योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः १"योनिप्राचुर्यतः सैषा सर्वसंक्षोभिणी पुनः" (१।५९) इत्यादिना चक्रसंकेते चक्रे विहिताः सर्वमुद्राः सर्वसंक्षोभिण्याद्यास्तत्तच्चक्रमुद्रास्तत्तच्चक्रेषु पूज्या इति योज्यम् ।।१६५-१६६।। नित्यक्लिन्नादिकाश्चैव काम्यकर्मानुसारतः ।।१६६।। चतुरस्रान्तराले वा त्रिकोणे वा यजेत् सुधीः । कामेश्वरीभगमालिन्योरावरणान्तःपातित्वात् २तयोर्मध्यत्रिकोणाग्रवाम- कोणयोः स्थितिरुक्ता । शिष्टाः— नित्यक्लिन्ना३ तथा नित्या भेरुण्डा वह्निवासिनी ।। महाविद्येश्वरी दूती त्वरिता कुलसुन्दरी । नित्या नीलपताका च विजया सर्वमङ्गला ।। ज्वालामालिनी चित्रा च (१।२६-२८) इति चतुःशतीशास्त्रोक्तास्त्रयोदशनित्यास्त्रिकोणे वा, श्रीचक्रमध्यत्रिकोणे वा, चतु- रस्रान्तराले वा षोडशदलचतुरस्रान्तराले वा काम्यकर्मानुसारतः वश्यादिकाम्य- कर्मानुरूपवर्णध्यानपुष्पादिभिः । सुधीः तत्तत्काम्यकर्म४विधानविषयज्ञो ५यजेत् ।।१६६-१६७।। अभिप्राय यह है कि त्रैलोक्यमोहन आदि एक एक चक्र में चक्रसंकेत प्रकरण में उपदिष्ट सर्वसंक्षोभिणी आदि सभी नौ मुद्राओं को उस उस चक्र की मुद्रा के रूप में उन उन चक्रों में पूजा होनी चाहिये ।।१६५-१६६।। काम्य कर्म के अनुसार प्रयोग करने वाले विद्वान् को चाहिये कि वह चतुरस्र के अन्तराल में अथवा त्रिकोण में नित्यक्लिन्ना आदि तिथिनित्याओं की पूजा करे ।।१६६-१६७।। पन्द्रह तिथिनित्याओं में १कामेश्वरी और भगमालिनी के नाम भी पठित हैं। मध्यत्रिकोण के अग्र भाग और वाम कोण में इनको पूजाविधि बताई जा चुकी है। बाकी की नित्यक्लिन्ना, भेरुण्डा, वह्निवासिनी, महाविद्येश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताका, विजया, सर्वमंगला, ज्वालामालिनी और चित्रा नामक चतुःशती शास्त्र (१।२६-२८) में प्रोक्त तेरह नित्याओं की पूजा त्रिकोण में, अर्थात् श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोण में, अथवा चतुरस्रान्तराल में, अर्थात् षोडशदल और चतुरस्र के बीच में वशीकरण आदि काम्य कर्मों के अनुरूप वर्ण, ध्यान, पुष्प आदि से पूजा १. ‘योनि''''स्तत्तत्’ नास्ति-क. ग.। २. तन्मध्य-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. न्नाभिधा-मु. । ४. कर्मानुवि-ख. । ५. 'यजेत्' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । १. यहाँ अमृतानन्द तिथिनित्याओं से त्रिकोण स्थित कामेश्वरी एवं भगमालिनी का अभेद मान कर व्याख्या करते हैं, जब कि भास्करराय इनमें भेद मानते हैं। अमृतानन्द