योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५१ मादनैर्मदनो भूत्वा पाशाङ्कुशधनुःशरैः । क्षोभयेत् स्वर्गभूलोकपातालतलयोषितः ॥ तथैव शाक्तैर्देवेशि त्रिपुरीकृतविग्रहः । १क्षोभयेद् देवगन्धर्वसिद्धविद्याधरानपि ॥ (४।६०-६१) स्पष्टमन्यत् ॥१५९-१६०॥ चतुःशतीशास्त्रेऽनुद्धृतत्वाच्छक्तिबाणात्मबीजान्युद्धरति— त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमँज्जार्णान्ताः सुरेश्वरि ॥१६०॥ द्वितीयस्वरसंयुक्ता एते बाणास्तवदीयाः । श्रीकण्ठादिन्यासपरिपाट्या त्वगादीनां धातूनां यवर्णादयः पञ्च, एते द्वितीय- स्वरसंयुक्ता बाणाः । आकारो द्वितीयः स्वरः, सामर्थ्याद् बिन्दुरपि ३लक्ष्यते । त्वदीयाका बाणाः ४त्वत्संबन्धिबाणबीजानि । तत्र यकारस्त्वगात्मकः, रेफोऽसृ- गात्मकः, लकारो मांसात्मकः, वकारो मेदस्वरूपः । ५अस्थिमज्जार्णान्तशब्दोऽस्थि- शिव संबन्धी पाश, अंकुश, धनुष और बाण को धारण कर स्वयं शिवस्वरूप हो साधक स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और पाताल तल में विद्यमान स्त्रियों को भी क्षुब्ध कर देता है । इसी तरह से हे देवेशि ! शक्ति संबन्धी आयुधों को धारण कर त्रिपुरा स्वरूप हुआ साधक देव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर आदि को भी क्षुब्ध कर देता है ॥ बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१५९-१६०॥ चतुःशती शास्त्र में उद्धृत न होने से अब यहाँ शक्ति के बाण बीजों का उद्धार किया जा रहा है— हे सुरेश्वरि ! त्वक्, असृक्, मांस, मेदा और अस्थिमज्जान्त (शुक्र) धातुओं के वाचक वर्णों को द्वितीय स्वर से संयुक्त कर देने पर तुम्हारे (शक्ति के) बाण- बीज बनते हैं ॥१६०-१६१॥ श्रीकण्ठ न्यास में बताई गई पद्धति से त्वक् आदि पांच धातुओं के १यकार आदि पांच वर्ण होते हैं । इनको द्वितीय स्वर से संयुक्त करने पर ये बाणबीज बन जाते हैं । दूसरा स्वर आकार है । बीज पद को सार्थक करने के लिये बिन्दु भी इनके साथ जोड़ा जाता है । इस तरह से तुम्हारे बाण, शक्तिसंबन्धी बाणबीज बनते हैं । यहाँ यकार त्वगात्मक, रेफ असृगात्मक, लकार मांसात्मक और वकार मेदास्वरूप है । अस्थिमज्जा- १. साधयेद्-मु. । २. शुक्लानां च महे-क. ग. । ३. लभ्यते-क. ग. । ४. तव धनुषि बाण-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अस्थिशब्द उपरि स्थितेन शुक्लात्मकेन सकारेणा- न्वेति-क. ग. ।
- तन्त्राभिधान में संगृहीत प्रकारान्तर मन्त्राभिधान (पृ० १९-२१) में यह विषय देखा जा सकता है ।