योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 402, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें३५२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः मज्जयोरुपरि स्थितं शुक्रात्मकं सकारं लक्षयति । चतुः^१शतीशास्त्रेऽप्यनुक्तानां कामेश्वरबाणबीजानाम्—"आदौ ^२पादावरेण्याख्यां ^३संयुजेन्नलरक्रमे" इति स्वच्छन्दसंग्रहोद्धृतत्वादागमान्तरेषु प्रसिद्धत्वान्नात्रोद्धारः क्रियते ॥१६०-१६१॥ वामादीनां पुराणां तु जननी त्रिपुराम्बिका ॥१६१॥ परस्वातन्त्र्यरूपत्वादिक्षासिद्धिर्महेश्वरि । एताः सर्वोपचारेण पूजयेत् तु वरानने ॥१६२॥ वामादीनां वामाज्येष्ठारौद्र्याख्यानां मित्रेशादिरूपाणां ^४मिच्छाज्ञानक्रिया^५त्मक- विमर्शशक्त्यंशकामेश्वर्याद्यधि^६ष्ठानत्वात् पुरशब्दवाच्यत्वम्, तेषां त्रिपु- राणां जननी समष्टिरूपत्वादम्बिकाशक्ति^७रेव त्रिपुराम्बिका, निरुक्ता ^८चक्रे- श्वरीति शेषः। "स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि" इत्याज्ञावतारोक्तरीत्या परशिवस्य विश्वसर्जनसंहारलक्षणस्वातन्त्र्यलक्षणेच्छासिद्धि ^९रेतच्चक्राचर्कस्य र्णान्त शब्द अस्थि और मज्जा के ऊपर स्थित शुक्रात्मक सकार को लक्षित करता है। चतुःशती शास्त्र में कामेश्वर के बाण बीजों का भी उद्धार नहीं बताया गया है किन्तु उनका उद्धार 'स्वच्छन्दसंग्रह में बता दिया गया है और आगमान्तर में भी ये प्रसिद्ध हैं, अतः उनका उद्धार यहाँ नहीं किया गया है ॥१६०-१६१॥ त्रिपुराम्बिका वामा आदि तीन पुरों की जननी है। हे महेश्वरि ! अपनी परम स्वातन्त्र्य शक्ति के कारण यह अपने साधक को इच्छासिद्धि प्रदान करने वाली है। हे वरानने ! इस अष्टम चक्र में इन सबकी पूजा करनी चाहिये ॥१६१-१६२॥ मित्रेश आदि तीन प्रकाशों की अंशभूत वामा, ज्येष्ठा और रौद्री नामक शक्तियों में इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मक विमर्शांशभूत कामेश्वरी आदि शक्तियां अधिष्ठित हैं, अतः वामा आदि को यहाँ पुर नाम दिया गया है। इन तीनों पुरों की जननी समष्टिस्वरूपिणी अम्बिका शक्ति है। इसी को 'त्रिपुराम्बिका' कहते हैं। इस अष्टम चक्रेश्वरी का ही स्वरूप यहाँ बताया गया है। आज्ञावतार के वर्णन के अनुसार यह शक्ति सारे जगत् १. शत्यामप्यनुद्धृतानां-क. ग.। २. यायो-झ. । ३. रक्तयोर्नीलरक्तयोः-ख. ने. ज. उ. ब., संयुजेन्नीलरक्तयोः-झ. । ४. णां पुराणामि-ख. झ. उ. । ५. मय-ख. ज. झ. उ. । ६. ष्ठितत्वात्-क. ग. । ७. क्तेरेतत् त्रि-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. चक्रेशी-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. रेतदर्च-ख. ने. ज. झ. उ. । १. दीपिका में उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन से तो यह विषय स्पष्ट नहीं होता, किन्तु ऋजुविमर्शिनी (पृ० २५५) तथा सुभगोदय (पृ० २९५) में कामेश्वरी और कामेश्वर के बाणबीजों का उद्धार स्वरूप बताया गया है।