भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ ४ ] प्रस्तुत संस्करण प्रधानतः इन दो मातृकाओं के आधार पर संशोधित है। इस विषय की चर्चा हम पृ० २२४ की टिप्पणी में भी कर चुके हैं। बड़ोदरा और उदयपुर की मातृकाओं का अलग-अलग उल्लेख नहीं किया जा सका है। क. मातृका से इनकी कहाँ कहाँ असहमति है, केवल इतना ही यहाँ दिखाया गया है। समय की कमी के कारण बड़ोदरा की तीन मातृकाओं का उपयोग तो मात्र कुछ संदिग्ध स्थलों के संशोधन में किया गया है। दीपिका के सभी हस्तलेखों में योगिनीहृदय के श्लोकों के केवल प्रतीक को न देकर पूरा व्याख्येय अंश उद्धृत कर अन्त में 'इति' पद जोड़ा गया है। इस संस्करण में श्लोकों के उसी क्रम को और उतने ही अंश को दिया गया है और टीका के 'इति' पद को हटा दिया गया है। दीपिका में उद्धृत वचनों का स्थलनिर्देश करने का भरसक प्रयत्न किया गया है। तब भी कुछ वचनों के मूल स्थानों को खोजने में हम असफल रहे हैं। परापंचाशिका की मातृकाएँ दीपिका और कामकलाविलास की १चिद्वल्ली टीका में परापंचाशिका के अनेक श्लोक उद्धृत हैं। यह कश्मीर संस्कृत ग्रन्थावलि, ग्रन्थांक १३ में अनुत्तरप्रकाशपंचा- शिका के नाम से छप चुकी है, किन्तु वह संस्करण त्रुटिपूर्ण है। इसकी एक मातृका हमें सरस्वती भवन में मिली। सन् ६८ की अपनी अध्ययन यात्रा के प्रसंग में मद्रास स्थित अड्यार पुस्तकालय की इसकी चार मातृकाओं से हमने पाठ-संकलन किया था। लखनऊ की अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् में भी इसकी एक मातृका मिली। सन् १९८५ में हमने भगवान् आशुतोष शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों की यात्रा पूरी की। उसी वर्ष जुलाई मास में मैसूर से प्रकाशित हो रहे संस्कृत दैनिक 'सुधर्मा' द्वारा आयोजित पत्रकार- गोष्ठी में 'गाण्डीवम्' के प्रतिनिधि के रूप में संमिलित होने के लिये की गई यात्रा के प्रसंग में मैसूर में भी इसकी एक मातृका मिली। इन सातों हस्तलेखों से पाठ संकलित किया हुआ था। प्रस्तुत संस्करण के मुद्रण के समय २५वें फर्मे के छः पृष्ठों को बचा हुआ देखकर इसके भी परिष्कृत संस्करण को यहाँ दे देने की इच्छा हुई और इस तरह से योगिनीहृदय और दीपिका के साथ परापञ्चाशिका का भी परिष्कृत संस्करण विज्ञ पाठकों की सेवा में प्रस्तुत हो सका है। इसके संशोधन में प्रयुक्त मातृकाओं का परिचय इस प्रकार है— अड्यार पुस्तकालय, मद्रास अक. टी, आर ८४६ तेलुगु लिपि अख. ६६५३४ ” १. चिद्वल्ली के पृ. ५-६ में उद्धृत श्लोक परापंचाशिका के न होकर अभिनवगुप्त की बोधपञ्चदशिका के हैं।

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