योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 405, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५५ श्चतस्रः। तेषां ^१तुरीयातीतपदपरशिवविश्रान्तिलय^२लक्षणां सिद्धिं ददाति प्रापयतीति प्राप्तिसिद्धिः। महामुद्रामयी महामुद्रा सर्व^३मुद्रासमष्टिभूतत्वाद् योनिमुद्रा, तन्मयी पूज्येत्यर्थः ॥१६४-१६५॥ पञ्चदशात्मिका । ^४तत्तत्तिथिमयी नित्या नवमी भैरवी परा ॥१६६॥ प्रतिचक्रं ^५समुद्रास्तु चक्रसंकेतकोदिताः^६। पञ्चदशात्मिका पञ्चदशाक्षर्या विद्याया वाच्यभूता पञ्चदशभूतगुणात्मिका। तत्तत्तिथिमयी प्रतिपदादिपञ्चदशतिथि^७रूपा। नित्या निजसुखमयनित्यनिरुपमा- कारा। नवमी भैरवी परा। "मूलविद्या तथा ^८प्रोक्ता" (२।५) इति पूर्वोक्तरीत्या मूलविद्यारूपनवमचक्रेश्वरी विद्या^९ षोडशकलात्मिका मूलदेवी नवमचक्रेश्वरी ^१०पूज्येत्यर्थः। प्रतिचक्रं त्रैलोक्यमोहनादिष्वेकेकस्मिन् चक्रे। चक्रसंकेत^११कोदिताः कामराज, शक्ति और तुरीय बीजात्मक विद्याओं का भी वर्णन किया जा चुका है। आदि शब्द से कामेश्वरी आदि चार देवियों का ग्रहण किया जाता है। इन सबको परशिव- स्वरूप तुरीयातीत पद में विश्रान्ति देने वाली, उसमें लीन कर देने वाली सिद्धि को प्राप्त करा देने वाली यह देवी प्राप्तिसिद्धि स्वरूपिणी है। यही देवी महामुद्रामयी भी है। सभी मुद्राओं की समष्टिरूपिणी योनिमुद्रा को महामुद्रा कहा जाता है। योनिमुद्रामयी महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा यहीं करनी चाहिये ॥१६४-१६५॥ पंचदश भूतगुणात्मिका, प्रतिपदादि तिथिरूपिणी पन्द्रह देवियां तिथि- नित्या और नवीं पराभैरवी मूलविद्या कहलाती हैं। इन सबकी यहाँ पूजा करनी चाहिये। चक्रसंकेत में वर्णित मुद्राओं का पूजन तो प्रत्येक चक्र में अलग अलग होना चाहिये ॥१६५-१६६॥ पंचदशात्मिका का अर्थ पंचदशाक्षरी विद्या के वाच्यभूत पन्द्रह भूतगुण शब्द, स्पर्श आदि से सम्पन्न प्रतिपदादि तिथियों की अधिष्ठात्री पन्द्रह तिथिनित्यायँ है। इनको नित्या इसलिये कहते हैं कि ये सब निज सुखमय नित्य निरुपम आकार से सम्पन्न हैं। इन अवयव नित्याओं से सम्पन्न नवीं पराभैरवी अवयवी नित्या है। पहले (२।५) बताया जा चुका है—"इसी को मूलविद्या भी कहते हैं"। यह मूलविद्या ही नवम चक्रेश्वरी विद्या है और यही अवयव और अवयवी नित्याओं के भेद से सोलह कला वाली मूल देवी है। नवम चक्र की स्वामिनी के रूप में इसकी पूजा की जाती है। प्रतिचक्र का १. तुर्या—ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'लय' नास्ति—क. ग.। ३. विद्या—क. ग.। ४. संपूज्या परमेशानि तत्तत्तिथिमयी परा—ख. ने. च. छ. ज. उ.। ५. तु मु—ख. च. छ. ज. झ.। ६. तचोदिताः—ख. च. छ. ज. झ.। ७. पद—ने. ज. झ. उ.। ८. ख्याता— क. ग.। ९. विद्यामुच्चार्य नवमचक्रेश्वरीविद्या या षोडश—ख. ने. ज. झ. उ.। १०. संपू- जयेन्ने—ने. उ.। ११. ते चोदिताः—ख. ज. उ.।