योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः संवित्तिर्महात्रिपुरसुन्दरी पूर्वोक्त (१।८५) निर्वचना। महाकामकलारूपा प्रकाश- विमर्श¹सामरस्यमहाबिन्दुत्रयमयहार्धकला महाकामकला, तद्रूपा “बिन्दुं संकल्प्य वक्त्रं तु” (१।१८५) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्या। ²स्वैराचारेण सम्पूज्य, यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत्। तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं संप्रकाशते॥ (श्लो० ७८) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या निजेच्छानुरूपैरिन्द्रियप्रीणनैर्द्रव्यैः परिस्फुर- त्परमानुसन्धानलक्षणेन स्वैराचारेण सम्पूज्य, स्वसंविद्देवता भावनीयेत्यर्थः ॥१६३-१६४॥ प्राप्तिसिद्धिमाह— पीठविद्यादिसिद्धिदा ॥१६४॥ महामुद्रामयी देवीपूज्य। “का पू जा ओ इति क्रमात्” (१।४१) इति पूर्वोक्ताः पीठाश्चत्वारः। विद्याः वाग्भवकामराजशक्ति³तुरीयबीजात्मिकाः। आदिशब्दाद् देवताः कामेश्वर्याद्या- इस तरह से यह संवित् वेद्य और वेदक दशा में, अहन्ता और इदन्ता की स्थिति में समान स्वरूप वाली है, अर्थात् सभी अवस्थाओं में यह मध्यस्थ रूप में विद्यमान है। इस तरह से यह मध्यस्थ संवित्ति ही महात्रिपुरसुन्दरी है। इसकी निरुक्ति पहले (१।८५) बताई जा चुकी है। यह महाकामकला स्वरूपिणी है। प्रकाश और विमर्श के सामरस्य स्वरूप तीन महाबिन्दुओं वाली हार्धकला को ही महाकामकला कहा जाता है। यह नवम चक्रेश्वरी महाकामकला स्वरूपिणी है। चतुःशती शास्त्र (१।१८५) में इसका स्वरूप बताया गया है। स्वैराचार से इसकी पूजा करनी चाहिये। विज्ञान- भैरव भट्टारक का कहना है— जहाँ जहाँ मन को तुष्टि हो, वहीं मन को स्थिर कर देना चाहिये। ऐसा करने से उसी में अपना परमानन्दात्मक स्वात्मस्वरूप प्रकाशित हो उठता है॥ इसी पद्धति से अपनी इच्छा के अनुसार इन्द्रियों को तृप्त करने वाले द्रव्यों से, इन्हीं में अपने स्वात्मस्वरूप को खोजता हुआ साधक यथेच्छ आचरण द्वारा नवम चक्रेश्वरी की पूजा और भावना करे ॥१६३-१६४॥ प्राप्ति नामक सिद्धि का अब वर्णन करते हैं— यह देवी पीठ, विद्या आदि की प्राप्तिरूप सिद्धि को देने वाली है। महा- मुद्रामयी इस देवी की पूजा यहीं की जाती है ॥१६४-१६५॥ का पू जा ओ के क्रम से चार पीठ पहले (१।४१) बताये जा चुके हैं। वाग्भव, १. व्याससमासमयबिन्दुत्रयहार्धकला—क. झ.। २. 'स्वैरा''''कोक्तरीत्या' नास्ति— क.। ३. तूर्यबीजा—ते., ज.।