योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५३ सिद्धयति, १सेयमिच्छासिद्धिरस्मिन् चक्रे स्थितेत्यर्थः । एता आयुधदेवताः कामेश्व- र्याद्याश्चक्रे२श्वरीसिद्धियुताः सर्वोपचारैर्गन्धादिभिरुपचारैः पूजयेत् ॥१६१-१६२॥ नवमचक्रपूजां सवासनामाह— सर्वानन्दमये देवि परब्रह्मात्मके परे । चक्रे संवित्तिरूपा च महात्रिपुरसुन्दरी ॥१६३॥ स्वैराचारेण सम्पूज्या त्वहन्तेदन्तयोः समा । महाकामकलारूपा “आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (तै० उ० ३।६), “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” (बृ० उ० ४।३।३२) इति ३श्रुत्युक्तरीत्या सर्वानन्द- समष्टिभूतपरमानन्दमयत्वात् परब्रह्मात्मके । अत एव परे विश्वोत्तीर्णे । ४परम- शिवस्पन्दमयत्वाच्चक्रे नवमे संवित्तिरूपा, “स्वसंवित् त्रिपुरा देवी लौहित्यं तद्वि- मर्शनम्” इत्यभियुक्त५वचनोक्तरीत्या वेदकवेद्ययोरहन्तेदन्तयोः समा मध्यस्था को निगलती और उगलती रहती है। इस शक्ति की उपासना करने वाले को भी विश्व की सृष्टि और संहार करने की स्वातन्त्र्य (सामर्थ्य) स्वरूपिणी इच्छासिद्धि प्राप्त हो जाती है। अतः इस इच्छासिद्धि की भी इसी चक्र में पूजा की जाती है। इन सबकी— आयुध देवताओं की, कामेश्वरी आदि तीन देवियों की और इच्छासिद्धि के साथ चक्रेश्वरी त्रिपुराम्विका की—गन्ध, पुष्प आदि सभी उपचारों से यहाँ पूजा करनी चाहिये ॥१६१-१६२॥ नवम चक्र की पूजाविधि वासना के साथ बताते हैं— हे देवि ! परब्रह्मात्मक सर्वानन्दमय श्रेष्ठ चक्र में संवित्ति स्वरूपिणी महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा स्वैराचार से करनी चाहिये। महाकामकला स्वरूपिणी यह देवी अहन्ता और इदन्ता इन दोनों ही स्थितियों में समान स्वरूप वाली है ॥१६३-१६४॥ “ऋषि (भृगु वारुणि) ने जान लिया कि आनन्द ही ब्रह्म है”, “इसी ब्रह्मानन्द की एक मात्रा का अन्य प्राणी उपभोग करते हैं” इत्यादि श्रुतियों के प्रमाण से सर्वानन्द के समष्टिभूत परमानन्दमय परब्रह्मात्मक इस विश्वोत्तीर्ण परम चक्र में परमशिव का स्पन्दन स्पष्ट भासित होने लगता है, इसीलिये यह संवित्तिस्वरूप है। १किसी अभि- युक्त ने कहा है—“स्वसंवित् ही त्रिपुरा है और उसकी ललाई ही विमर्श शक्ति है”। १. अतः सेय-क.ग. । २. श्चक्रेशी-झ. उ. । ३. श्रुत्युक्ता-ख. ने. ग. झ .उ. । ४. परशिवानन्दमय-ख. ने. । ५. युक्तोक्त-ख. ने. ग. झ. उ. ।
- प्रस्तुत श्लोक को भी भास्करराय ने नित्याषोडशिकार्णव (५।४१) का अंग मानकर उसकी व्याख्या की है। (द्र० सेतुबन्ध, पृ० १२६) २३