भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३५० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः आयुधदेवतानां ध्यानमाह— आयुधोस्त्वतिरक्ताभाः स्वायुधोज्ज्वलमस्तकाः । वरदाभयहस्ताश्च पूज्या १ध्यातृफलप्रदाः ॥१५९॥ त्वदीयाश्च मदीयाश्च पुंस्त्रीवश्यविधायिनः । आयुधा आयुध३देवताः, छान्दसत्वात् पुंल्लिङ्गप्रयोगः । स्वायुधोज्ज्वल- मस्तकाः स्वाधिष्ठितायुधपरि४कलितमस्तकाः । महापद्मवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम् । मदङ्गोपाश्रयां देवीमिच्छाकामफलप्रदाम् ॥ भवतीम् (३।१११-११२) इति पूर्वोक्तरीत्या महापद्मवनान्तस्थानाश्रितेश्वरस्य विश्वगुरोर्मामङ्कस्थाया अनाश्रितकलायास्तव संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः पुंवश्यविधायिनः, तादृशस्य मम संबन्धिनो बाणधनुःपाशाङ्कुशाः स्त्रीवश्यविधायिन इत्यर्थः । तदुक्तं चतुःशतीशास्त्रे— आयुध देवताओं का ध्यान बताते हैं— ये आयुध चटकीली लाल आभा (कान्ति) वाले हैं। इनके मस्तक पर अपना ही स्वरूप अंकित है। वर और अभय मुद्रा धारण किये हुए हैं। अपना ध्यान करने वाले को अभीष्ट फल देने वाले हैं। इसी चक्र में इनकी भी पूजा करनी चाहिये। तुम्हारे (कामेश्वरी के) आयुध पुरुष को और मेरे (कामेश्वर के) आयुध स्त्री को वश में करने में समर्थ हैं ॥१५९-१६०॥ आयुध शब्द से यहाँ आयुधदेवताओं का ग्रहण किया जाता है। आयुध शब्द का पुंलिंग में प्रयोग वैदिक पद्धति से किया गया है। ये आयुध अपने अपने मस्तक पर अपनी ही आकृति धारण किये रहते हैं। "महापद्मवन में बिराजमान, कारणानन्द शरीरवाली, इच्छानुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाली तुम मेरे अंक में विराज- मान हो" इस तरह से पहले (३।१११-११२) यहाँ महापद्मवन में स्थित विश्वगुरु कामेश्वर की गोद में विराजमान अनाश्रित कला भगवती का वर्णन किया गया है। इस युगल स्वरूप में से तुम्हारे (कामेश्वरी सम्बन्धी) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग पुरुषों को वश में करने के लिये तथा मेरे (कामेश्वर के) बाण, धनुष, पाश और अंकुश का प्रयोग स्त्रियों को वश में करने के लिये किया जाता है। चतुःशती शास्त्र (४।६०-६१) में इनका वर्णन इस तरह से किया गया है— १. धा अपि-ख. ने. छ. ज. झ. । २. व्रत-क. ग., प्रीति-उ. । ३. धाधिदे-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कल्पित-ख. ने. ज. झ. उ. ।