को दक्षिण में ले गये और बाद में दक्षिण में इस ज्ञान का विस्तार हुआ। दक्षिण के शिवानन्द आदि आचार्य अपने को धर्माचार्य, दीपकनाथ आदि सिद्धों की परम्परा से प्राप्त ज्ञान, जो कि ओघ या ओवल्ली के नाम से जाना जाता है, उत्तराधिकारी मानते हैं। लगता है यह परम्परा उनको कश्मीर से प्राप्त हुई। इसीलिये वे इस सम्प्रदाय की उत्पत्ति कश्मीर में मानते हैं। पुण्यानन्द और अमृतानन्द भी शिवानन्द, विद्यानन्द आदि की परम्परा में आते हैं। अतः इनकी स्थिति दक्षिण देश में ही माननी चाहिये, कश्मीर में नहीं। पुण्यानन्द और अमृतानन्द को कश्मीरी मानने की मान्यता का पुनरीक्षण अपेक्षित है। आज अद्वैतवादी शैवदर्शन को कश्मीर से तथा द्वैतवादी शैवदर्शन को दक्षिण से जोड़ने की प्रवृत्ति काम कर रही है। यह सही है कि अद्वैतवादी प्रत्यभिज्ञा दर्शन के १. दीपिका (पृ. ३२३) में उद्धृत “पिण्डे मुक्ताः” आदि श्लोक ज्ञानकारिका (११४-५) का बताया गया है, किन्तु यह वहाँ उपलब्ध नहीं है। २. "सम्प्रदायस्य कश्मीरोद्भूतत्वात्" (ऋजुविमर्शिनी, पृ. ११४)। ३. "वस्तुतो ह्यस्य दर्शनस्यैतदेवाचार्यद्वयं कश्मीरेष्ववतारकम्" (वाम. विव., पृ. ४८)। ४. द्रष्टव्य—आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ. ८६-८७ ५. “भोजदेवदृष्टचमत्कारो महादेशिकप्रवरः श्रीमान् दीपकाचार्यो दण्डककर्ता” (ऋजु. पृ. २२३)। ६. पृ. ८ की पांचवी टिप्पणी देखिये।
[ १४ ] विकास में सर्वाधिक योगदान कश्मीर का तथा द्वैतवादी शैवदर्शन के संरक्षण और संव- र्धन में दक्षिण का रहा है, किन्तु यह प्रक्रिया एकान्ततः वहीं तक सीमित नहीं रही और कालक्रम से इसका संबन्ध अन्य प्रदेशों से भी रहा है। हम कह सकते हैं कि प्रत्यभिज्ञा दर्शन का प्रथमतः विकास कश्मीर में हुआ और फिर वह पूरे देश में फैल गया। इसी तरह से द्वैतवादी शैवदर्शन का विकास पहले मध्यदेश में हुआ और बाद में यह दक्षिण देश तक सीमित रह गया । १अभिनवगुप्त ने मध्यदेश को सभी शास्त्रों का सदन (घर) बताया है। उसके पूर्वज यहीं से कश्मीर गये थे। द्वैतवादी, द्वैताद्वैतवादी और अद्वैतवादी दर्शनों की प्रवृत्ति उनके अनुसार आमर्दक आदि मठों के माध्यम से हुई। डॉ० वासुदेव विष्णु मिराशी२ ने अनेक शिलालेखों के प्रमाण से द्वैतवादी शैवाचार्यों की मठीय परम्परा पर पर्याप्त प्रकाश डाला है कि उन्होंने किस प्रकार मध्यदेश में प्रसूत इस ज्ञान का सर्वत्र प्रसार किया। डॉ० वी० एस० पाठक३ ने त्रिलोचन शिवाचार्य की सिद्धान्तसारावली के वचन को उद्धृत कर यह बताया है कि यात्रा के प्रसंग में आये काँची के राजा राजेन्द्र चोल इनको काशी से अपने साथ ले गये। द्वैतवादी शैवसिद्धान्त के १८ पद्धतिकारों की सूचना देने वाले दो श्लोक४ उपलब्ध हैं। इनमें प्रारम्भ के कुछ आचार्य कश्मीर के हैं और १. "निःशेषशास्त्रसदनं किल मध्यदेशः" (तन्त्रालोक, ३७।३८) । त्र्यम्बकामर्दकाभिख्यश्रीनाथा अद्वये द्वये । द्वयाद्वये च निपुणाः क्रमेण शिवशासने ।। (तन्त्रा. ३६।१२) २. द्रष्टव्य—प्राच्यविद्या निबन्धावली, खण्ड ४ में प्रकाशित "पतंगशंभु का ग्वालियर संग्रहालय शिलालेख" शीर्षक निबन्ध, पृ. १७२-१८२, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, प्रथम संस्करण, सन् १९७४ ३. राजेन्द्रचोल इत्याख्यश्चोलभूपो महीं वसन् । गङ्गास्नानार्थमागत्य दृष्ट्वा शैवान् वरांस्तदा ।। स्नात्वा प्रतिनिवृत्तः सन् तान् समादाय शैवकान् । स्वराज्ये स्थापयामास शैवाचार्यवरांस्तदा ।। काञ्चीमध्ये चोलभूमौ सर्वत्रैव प्रविस्तराः । शैव कल्ट इन नार्दनं इण्डिया, पृ. ३८ टिप्पणी । ४. उग्रोत्तरज्योतिरथोपसद्यः श्रीरामकण्ठोऽपि च वैद्यकण्ठः । नारायणश्चापि विभूतिकण्ठः श्रीनीलकण्ठोऽपि च सोमशम्भुः ।। ईशानशम्भुर्हृदयादिना स्याद् विरञ्चिवैराग्यकयुग्मवाच्यौ । ज्ञानस्त्रिणेत्रो बहुणेश्वरी ज्ञावित्यादयस्ते स्युरघोरशम्भुः ।। द्रष्टव्य—शैवभूषण ।
[ १५ ] बाद के आचार्य मध्यदेश के। दक्षिण के आचार्यों का नाम अन्त में है। इससे हमारी यह मान्यता बनती है कि त्रिलोचन शिवाचार्य से दक्षिण भारत के पद्धतिकारों की परम्परा प्रारम्भ हुई और वहाँ द्वैतवादी शैवदर्शन की प्रतिष्ठा हुई। त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति के प्रसंग में अद्वैतवादी प्रत्यभिज्ञादर्शन तथा द्वैतवादी शैवसिद्धान्त की चर्चा हमने इसलिये की कि ज्ञान की इन धाराओं के विकास में पूरे देश का योगदान रहा है। त्रिपुरा सम्प्रदाय के विषय में यह विशेष रूप से कहा जा सकता है। त्रिपुरा मत के अन्दर विकसित कश्मीर, केरल और गौडीय सम्प्रदाय की चर्चा हम 'अन्यत्र कर चुके हैं। ये सम्प्रदाय पूरे देश को अपने में समेटे हुए हैं। इस ज्ञान का विकास केवल संस्कृत भाषा में ही नहीं, लौकिक भाषाओं में भी हुआ। "हिन्दू तान्त्रिक एण्ड शाक्त लिटरेचर" नामक ग्रन्थ की चर्चा हम कर चुके हैं। इस ग्रन्थ के दूसरे भाग का शीर्षक है—"तान्त्रिक शाक्त लिटरेचर इन मार्डन इण्डियन लैंग्वेजेज"। इस भाग में बंगला भाषा में रचित शाक्त साहित्य का कुछ विस्तार से तथा मैथिली, राज- स्थानी, व्रजभाषा और पंजाबी भाषा में रचित साहित्य का कुछ संक्षेप में वर्णन किया गया है। सौभाग्य से हमें इधर बड़ोदरा संस्कृत महाविद्यालय के प्राध्यापक शास्त्री श्री उदयन हरिशंकर शुक्ल से गुजराती भाषा में लिखी "शाक्त सम्प्रदाय"२ नामक पुस्तक मिली। इसमें गुजराती भाषा में निबद्ध शाक्त साहित्य पर पूरा एक प्रकरण है (पृ० १११- १४४)। यहाँ नाथ भवान, वल्लभ भट्ट, मीठू, जनो बाई, कवि बाल और नृसिंहाचार्य की जीवनी तथा उनके साहित्य पर अच्छा प्रकाश डाला गया है। इनमें से मीठू ३हंस- विलास के रचयिता हंसमिट्ठु से अभिन्न हैं। "शाक्त सम्प्रदाय" नामक उक्त ग्रन्थ की यह विशेषता है कि इनमें बौद्ध और जैन धर्म में समाविष्ट शाक्त तत्त्वों की भी अलग अलग प्रकरणों में चर्चा की गई है। बौद्ध धर्म के विषय में लेखक बहुत ही उदारवादी हैं। उनका कहना है कि आधुनिक हिन्दू धर्म की स्वरूप-रचना में बौद्ध धर्म और तत्त्व- ज्ञान की बहुत बड़ी देन रही है (पृ० १५६)। बौद्ध और जैन धर्म के प्रति श्रद्धेय श्री श्री गोपीनाथ कविराज का भी यही दृष्टिकोण रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि बौद्ध और जैन धर्म के साथ हिन्दू धर्म की बात उठाने पर जो विरोध भावना जगती है, वह वैष्णव, शैव या शाक्त सम्प्रदायों की चर्चा करने पर नहीं उठती। इसका कारण यह १. शक्तिसंगम तन्त्र, छिन्नमस्ता चतुर्थ खण्ड, उपोद्घात पृ. ३०-३२, गायकवाड़ ओरियण्टल सिरीज, बड़ोदरा, सन् १९७८ २. श्री फार्बस गुजराती सभा, बम्बई द्वारा सन् १९३२ में प्रकाशित, श्री नर्मदाशंकर देवशंकर महेता द्वारा लिखित इस ग्रन्थ में शाक्त सम्प्रदाय के सिद्धान्तों, गुजरातमें उनके प्रचार और गुजराती साहित्य पर उनके प्रभाव पर विचार किया गया है। ३. यह ग्रन्थ गायकवाड़ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, बड़ोदरा से सन् १९३० में प्रकाशित हो चुका है।
[ १६ ] है कि हिन्दू शब्द हम पर आरोपित है और इस आरोपित विभ्रम के सहारे ही हम बाह्य आचारों के घरौंदों में बंटते चले जा रहे हैं। इसके विपरीत बौद्ध, जैन, वैष्णव, शैव, शाक्त आदि शब्द इसी धरती की उपज हैं और इन्होंने कालक्रम से कुछ मानों में अपने में एक समान दृष्टिकोण का उन्मीलन कर लिया है। शाक्त मत की इन सब पर बहुत गहरी छाप है। शाक्त मत की इस व्यापक दृष्टि का योगिनीहृदय में पूर्ण विकास हुआ है। इस व्यापक दृष्टिकोण को ही उजागर करने का अब हम लघु प्रयास कर रहे हैं। चक्रसंकेत क्षेमराज ने प्रत्यभिज्ञाहृदय के आठवें सूत्र की व्याख्या में कहा है कि 'तान्त्रिकों के मत में आत्मतत्त्व विश्वोत्तीर्ण है, कुल आदि आम्नायों के अनुसार वह विश्वमय है और त्रिक आदि दर्शन के ज्ञाताओं के मत से वह विश्वोत्तीर्ण भी है और विश्वमय भी। योगिनीहृदय और दीपिका में इस तृतीय मत को स्वीकार किया गया है। महातत्त्वार्थ का निरूपण करते हुए यहाँ (२।७३-७४) बताया गया है कि निष्कल, परम सूक्ष्म, निर्लक्ष्य, भाववर्जित, व्योमातीत, प्रकाश और आनन्द स्वरूप, विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय परम तत्त्व में अपने को विलीन कर लेना ही महातत्त्वार्थ है। विश्वोत्तीर्ण तत्त्व स्वेच्छा से स्वात्मभित्ति में विश्व का उन्मीलन कर विश्वमय बन जाता है और फिर अपने में ही विश्व को समेट भी लेता है, अतः यह विश्वमय भी है और विश्वोत्तीर्ण भी। यह विश्वोत्तीर्ण तत्त्व विश्वमय बनने के लिए कैसे श्रीचक्र का स्वरूप धारण कर लेता है, परदेवता श्रीचक्र के रूप में कैसे अवतरित होती है, प्रथम चक्रसंकेत प्रकरण में इसी का दार्शनिक विवरण प्रस्तुत किया गया है। पाँच शक्ति त्रिकोणों और चार वह्नि त्रिकोणों के मिलने से श्रीचक्र का स्वरूप बनता है। यहाँ पाँच शक्ति त्रिकोणों को सृष्टि क्रम से, अर्थात् ऊर्ध्वमुख तथा चार वह्नि त्रिकोणों को लयक्रम से, अर्थात् अधोमुख रखना पड़ता है। श्रीचक्र के उद्धार की दो विधियाँ नित्याषोडशिकार्णव ( १।२९-४१, ५९-७५) में बता दी गई हैं, अतः उनका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है। यहाँ बताया गया है कि वह (विश्वोत्तीर्ण) आद्या शक्ति जब विश्वमय बनना चाहती है, तो उसमें स्पन्दन (स्फुरत्ता) होता है और इस स्पन्दन का प्रथम परिणाम है श्रीचक्र। यह चक्र कामकलारूप है। यहाँ (१।११) कामकला को प्रकाश-परमार्थ और श्रीचक्र को प्रसार-परमार्थ (१।२४) कहा गया है। प्रकाशविमर्श सामरस्यमय १. "विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वमिति तान्त्रिकाः। विश्वमयमिति कुलाद्याम्नायनिष्ठाः। विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं चेति त्रिकादिदर्शनविदः" (पृ. ५६)। ठाकुर जयदेवसिंह संस्करण, मोतीलाल बनारसीदास, सन् १९६३ (अंग्रेजी अनुवाद)। मूल ग्रन्थ के ३, ४ सूत्र भी द्रष्टव्य हैं।
[ १७ ]
बिन्दु में कामकला की अव्यक्त स्थिति तथा उसके उन्मीलन के प्रकार का वर्णन हम ग्रन्थभाग, पृ. १६-१७ की टिप्पणी में कर चुके हैं। इस कामकला के प्रसार से ही विश्वमय श्रीचक्र की निष्पत्ति होती है। नौ चक्रों की समष्टि को श्रीचक्र की संज्ञा दी गई है। उनमें से प्रथम बैन्दव चक्र में कामकला अव्यक्त रूप से तथा द्वितीय त्रिकोण चक्र में व्यक्त रूप से अवस्थित है। कामकला का यह व्यक्त स्वरूप शारदा लिपि के ईकार में स्पष्ट देखा जा सकता है। इस प्रथम त्रिकोण (मध्य त्र्यश्र) के ऊपर सृष्टि और संहार के क्रम से शक्ति और वह्नि (शिव) त्रिकोण की स्थापना की जाती है, तो उससे नवयोन्यात्मक वसु(अष्ट)कोण चक्र की निष्पत्ति होतो है। इस नवयोनि चक्र में धर्म, अधर्म, आत्मा, अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा, माता, मेय और प्रमा की स्थिति मानी जाती है। मध्य त्र्यश्र में प्रमा की तथा उसके चारों तरफ फैले अन्य आठ त्रिकोणों में धर्म आदि की स्थिति रहती है। यह 'नवयोनि चक्र' (बिन्दु, त्रिकोण और वसुकोण की समष्टि) अम्बिका शक्ति का विलास है और यह सोलह स्वरों से आवृत है। नौ त्रिकोण और बैन्दव चक्र की चारों तरफ फैल रही दशविध प्रभा से अन्तर्दशार चक्र की निष्पत्ति होती है। २यकार से लेकर ळ क्ष पर्यन्त दस वर्ण इसमें स्थित हैं और यह पाँच महाभूत एवं पाँच तन्मात्राओं का आलम्बन है। प्रथम दशार से ही द्वितीय दशार का स्फुरण होता है और यह ककार आदि दस वर्णों तथा ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों
१. "तत्राद्यं नवयोनि स्यात्" (१।७५) यहाँ नवयोनि पद बिन्दु, त्रिकोण और वसु- कोण—इन तीनों चक्रों का बोधक माना गया है। इन तीनों चक्रों की वासना यहाँ एक साथ बताई गई है और यह पूरा प्रकरण नवयोनि चक्र का ही निरूपक है। अतः "चक्रं नवात्मकम्" (१।१३) इस पंक्ति का भी अर्थ तदनुसार ही करना चाहिये। दीपिकाकार ने यहाँ त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों की तथा करशुद्धिकरी आदि नौ चक्रेश्वरों विद्याओं की चर्चा उठाई है। इसके विपरीत भास्करराय ने नवयोन्यात्मक चक्र की नवविध वासना का उल्लेख कर वशिनी आदि आठ विद्याओं को मूलविद्या के साथ मिलाकर उसकी नवमन्त्रात्मकता बताई है और कहा है कि नवयोनि चक्र के प्रकरण में त्रैलोक्यमोहन आदि चक्रों की तथा करशुद्धिकरी आदि विद्याओं की चर्चा अनावश्यक है। इसके साथ ही उन्होंने प्रकारान्तर से दीपिका व्याख्या की संगति भी बैठा दी है। २. ग्रन्थभाग पृ. २६ की टिप्पणी देखिये। दीपिकाकार (१।४५-४७) ने आदि-अान्त पचास ही वैखरी वर्ण माने हैं। मूल ग्रन्थ (२।७०) में भी वैखरी वाणी के पचास वर्ण ही स्वीकृत हैं। ऐसी स्थिति में दीपिका का प्रस्तुत अंश समाधान-सापेक्ष है।
[ १८ ] के दस विषयों का उद्भावक है। बैन्दव, त्रिकोण, वसुकोण और अन्तर्दशार चक्रों की चार किरणों तथा बहिर्दशार चक्र की दस किरणों के मिलने पर चतुर्दशार चक्र निष्पन्न होता है। यहाँ टकार से भकार पर्यन्त वर्णों की तथा दस बाह्य करण और चार अन्तः- करण—इस प्रकार चतुर्दश इन्द्रियों की निष्पत्ति होती है। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि पृथिवी आदि तत्त्वों की रचना शिव के अंश से और वर्णों की रचना शक्ति के अंश से होती है। इस प्रकार पांच शक्ति चक्रों और चार वह्नि (शिव) चक्रों से निष्पन्न ये अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार नामक तीन चक्र रौद्री शक्ति की प्रभा से उन्मीलित होते हैं। यहाँ तक छः चक्रों की निष्पत्ति पूरी होती है। षोडशदल और अष्टदल चक्रों की निष्पत्ति वामा शक्ति से तथा चतुरस्र चक्र की ज्येष्ठा शक्ति से होती है। इस प्रकार अम्बिका, रौद्री, वामा और ज्येष्ठा शक्ति की सहायता से इस परिपूर्ण श्रीचक्र का विस्तार होता है। इनमें से बिन्दु और त्रिकोण चित्कलामय हैं। अष्टकोण शान्त्यतीता से, अन्तर्दशार, बहिर्दशार और चतुर्दशार शान्ति कला से, अष्टदल विद्या कला से, षोडशदल प्रतिष्ठा कला से और चतुरस्र चक्र निवृत्ति कला से प्रकट होते हैं। श्रीचक्र का यह स्वरूप सृष्टिक्रम कहलाता है। इससे उलटा है संहारक्रम। इन दोनों ही क्रमों से श्रीचक्र की भावना और पूजा की जाती है। सृष्टिक्रम जैसे बिन्दु से प्रारंभ होता है, उसी तरह से संहारक्रम चतुरस्र, अर्थात् त्रैलोक्यमोहन चक्र से। इस संहारक्रम से इन नौ चक्रों में क्रमशः नाद, बिन्दु, कला, ज्येष्ठा, रौद्री, वामा, विषघ्नी, दूतरी और सर्वानन्दा नामक नौ शक्तियां निवास करती हैं। इनमें से नाद और बिन्दु शान्ताशक्तिमय, कला इच्छाशक्तिमय, ज्येष्ठा ज्ञानशक्तिमय तथा बाकी की पाँच शक्तियां क्रियाशक्ति का विलास मानी जाती हैं। परमार्थतः कामकला के ही प्रसार से श्रीचक्र का यह वर्णमय, तत्त्वमय और शक्तिमय स्वरूप उन्मीलित होता है। इन नौ चक्रों की क्रमशः अकुल, विषु, शाक्त, वह्नि, नाभि, अनाहत शुद्ध, लम्बिकाग्र और भ्रूमध्य में एवं बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना में तथा महाबिन्दु में त्रिविध भावना की जाती है। इनमें से प्रथम भावना सकल, दूसरी भावना सकलनिष्कल तथा तीसरी भावना निष्कल कही जाती है। महाबिन्दु में निष्कल भावना में प्रविष्ट योगी जब ऊपर उठता है, तो उसको देश, काल, आकार आदि से रहित उस परम महान् स्वभावसुन्दर तत्त्व का साक्षात्कार होता है, जो सदा परमानन्द से परिपूर्ण है। यह पहले बताया जा चुका है कि विश्वोत्तीर्ण तत्त्व जब विश्वमय बनना चाहता है, तो उसमें अनोखी स्फुरत्ता का उद्भव होता है। वह्नि के सम्पर्क से जैसे घी पिघलने लगता है, वैसे ही उस परम शिव के सम्पर्क से विमर्श-शक्ति स्यन्दित हो उठती है और
[ १९ ]
इसी से विश्वलहरी स्थान, मातृत्रयात्मक बैन्दव (त्रिकोण) चक्र का प्राकट्य होता है। उस समय विमर्शमयी परमा कला सर्वप्रथम शान्ता और अम्बिका शक्ति का रूप धारण कर लेती है। इसी को परा वाक् भी कहा जाता है। यह परा वाणी अपने में बीज रूप से स्थित विश्व को जब प्रकट करना चाहती है, तब विश्व का वमन करने के कारण अंकुश सदृश वामा शक्ति का रूप धारण कर लेती है। यह वामा शक्ति ही इच्छा शक्ति के साथ मिल कर पश्यन्ती वाक् के रूप में परिणत हो जाती है। इसी तरह से ज्येष्ठा शक्ति और ज्ञान शक्ति के मिलन से मध्यमा वाक् अभिव्यक्त होती है। शृंगाट (त्रिकोण) की सीधी रेखा इसका बोध कराती है। वामा शक्ति के द्वारा सृष्ट विश्व की स्थिति में यह कारणभूत है, उसका पालन करती है। विश्व का संहार करने की इच्छा होने पर वह शक्ति अपने बैन्दव स्वरूप में पुनः प्रविष्ट हो जाती है। तब शृंगाट की दक्षिण रेखा के निर्माण के साथ इसका स्वरूप पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है। यह रौद्री शक्ति का व्यापार है। क्रिया शक्ति के साथ मिल कर यह वाणी के विस्तार को मुखरित करने वाली वैखरी वाक् बन जाती है। इस प्रकार बैन्दव (बिन्दु और त्रिकोण) चक्र में अम्बिका आदि तथा शान्ता आदि चार-चार शक्तियों तथा परा आदि चार वाणियों की भावना तथा पूजा की जाती है, इनको तन्मय माना जाता है। शिव (प्रकाशांश) से आविर्भूत अम्बिका आदि तथा शक्ति (विमर्शांश) से आविर्भूत शान्ता आदि शक्तियों में यह सारा विश्व बीज में वृक्ष की भांति छिपा रहता है। इन्हीं शक्तियों से कामरूप, पूर्णगिरि, जालन्धर और ओड्याण नामक पीठों की सृष्टि होती है। ये पीठ कन्द, पद, रूप और रूपातीत नामक आन्तर स्थानों में स्थित हैं। कन्द या पिण्ड को आधार, पद या हंस को हृदय, रूप या बिन्दु को भ्रूमध्य तथा रूपातीत को ब्रह्मरन्ध्र कहा जाता है। यह चिन्मय स्थान है। इन पीठों का आकार क्रमशः चतुरस्र, षड्बिन्दुमयं, अर्धचन्द्र और त्रिकोण जैसा होता है, क्योंकि ये क्रमशः पृथिवी, वायु, जल और तेज तत्त्व के प्रतीक हैं। इनका वर्ण क्रमशः पीत, धूम्र, श्वेत और रक्त है। इन पीठों में क्रमशः स्वयंभू, बाण, इतर और पर लिंग स्थित हैं। स्वयंभू लिंग का वर्ण पीत है। यह त्रिकूटाकार है तथा अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वरों से आवृत्त है। बाण लिंग का वर्ण बन्धूक पुष्प के जैसा है। यह त्रिकोणाकार है और ककार से टकार पर्यन्त सोलह व्यंजनों से आवृत्त है। इतर लिंग का वर्ण श्वेत है। इसका आकार कदम्बफल के समान गोल है और यह थकार से सकार पर्यन्त सोलह व्यंजनों से आवृत्त है। पर- तेजोमय पर लिंग का कोई आकार नहीं होता। इन्द्रियों से इसको देखा नहीं जा सकता, अतः बिन्दु से इसका बोध कराया जाता है। यह अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त वर्णों से आवृत्त है। यह परमानन्द का सार तथा नित्योदित स्वरूप वाला है।
[ २० ] बिन्दु सहित त्रिकोण में स्थित अम्बिका आदि तथा शान्ता आदि शक्तिचतुष्टय, मातृका(वाणी)चतुष्टय, पीठचतुष्टय और लिंगचतुष्टय—ये सभी वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज तथा इनकी समष्टि तुरीय विद्या के वाच्य रूप हैं, अर्थात् बीजत्रया- त्मिका तुरीय श्रीविद्या से इनका बोध होता है। मेय, मान और माता की त्रिपुटी को कुल और इनकी समष्टि को कौल कहा जाता है। ऊपर निर्दिष्ट सभी चार संख्या वाले पदार्थ कुल और कौल विभाग में समाविष्ट हैं और क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुर्य (तुरीय) दशा वाले हैं। सभी प्राणियों में संवित्ति के रूप में भासमान विश्वोत्तीर्ण अनुत्तर (प्रकाशात्मक) परम तत्त्व इन सबसे ऊपर है। अपनी इच्छा से वह स्वात्मभित्ति में स्वेच्छा-तूलिका से विश्वमय चित्र बना डालता है, स्वयं विश्वमय हो जाता है। वह परप्रकाशात्मक स्वरूप इस तरह से विमर्श शक्ति से सम्पन्न होकर सहज आनन्द की सृष्टि का कारण बन कर सबके लिये स्पृहणीय हो जाता है। वह मेय, माता, प्रमा और प्रमाण के रूप में बँट जाता है और इच्छा, ज्ञान एवं क्रियात्मक शृंगाट (त्रिकोण) का स्वरूप धारण कर लेता है। विमर्श शक्ति विश्व का आकार ग्रहण करती है, किन्तु उसका अपना स्वरूप तो प्रकाशात्मक शिव में स्थित है। कामेश्वर के अंक रूपी पर्यंक में विश्राम करने वाला विमर्श शक्ति का यह स्वरूप अत्यन्त सुन्दर है। इच्छाशक्तिमय पाश, ज्ञानशक्तिमय अंकुश और क्रियाशक्तिमय धनुष-बाण को धारण करने से कामेश्वर और कामेश्वरी के इस युगल स्वरूप की शोभा और भी बढ़ जाती है। कामेश्वर-कामेश्वरी का यह युगल स्वरूप आश्रय और आश्रयी के भेद से आठ आयुध वाला हो जाता है। यही मिथुन स्वरूप बैन्दव, त्रिकोण, वसुकोण आदि के क्रम से विकसित नवचक्रात्मक श्रीचक्र में विविध रूपों में अपना विस्तार कर लेता है और इस तरह से अपने श्रीचक्र रूपी शरीर में अपनी अवयव शक्तियों के साथ यह परम तेज अवतरित हो जाता है, विश्वोत्तीर्णता का परित्याग कर विश्वमय बन जाता है। यहाँ प्रकाशात्मक परमेश्वर (कामेश्वर) समुद्र स्थानीय, विमर्शमयी शक्ति (कामे- श्वरी) जलस्थानीय और उसकी अवयव शक्तियाँ तरंग स्थानीय हैं। जैसे समुद्र के जल से उठी लहरें उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी तरह से ३६ तत्त्वों वाला यह सारा विश्व- मय शक्तिचक्र इस युगल स्वरूप से ही उदित होता है और उसी में विलीन हो जाता है। चिति शक्ति स्वात्मस्वरूप भित्ति में जब स्वेच्छा से विश्व की रचना के लिये परिपूर्ण इच्छा शक्ति से सम्पन्न हो प्रकाश और विमर्श का सहारा लेती है, तो उस समय उसकी क्रिया शक्ति विश्व के मोदन और द्रावण व्यापार में प्रवृत्त हो मुद्रा का स्वरूप धारण कर लेती है। इस प्रकार की दस मुद्राएँ यहाँ वर्णित हैं। इनमें से पहली मुद्रा का विनियोग
[ २१ ]
आवाहन के लिये होता है। शेष मुद्राएँ एक-एक चक्र की पूजा में विनियुक्त हैं। ¹मुद्रा शब्द तन्त्रशास्त्र में अनेक अर्थों में प्रयुक्त है, किन्तु यहाँ दोनों हाथों की अंगुलियों के संयोग से बनने वाली मुद्राओं के लिये आया है। दाहिने हाथ की अंगुलियाँ प्रकाशात्मक तथा बायें हाथ की अंगुलियाँ विमर्शात्मक मानी जाती हैं। ये अंगुलियाँ क्रमशः वामा आदि तथा इच्छा आदि चार-चार शक्तियों की प्रतीक हैं। इन दसों मुद्राओं का बाह्य और आन्तर स्वरूप यहाँ (१।५७-७१) बताया गया है। इस तरह इस विश्वमय परा शक्ति की ज्ञानशक्ति से श्रीचक्र का और क्रियाशक्ति से मुद्राओं का आविर्भाव होता है। स्वयं विश्वमय परा देवता इच्छाशक्तिस्वरूप है। उसमें विविकीर्षा उत्पन्न होने पर ही सृष्टि का विस्तार होता है। इस श्रीचक्र की त्रिविध और नवविध भावना की जाती है। बिन्दु, त्रिकोण और वसु- कोण की एक प्रकार से; दो दशार और चतुर्दशार की दूसरे प्रकार से; अष्टदल, षोडश- दल और चतुरस्र की तीसरे प्रकार से, अर्थात् क्रमशः सृष्टि, स्थिति और संहार के क्रम से पूजा की जाती है। दीपिकाकार ने संकेतपद्धति के प्रमाण से इनका विवरण दिया है (१।७७)। बिन्दु से लेकर चतुरस्रपर्यन्त उद्धार सृष्टिक्रम तथा चतुरस्र से बिन्दुपर्यन्त उद्धार संहारक्रम कहलाता है। इन सबकी समष्टि का ही नाम त्रिपुरा चक्र है। इस चक्र के स्वरूप को जो ठीक से जान लेता है, उसको अपने आप भगवती त्रिपुरा का स्वरूप भासित हो जाता है। चक्र की नवविध भावना में नौ चक्रों की अलग-अलग उपासना की जाती है। इन नौ चक्रों के नाम यहाँ संहारक्रम से इस प्रकार बताये गये हैं—त्रैलोक्यमोहन, सर्वाशा- परिपूरक, सर्वसंक्षोभण, सर्वसौभाग्यदायक, सर्वार्थसाधक, सर्वरक्षाकर, सर्वरोगहर, सर्वसिद्धिमय और सर्वानन्दमय। इन शब्दों की लुभावनी पदव्याख्या दीपिकाकार ने की है (१।८२-८४)। इस श्रीचक्र में महात्रिपुरसुन्दरी की उपासना की जाती है। इस परिपूर्ण चक्र की उपासना से साधक अजर और अमर हो जाता है। मन्त्रसंकेत प्रथम चक्रसंकेत प्रकरण में भगवती त्रिपुरसुन्दरी के अवतार-स्थान श्रीचक्र का स्वरूप बताने के बाद द्वितीय मन्त्रसंकेत प्रकरण में श्रीविद्या का स्वरूप और उसके षड्विध अर्थों का निरूपण किया गया है। यहाँ बताया गया है कि इस दिव्य मन्त्रसंकेत को जानने १. नित्याषोडशिकार्णव, उपोद्घात, पृ० ७५-७८ द्रष्टव्य। कर्णिका, रुचक आदि कापालिक मत संमत छः मुद्राएं (अथवा पाँच मुद्राएं) बौद्ध तन्त्रों में भी स्वीकृत हैं। शाक्त तन्त्रों में मुद्रा शब्द का प्रयोग चना-चबैना के लिये किया जाता है। बौद्ध तन्त्रों में कर्ममुद्रा, धर्ममुद्रा, ज्ञानमुद्रा और महामुद्रा के रूप में भी मुद्राओं का वर्णन मिलता है।
[ २२ ] वाला वीरचक्रेश्वर, अर्थात् परशिव स्वरूप हो जाता है। यहाँ सर्वप्रथम नौ नित्याओं के नौ मन्त्रों (विद्याओं) के नाम बताये गये हैं और सातवीं मूर्तिविद्या का उद्धार भी किया गया है, क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य आठ विद्याओं का उद्धार नि० षो० में ही बता दिया गया है। नौ विद्याओं के नामों से ही उनका कहाँ विनियोग होता है, यह भी ज्ञात हो जाता है। प्रसंगवश यहाँ इन विद्याओं के बाह्य और आन्तर न्यास का विधान कर नौ नित्याओं के नाम गिनाये गये हैं और कहा गया है कि पूर्व वर्णित नौ चक्रों में इन नौ नित्याओं का पूजन करना चाहिये। आद्या शक्ति ही पूजा के समय नौ रूप धारण कर लेती है। वस्तुतः यह शक्ति एक ही है और यह साधक को अजर और अमर, अर्थात् परम शिवस्वरूप बना देती है। अर्थरत्नावली (पृ० १०७) में उद्धृत संकेतपद्धति के वचन में और शिवानन्द मुनि के सुभगोदय (श्लो० ४९) में आठ ही नित्याओं के नाम हैं, ऐसा प्रतीत होता है, किन्तु वहाँ (पृ० १०७) उद्धृत संकेतपद्धति के अन्य श्लोकों से ज्ञात होता है कि सातवीं विद्या त्रिपुरासिद्धा तथा आठवीं त्रिपुराम्बिका है। अतः सुभगोदय के ऊपर चर्चित वचन में सिद्धाम्बा शब्द में समास मानकर सिद्धा और अम्बा शब्दों को अलग-अलग मानना चाहिये। इस तरह से नित्याओं की संख्या नौ हो जाती है। संकेतपद्धति के अनुसार आठ अंग- नित्याओं के साथ नवीं अंगी (प्रधान) मूलविद्या को मिलाने से इनकी संख्या नौ हो जायगी। नवनित्याविधान नामक ग्रन्थ का एक वचन जयरथ द्वारा तन्त्रालोकविवेक (१५। २८१) में उद्धृत है। ग्रन्थ के इस नाम से भी नौ नित्याओं की प्रतीति होती है। अतः इस स्पष्टीकरण के आधार पर वहाँ (पृ० १०५ में) दी गई टिप्पणी में आवश्यक संशोधन कर लेना चाहिये। योगसूत्रकार¹ भगवान् पतंजलि ने मन्त्र के जप के साथ अर्थ की भावना का भी विधान किया है। निरुक्त² में अर्थ को बिना जाने वेद मन्त्रों का पाठ मात्र करने वाले की निन्दा और वेद मन्त्रों के अर्थ को जानने वाले की प्रशंसा की गई है। इसी बात को ³भास्करराय ने भी प्रकारान्तर से वरिवस्यारहस्य में कहा है। इसीलिये योगिनीहृदय के मन्त्रसंकेत प्रकरण में सामान्य पीठिका-बन्ध के बाद सौभाग्यविद्या के षड्विध अर्थों का १. तज्जपस्तदर्थभावनम् (१।२८) । २. स्थाणुरयं भारहारः किलाऽभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत् सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ॥ यद् गृहीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते । अनग्नाविव शुष्कैधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥ (६।१) ३. नार्थज्ञानविहीनं शब्दस्योच्चारणं फलति । भस्मनि वह्निविहीने न प्रक्षिप्तं हविर्ज्वलति ॥
[ २३ ] विस्तार से वर्णन किया गया है। इनके नाम ये हैं—भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, सर्वरहस्यार्थ और महातत्त्वार्थ । यहाँ १६ से २५ श्लोक तक भावार्थ का, २६ से ४८ पर्यन्त सम्प्रदायार्थ का, ४८ से ५१ पर्यन्त निगर्भार्थ का, ५१ से ६८ तक कौलि- कार्थ का, ६९ से ७२ पर्यन्त सर्वरहस्यार्थ का और ७३ से ८० श्लोक पर्यन्त महातत्त्वार्थ का निरूपण किया गया है। षड्विध अर्थों का यह पूरा प्रकरण पारिभाषिक शब्दों, काम- कला के स्वरूप को स्पष्ट करने वाली दार्शनिक और यौगिक प्रक्रियाओं से भरा हुआ है। बहुत सावधानी से दो-चार बार पढ़ने के बाद ही यह विषय हृदयंगम हो सकता है। हम १कहीं लिख चुके हैं कि नि० षो० में कादिविद्या का तथा यो० हृ० में हादि- विद्या का उद्धार हुआ है। यो० हृ० का यह पूरा प्रकरण हादिविद्या के साथ ही संगत होता है, कादिविद्या के साथ जोड़ने में खीचातानी करनी पड़ती है। अतः यही मानना उचित है कि यो० हृ० में हादिविद्या का षड्विध अर्थ बताया गया है। कादिविद्या के पन्द्रह प्रकार के अर्थों का वर्णन भास्करराय ने वरिवस्यारहस्य के द्वितीय अंश में किया है। वे यो० हृ० की भी व्याख्या कादिविद्यापरक ही करते हैं। हम यहाँ कादिविद्या और हादिविद्या का स्वरूप प्रदर्शित कर रहे हैं। इनको देख कर पाठक स्वयं अपना निर्णय कर सकते हैं। पंचदशाक्षरी कादिविद्या—क ए ई ल ह्रीँ ह स क ह ल ह्रीँ स क ल ह्रीँ पंचदशाक्षरी हादिविद्या—ह स क ल ह्रीँ ह स क ह ल ह्रीँ स क ल ह्रीँ १. भावार्थ मन्त्र के अक्षरों से जो अर्थ निकलता है, उसको भावार्थ कहते हैं। सौभाग्यविद्या का स्वरूप योगिनी, वीर और वीरेन्द्रों का शिव और शक्ति के साथ समयोग होने पर बनता है। इन शब्दों का अर्थ संस्कृत व्याख्या के आधार पर भाषानुवाद में कर दिया गया है। यहाँ इनके द्वारा पंचदशाक्षरी श्रीविद्या के तीनों बीजों का उद्धार किया है। इस विषय को स्पष्ट करने के लिये टीकाकार ने अपने ही ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय के पूरे द्वितीय प्रपंच को यहाँ उद्धृत किया है। यहाँ ८ से १४ श्लोक पर्यन्त वाग्भव बीज का, १५-१६ श्लोकों में कामराज बीज का तथा १७-१८ श्लोकों में शक्ति बीज का उद्धार बताया गया है, जिसका कि स्वरूप हम ऊपर दे चुके हैं। १०वें श्लोक में ‘हस्यार्थः’ के स्थान पर ‘सस्यार्थः’ पाठ सही लगता है, किन्तु मूल ग्रन्थ में कोई पाठभेद न होने से हमने उसको छोड़ दिया है। द्वितीय बीज के केवल क और ल वर्ण के बीच में स्थित हकार का उद्धार किया गया है और इसी तरह तृतीय बीज के प्रथम हकार को ग्रहण न अर्थमजानानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् । उपमेयश्चक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥ (२।५४-५५) १. द्रष्टव्य—नि० षो० उपोद्घात, पृ० १०० की १ टि० ।
[ २४ ] करने का कारण बताया गया है। बाकी वर्ण द्वितीय तथा तृतीय बीज में प्रथम बीज के समान ही हैं। यहाँ वर्णों की पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी अवस्थाओं का भी वर्णन है। पश्यन्ती और मध्यमा वाणी का स्वरूप कामकलाविलास (श्लो० २३-२७) में वर्णित है और वैखरी वाणी का स्वरूप दीपिका (२।६३-६४) और अर्थरत्नावली (पृ० ३६-३७) में उद्धृत संकेतपद्धति के वचनों में अधिक स्पष्ट है। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री और अम्बिका—ये चार शक्तियाँ प्रकाशात्मक अनुत्तर अकार की तथा इच्छा, ज्ञान, क्रिया और शान्ता शक्तियाँ विमर्शात्मक हकार की अंशभूत हैं। इन अंशों (आठ) और अंशियों (दो) की व्यष्टि रूप में संख्या १० हो जाती है। इन सबका समष्ट्यात्मक भी एक रूप है और ये सभी मिल कर पश्यन्ती वाणी को एकादशधा विभक्त कर देते हैं। सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्या (तुरीय) अवस्थाओं की प्रतीक वामा आदि और इच्छा आदि चार-चार शक्तियों के व्यष्ट्यात्मक आठ और एक समष्ट्यात्मक स्वरूप मिल कर नवविध नादरूपा और भूतलिपिमयी मध्यमा वाणी के स्वरूप को प्रस्फुटित करते हैं। स्थूल और सूक्ष्म के भेद से यह दो प्रकार का है। इसका सूक्ष्म रूप नवनादमय तथा स्थूल स्वरूप नौ वर्ग वाली भूतलिपि¹ से बनता है। वैखरी वाणी के ४७ भेदों में आकार से सकार पर्यन्त वर्णों की गणना की जाती है। अकार और हकार की प्रकाशविमर्शात्मकता के कारण समष्टि और व्यष्टि रूप में इनका समावेश परा और पश्यन्ती वाणी में किया जाता है। ककार और षकार के संयोग से बने क्षकार की अलग से गणना नहीं की जाती और ळकार का लकार में अन्तर्भाव कर लिया जाता है। इस प्रकार यहाँ वैखरी वाणी के वर्णों की संख्या ४७ मानी जाती है। पश्यन्ती के ग्यारह, मध्यमा के नौ और वैखरी वाणी के ४७ वर्णों को मिलाकर इस मत में मातृका-पीठ में ६७ वर्ण माने जाते हैं। व्यष्टिरूप में तीन बीजों वाली इस सौभाग्यविद्या का समष्ट्यात्मक एक तुरीय (अनाख्य) स्वरूप भी है। यह परा वाणीमय है। परा देवी का परम आनन्द से ओत-प्रोत स्पन्दात्मक स्वभावसुन्दर स्वरूप इसी में छिपा हुआ है। प्रकाश और विमर्श का सामरस्य- मय यह स्वरूप शाश्वत ब्रह्म के ज्ञानमय स्वरूप में उसकी आराधना (मनन) करने वाले साधक की रक्षा करता है, अतः इसको मन्त्र² भी कहा जाता है। १. नौ वर्ग वाली भूतलिपि का परिचय पृ० ३२५ की टिप्पणी में दिया गया है। २. पुरुष-देवता के मनु को मन्त्र तथा स्त्री-देवता के मन्त्र को विद्या कहा जाता है। देखिये ऋजुविमर्शिनी - "पुंरूपवाच्याध्यासिता मन्त्राः····स्त्रीरूपवाच्याध्यासिताश्च विद्याः" (पृ० ४२-४३)। "मन्त्राः पुंरूपवाच्याधिष्ठिताः, विद्याः स्त्रीरूपवाच्याधिष्ठिताः" दीपिका (३।१५१)। भास्करराय ने गुरु(नाथ)नवरत्नमाला की व्याख्या में यह श्लोक उद्धृत किया है—"स्त्रीदैवत्याः स्मृता विद्याः पुंदैवत्यास्तु मन्त्रकाः" (पृ० ६)।
[ २५ ] इस तरह से चिह्न के समान श्रीविद्या में भी परा आदि चारों वाणियां निहित हैं। ऋग्वेद के "चत्वारि वाक्" प्रभृति मन्त्र का अर्थ इन चार वाणियों की तान्त्रिक व्याख्या में ही अधिक संगत लगता है, क्योंकि वाणी के परा, पश्यन्ती और मध्यमा नामक तीन स्वरूप छिपे हुए हैं और चौथी वैखरी वाणी को ही मनुष्य बोलते हैं। निरुक्त¹ अथवा महाभाष्य में प्रदर्शित व्याख्याओं में यह संगति बैठ नहीं पाती। मूल चक्र में स्थित परा वाक् से ही नाभिस्थान में पश्यन्ती और हृदय स्थान में मध्यमा वाणी तथा आगे कण्ठ आदि स्थानों में वैखरी वाणी की अभिव्यक्ति होती है। अमृतानन्द ने सौभाग्य- सुधोदय (१।६) में अनाहत, हृत और उत्तीर्ण पदों से मध्यमा, वैखरी और पश्यन्ती वाणी का क्रमशः बोध कराया है और कहा है कि परा वाणी से ही ये तीनों स्वरूप प्रकट होते हैं। यह बताया जा चुका है कि कामबिन्दु और उसकी विसर्गात्मक कला के मध्य में स्थित बिन्दु परा वाक् का निवास-स्थान है। इस कामकला में अकुल और कुल कुण्ड- लिनी रूप अकार एवं हकार समरस रूप में स्थित हैं। कामकला में स्थित इन दो अक्षरों में से हकार की स्थिति द्वितीय कामराज बीज में स्पष्टतया तथा अकार की स्थिति तृतीय शक्ति बीज में अस्पष्ट रूप से मानी गई है। वाग्भव बीज में ये समरस रूप में स्थित हैं। इसी समरस बिन्दु में जब स्पन्दन उठता है, विष (संसार) और अमृत (मोक्ष)- मय धर्म (शिव) और अधर्म (शक्ति) रूपी वाच्य अर्थ जब वाचक अक्षरों से संवलित हो जाते हैं, तब यह विश्वोत्तीर्ण महाविद्या विश्वरूप बन जाती है। उस समय तीन-तीन संख्या वाले सभी पदार्थों की समष्टिरूपिणी यह परा मातृका तीन कूटों का स्वरूप धारण कर व्यष्टिरूपिणी बन जाती है। इस प्रकार समष्टि और व्यष्टि रूपिणी इस आद्या शक्ति की पंचदशाक्षरी विद्या के अक्षरों में विविध रूपों में भावना करना ही भावार्थ कहलाता है। २. सम्प्रदायार्थ सम्प्रदाय (ज्ञान की परम्परा) गुरुमुख से ही जाना जा सकता है। यह विश्वातीत तत्त्व कैसे विश्वमय हो जाता है, इस विषय की जानकारी भी हमें इसी तरह से मिलती है। शिव और शक्ति, अकार और हकार के समरस स्वरूप से स्फुरित मूलविद्या से सारा जगत् किस तरह से व्याप्त है, सम्प्रदायार्थ में इसी विषय को स्पष्ट किया जाता है। यह विश्व पंचभूतमय है, सौभाग्यदेवता और उसकी मूलविद्या भी पंचभूतमय है। हकार से आकाश, ककार से वायु, रेफ से अग्नि, सकार से जल तथा लकार से पृथिवी की उत्पत्ति होती है। इस तरह से यह विश्वातीता शक्ति विश्वमय हो जाती है। इन भूतों में सब मिला कर जैसे पन्द्रह गुण होते हैं, उसी तरह से इस मूलविद्या में भी पन्द्रह अक्षर हैं। १. पृ० १२९ की टिप्पणी देखिये।
[ २६ ] इस पंचदशाक्षरी विद्या के पाँच वर्ण वाग्भव बीज में, छः कामराज बीज में और चार शक्ति बीज में स्थित हैं। स्वर और व्यंजन के भेद से इसके ३७ अवयव हो जाते हैं। ३६ तत्त्व इसके व्यष्टि रूप से बनते हैं और इसका ३७वां भेद समष्टिमय है। इस तरह से यहाँ भी इस विद्या की विश्वातीत और विश्वमय रूप में भावना की जाती है। विश्वातीत तत्त्व किस तरह से विश्वमय ३६ तत्त्वों का रूप धारण कर लेता है, इसका सुन्दर विश्लेषण टीकाकार ने अपने ही ग्रन्थ 'सौभाग्यसुधोदय के प्रथम प्रपंच के विस्तृत उद्धरण को देकर किया है। वस्तुतः जगत् का प्रत्येक पदार्थ और उसमें निहित शक्तियां शिव और शक्ति के समरस रूप परम तत्त्व से ही स्वात्मलाभ करते हैं। सौभाग्यविद्या में छः हकार हैं। हकार आकाश का बीज है, अतः इन हकारों में से पाँच हकार आकाश के पाँच गुणों के और छठा नादात्मक हकार इन सबका कारण है। विद्या स्थित तीन ईकार तथा कामकला का कारणभूत समरस बिन्दु वायु स्थित चार गुणों की उत्पत्ति में कारण हैं। तीन रेफ तीन रूपों के अभिव्यंजक हैं। २विद्या स्थित तीन सकारों में से दो जल और पृथिवी के रस के तथा तीसरा अमृत रस का जनक है। लकार से पृथिवीगत गुण की उत्पत्ति होती है। श्रीविद्या में तीन लकार हैं। ये तीनों तीन भुवनों में स्थित गन्ध गुण के द्योतक हैं। विद्या स्थित तीन ककारों में अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र नामक तीन प्रकार के प्रमाताओं की अभिव्यक्ति होती है। यहाँ अशुद्ध सकल, शुद्ध विज्ञानाकल और मिश्र प्रमाता प्रलयाकल कहलाते हैं। श्रीविद्यागत बारह अकारों में से दस जीव के, ११वां प्राण का और १२वां परम शिव का सूचक है। यद्यपि एक ही अकार से जीव तत्त्व का द्योतन हो सकता है, किन्तु एक ही तत्त्व जीवों के रूप में बहुधा विभक्त हो जाता है, इस बात को सूचित करने के लिये यहाँ दस अकारों की योजना की गई है। विद्यागत तीन बिन्दु रुद्र, ईश्वर और सदाशिव के तथा तीन नाद ३शान्ति, शक्ति तथा शंभु के बोधक हैं। मछली पकड़ने के जाल के लोहे के कड़े में जैसे सारे धागे १. पृ० १४५-१४६ की टिप्पणी देखिये। २. "विद्यास्थैश्चन्द्रबीजैः" (२।४१) यहाँ भास्करराय ने बहुवचन को द्विवचनपरक माना है, क्योंकि कादिविद्या में दो ही सकार हैं। ३. शान्ति शब्द से यहाँ बिन्दु का ग्रहण मानना चाहिये। शक्ति तत्त्व के पाँच भुवनों में से एक का नाम शान्ति है। इसको बैन्दव पुर भी कहा जाता है। श्रीकण्ठ सूरि ने रत्नत्रयपरीक्षा में बिन्दु की शिव और शक्ति के अतिरिक्त तृतीय रत्न के रूप में प्रतिष्ठा की है। इसी को वहाँ (श्लो० ७०-७१) महामाया और कुण्डलिनी भी कहा गया है। ब्रह्मरन्ध्र की अवसान भूमि में यह विश्राम करती है। पृ० १६९ की टिप्पणी में उठाई चर्चा इससे समाहित हो जाती है।
[ २७ ] और लोहे की गोलियाँ जुड़ी रहती हैं, उसी तरह से इस सौभाग्यविद्या में सब कुछ ओतप्रोत हैं। इस प्रकार यहाँ सौभाग्यविद्या का जो अर्थ बताया गया है, वह गुरु- (सम्प्रदाय) परम्परा से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिये इसे सम्प्रदायार्थ कहा जाता है। ३. निगर्भार्थ सौभाग्यविद्या के निगर्भार्थ के अनुसार शिव, गुरु और आत्मा की अभिन्नता, एकता का अनुसन्धान किया जाता है। यहाँ पहले शिव के निष्कल (निरवयव) स्वरूप का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। इसके बाद गुरु की भी उसी रूप में भावना की जाती है। ऐसा करने से अन्ततः शिष्य की आत्मा भी गुरुमय और शिवमय हो जाती है। ४—कौलिकार्थ कौलिक अर्थ में चक्र, देवता, विद्या, गुरु और आत्मा की एकता का अनुसन्धान किया जाता है। विद्यागत लकार से चतुरस्र की, शाक्त (सकार) से वृत्तत्रय और तदन्तर्गत षोडशदल एवं अष्टदल पद्म की अभिव्यक्ति होती है। तीन हृल्लेखाओं के तीन-तीन, अर्थात् नौ अक्षरों से नवयोनि चक्र निष्पन्न होता है। चतुर्दशार, बाह्यदशार और अन्तर्दशार की निष्पत्ति विद्यागत हकारों से होती है। विद्यागत ककार से महाबिन्दु- मय सदाशिवासन बनता है। इस तरह से चक्र और मन्त्र की अभिन्नता की भावना की जाती है। इसी चक्र से १११ आवरण देवताओं¹ वाली समष्ट्यात्मक परदेवता का दिव्य शरीर बनता है। नि० षो० (१।१) में देवी को गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी और राशि स्वरूपिणी कहा है। ऊपर बताये गये आवरण देवताओं के गण की अधीश्वरी होने से यह गणेश कहलाती है। सोम, सूर्य, अग्नि; इच्छा, ज्ञान, क्रिया और सत्त्व, रज, तम नामक गुणों के योग से यह ग्रहस्वरूपिणी है। ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनके विषय, चार अन्तःकरण, प्रकृति, गुण और आत्मा के भेद से यह नक्षत्रस्वरूपिणी है। त्वक् आदि छः धातुओं की अधिष्ठात्री डाकिनी आदि योगिनियाँ तथा आठ वर्गों की अधिष्ठात्री ब्राह्मी आदि देवियाँ इसी शक्ति का विलास हैं। इनके कारण यह योगिनी कहलाती है। प्राण आदि दस वायु, जीवात्मा और परमात्मा के भेद से यह राशिस्वरूपिणी है। सौभाग्यदेवता जैसे गणेश आदि भेदों से अलंकृत हैं, उसी तरह से परा, पश्यन्ती आदि चतुर्विध वाणी का स्वरूप धारण करने वाली सौभाग्यविद्या भी आदि, कादि और थादि के क्रम से विभक्त बीजों की स्वामिनी होने से गणेश कही जाती है। तीन कूटों में विद्यमान बीज, बिन्दु और ध्वनि (नाद) की नवात्मकता के कारण वह ग्रहात्मिका है। तीन हृल्लेखाओं के पन्द्रह तथा अन्य बारह अक्षरों के होने से यह नक्षत्रस्वरूपिणी है। विद्यागत तीन हृल्लेखाओं और १. पृ० १८३-१८४ मूल और टीका देखिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
[ २८ ]
तीन लकारों की शाक्त संज्ञा है। इसके कारण विद्या योगिनी कहलाती है और अन्तिम हृल्लेखाओं को छोड़ देने पर यह राशिस্বরূপिणी हो जाती है। सौभाग्यविद्या और सौभाग्यदेवता के समान श्रीचक्र में भी गणेश आदि की स्थिति है, इसका प्रकार दीपिका- कार (२।६७) ने बताया है। देवी के देह में जैसे गणेश आदि रूपों की योजना बताई गई है, उसी तरह से गुरु के देह में भी इस सब की भावना की जाती है। अन्ततः गुरु के प्रसाद से शिष्य में भी इन सब स्वरूपों की अभिव्यक्ति हो जाती है। यह सब श्रीविद्या के इस कौलिक अर्थ की भावना से होता है। ५. सर्वरहस्यार्थ बिजली के समान कान्ति वाले वाग्भव (त्रिकोण) के रूप में परिणत मूलाधार में अड़तीस ¹कलाओं से युक्त पचास वर्णों का शरीर धारण करने वाली विद्या कुण्डलिनी के रूप में विराजमान है। तीन मण्डलों का भेदन करने वाली, करोड़ों विद्युत्पुंजों के समान कान्ति वाली, कमलनाल में विद्यमान तन्तुओं के समान अत्यन्त सूक्ष्म आकृति वाली यह कुण्डलिनी शक्ति जब शून्यगगन में चन्द्रमण्डल से संयुक्त होती है, तो अमृत रस झरने लगता है। सदा आनन्दस्वरूपिणी यह शक्ति अपने इस अमृत रस से सारे संसार को आप्यायित किये रहती है। यह शक्ति स्वयं मेरी आत्मा है, ऐसी बुद्धि ही रहस्यार्थ के नाम से यहाँ प्रसिद्ध है। ६. महातत्त्वार्थ निष्कल, परम सूक्ष्म, निर्लक्ष्य, भाववर्जित, व्योमातीत, प्रकाश और आनन्द स्वरूप विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय परम तत्त्व में अपने को विलीन कर देने का ही नाम महा- तत्त्वार्थ है। इस परम स्वरूप के प्रकाश से ही तेज और तम जैसे विरोधी स्वभाव वाले भाव भी प्रकाशित होते हैं। इसीलिये यह सारा विश्व इसमें अभिन्न रूप से स्थित है। यह महातत्त्व स्वयं ही प्रकाशित होता है। इसके प्रकाश के लिये किसी दूसरे प्रकाश (तत्त्व) की आवश्यकता नहीं है। इस अर्थ की भावना से साधक समस्त संकल्पविकल्पात्मक स्थितियों से ऊपर उठ जाता है। इसका वर्णन महाज्ञानार्णव तन्त्र तथा विद्यापीठ संबन्धी आगमों में किया गया है। कौलाचार का पालन करने वाले, गुरु की पादुका की सेवा तथा योगिनीमेलन में उद्युक्त, विधिपूर्वक अभिषिक्त, समस्त शंकाओं से उन्मुक्त, सदा प्रसन्न चित्त रहने वाले व्यक्ति को ही गुरु-परम्परा से ज्ञान का सारा रहस्य प्राप्त होता है। ऐसा ही साधक इस सर्वरहस्यार्थ की भावना करने में समर्थ होता है।
१. पञ्चमन्त्रतनु शिव के अघोर आदि पाँच मुखों की स्वच्छन्दतन्त्र (१।५३-५९), नेत्र- तन्त्र (२२।२६-३४) आदि में वर्णित ३८ कलाओं का भी यहाँ ग्रहण किया जा सकता है।