भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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[ ३ ] बी २४१७ ११ देवनागरी सं० १६६४ सी ४५४६ ५८ शारदा सी ४४२९ २० ,, सी ४८२८ २७ देवनागरी सरस्वती भवन पुस्तकालय वाराणसी, ओरियण्टल इंस्टीट्यूट बड़ोदरा, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान उदयपुर शाखा तथा हिन्दू विश्वविद्यालय की सूचियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वहाँ ऊपर दी गई संख्याओं के आधार पर इन मातृकाओं का विशेष परिचय प्राप्त किया जा सकता है। भारत के प्रायः प्रत्येक ग्रन्थालय में इन दोनों ग्रन्थों के एक-दो हस्तलेख अवश्य मिल जाते हैं। हमें खेद है कि न तो हम उनका परिचय प्राप्त कर सके और न उनका उपयोग ही कर सके। प्रस्तुत संस्करण उपर्युक्त तीनों संस्करण प्रधानतः क. (शंकरमठ) मातृका पर आधारित हैं, जबकि प्रस्तुत संस्करण में ख. और झ. मातृकाओं के आधार पर पाठों को संशोधित किया गया है। जैसे कि यहाँ कामकलाविलास के उद्धरण को छोड़कर अन्यत्र सभी जगह 'अस्मद्- गुरुक्त' के स्थान पर 'अस्मदुक्त' पाठ रखा गया है, क्योंकि ये सभी वचन अमृतानन्द द्वारा रचित ग्रन्थों के हैं। प्रथम संस्करण के स्वरूप को अधिक से अधिक बनाये रखने के लिये क. मातृका के पाठ में कोई त्रुटि न रहने पर उसी को मूल में रखा गया है और अन्य अनेक मातृकाओं से संवादित पाठ भी टिप्पणी में ही दिया गया है। क. मातृका में कहीं-कहीं अधिक पाठ मिलता है। अन्य किसी भी मातृका में उसके न मिलने पर उसको छोटे अक्षरों में कोष्ठक के अन्दर दिखाया गया है। कहीं-कहीं यह हटा भी दिया गया है। जैसे कि २.५६ की व्याख्या में चार श्लोकों के स्थान पर केवल एक ही श्लोक रखा गया है। चक्रसंकेत की पुष्पिका में आया 'वामकेश्वरतन्त्र' पाठ भी हटा दिया गया है, क्योंकि यह पृ० १०६ की व्याख्या के विपरीत पड़ता है। इस पर हम आगे विचार करेंगे। इसी तरह से २.६० की टीका के अंश को मूल टीकाग्रन्थ में रहने दिया है, किन्तु वहाँ आये 'याकिनी' पद को हटा दिया गया है। इसके लिये पृ० १९० की टिप्पणी अवलोकनीय है। यहाँ ३.३२ के स्थान पर ३.३० पढ़ना चाहिये। नि० बो० (३।१९-२०) में भी छः ही योगिनियाँ वर्णित हैं। इसी तरह की समस्याओं के समाधान के लिये यहाँ स्थान-स्थान पर टिप्पणियाँ दी गई हैं। जैसे कि अष्टधा अनाहत नाद की नवनादपरक व्याख्या के लिये पृ० १२३ और १९३ की पहली टिप्पणी देखी जा सकती है। ख. मातृका के पाठ को ही अधिकांश मातृकाओं का समर्थन मिलता है और इनकी त्रुटियों का संशोधन झ मातृका से हो जाता है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि

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