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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

३५६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः १"योनिप्राचुर्यतः सैषा सर्वसंक्षोभिणी पुनः" (१।५९) इत्यादिना चक्रसंकेते चक्रे विहिताः सर्वमुद्राः सर्वसंक्षोभिण्याद्यास्तत्तच्चक्रमुद्रास्तत्तच्चक्रेषु पूज्या इति योज्यम् ।।१६५-१६६।। नित्यक्लिन्नादिकाश्चैव काम्यकर्मानुसारतः ।।१६६।। चतुरस्रान्तराले वा त्रिकोणे वा यजेत् सुधीः । कामेश्वरीभगमालिन्योरावरणान्तःपातित्वात् २तयोर्मध्यत्रिकोणाग्रवाम- कोणयोः स्थितिरुक्ता । शिष्टाः— नित्यक्लिन्ना३ तथा नित्या भेरुण्डा वह्निवासिनी ।। महाविद्येश्वरी दूती त्वरिता कुलसुन्दरी । नित्या नीलपताका च विजया सर्वमङ्गला ।। ज्वालामालिनी चित्रा च (१।२६-२८) इति चतुःशतीशास्त्रोक्तास्त्रयोदशनित्यास्त्रिकोणे वा, श्रीचक्रमध्यत्रिकोणे वा, चतु- रस्रान्तराले वा षोडशदलचतुरस्रान्तराले वा काम्यकर्मानुसारतः वश्यादिकाम्य- कर्मानुरूपवर्णध्यानपुष्पादिभिः । सुधीः तत्तत्काम्यकर्म४विधानविषयज्ञो ५यजेत् ।।१६६-१६७।। अभिप्राय यह है कि त्रैलोक्यमोहन आदि एक एक चक्र में चक्रसंकेत प्रकरण में उपदिष्ट सर्वसंक्षोभिणी आदि सभी नौ मुद्राओं को उस उस चक्र की मुद्रा के रूप में उन उन चक्रों में पूजा होनी चाहिये ।।१६५-१६६।। काम्य कर्म के अनुसार प्रयोग करने वाले विद्वान् को चाहिये कि वह चतुरस्र के अन्तराल में अथवा त्रिकोण में नित्यक्लिन्ना आदि तिथिनित्याओं की पूजा करे ।।१६६-१६७।। पन्द्रह तिथिनित्याओं में १कामेश्वरी और भगमालिनी के नाम भी पठित हैं। मध्यत्रिकोण के अग्र भाग और वाम कोण में इनको पूजाविधि बताई जा चुकी है। बाकी की नित्यक्लिन्ना, भेरुण्डा, वह्निवासिनी, महाविद्येश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताका, विजया, सर्वमंगला, ज्वालामालिनी और चित्रा नामक चतुःशती शास्त्र (१।२६-२८) में प्रोक्त तेरह नित्याओं की पूजा त्रिकोण में, अर्थात् श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोण में, अथवा चतुरस्रान्तराल में, अर्थात् षोडशदल और चतुरस्र के बीच में वशीकरण आदि काम्य कर्मों के अनुरूप वर्ण, ध्यान, पुष्प आदि से पूजा १. ‘योनि''''स्तत्तत्’ नास्ति-क. ग.। २. तन्मध्य-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. न्नाभिधा-मु. । ४. कर्मानुवि-ख. । ५. 'यजेत्' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । १. यहाँ अमृतानन्द तिथिनित्याओं से त्रिकोण स्थित कामेश्वरी एवं भगमालिनी का अभेद मान कर व्याख्या करते हैं, जब कि भास्करराय इनमें भेद मानते हैं। अमृतानन्द

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५७ चक्रपूजामुपसंहरन् कुलदीपनिवेदनमाह— अलिना पिशितैर्गन्धैर्धूपैराराध्य देवताः ॥१६७॥ चक्रपूजां विधायेत्थं कुलदीपं निवेदयेत् । अन्तर्बहिर्भासमानं स्वप्रकाशोज्ज्वलं प्रिये ॥१६८॥ अलिना हेतुना। १पिशितगन्धधूपशब्दाः स्पष्टार्थाः। देवताः त्रैलोक्यमोहनादि- बैन्दवान्तनवचक्रगताः, अलिपिशितगन्ध २धूपैराराध्य, इत्थ पूर्वोक्तरीत्या चक्रपूजां विधाय कुलदीपम्, कुलं षट्त्रिंशत्तत्त्वसमुदायरूपं शरीरम्, तत्र भवं ३ दीपम्, "ततो हृदयपद्मान्तः स्फुरन्तीं सांविदीं४ कलाम्" (सु० ३४) इत्यभियुक्त ५वचनोक्त- रीत्या हृदयान्तर्भासमानं संवित्कलारूपं दीपम्, इन्द्रियद्वारा बहिरर्थेषु तद्रूपेण ६भासमानम्, अत एव स्वप्रकाशोज्ज्वलं तत्र प्रमाणनिरपेक्षप्रतीतिकं निर्वाणरहितं करनी चाहिये। यहां सुधी पद का अर्थ है उन उन काम्य कर्मों के विधि-विधान को अच्छी तरह से जानने वाला ॥१६६-१६७॥ चक्रपूजा का उपसंहार करते हुए कुलदीप के निवेदन की विधि बताते हैं— अलि, पिशित, गन्ध, धूप आदि से सभी देवताओं की आराधना करने के बाद चक्रपूजा की समाप्ति पर कुलदीप प्रज्वलित करे । हे प्रिये ! यह कुलदीप अपने प्रकाश की उज्ज्वल आभा से हृदय के भीतर और बाहर भी आलोक फैलाने वाला है ॥१६७-१६८॥ अलि का अर्थ हेतु द्रव्य है। पिशित, गन्ध और धूप शब्दों का अर्थ स्पष्ट है। त्रैलोक्यमोहन से बैन्दव पर्यन्त सभी नौ चक्रों में निवास करने वाले देवताओं की अलि, पिशित, गन्ध, धूप आदि से ऊपर बताई पद्धति के अनुसार आराधना कर लेने के उपरान्त कुलदीप को प्रज्वलित करना चाहिये। कुल शब्द का अर्थ है छत्तीस तत्त्वों का समुदाय स्वरूप यह शरीर । इस शरीर में दीपक जलाना चाहिये। शिवानन्द मुनि के अनुसार "हृदय रूपी कमल में स्फुरित होने वाली सांविदी कला ही दीपक है"। संवित्कला के स्फुरण से हृदय के भीतर प्रज्वलित यह दीप इन्द्रियों के द्वारा बाह्य पदार्थों में अपना प्रकाश फैलाता है। अपने इस अद्भुत उज्ज्वल प्रकाश से यह दीपक हृदय के भीतर और बाहर भी बिना किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा रखे भासित होता रहता है और यह कभी १. पिशितैर्मांसैः-क. ग. ने. । २. धूपदीपै-क. ग. । ३. 'भवं' नास्ति-ख. ने.०ज. झ. ड. । ४. संविदं-ख. ने. ज. झ. ड. । ५. युक्तोक्त-ख. ने. ज. झ. ड. । ६. 'भासमानं' नास्ति-ख. ज. झ. ड. । की व्याख्या का खण्डन करते समय वे वज्रेश्वरी का उल्लेख करते हैं, किन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि तिथिनित्याओं में वज्रेश्वरी की गणना नहीं है।

३५८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः च १कुलदीपं निवेदयेत् । पुनः प्रत्यङ्मुखतया तेनैव द्वारेणान्तः संविद्विश्रान्ति- स्तन्निवेदनं नाम ॥१६७-१६८॥ पुष्पाञ्जलिं ततः कृत्वा जपं कुर्यात् समाहितः । संयम्येन्द्रियसंचारं प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् । एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ॥ इति २प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या समाहितः३ नियतेन्द्रियः, नादरूपमन्त्रो- च्चारणलक्षणं जपं कुर्यात् । शिष्टं स्पष्टम् ॥१६९॥ जपप्रकारमाह४— कूटत्रये महादेवि कुण्डलीत्रितयेऽपि च ॥१६९॥ चक्राणां पूर्वपूर्वेषां नादरूपेण योजनम् । कूटत्रये कूटानां वाग्भवकामराजशक्तिबीजाख्यानां त्रये । कुण्डलीत्रितयेऽपि च । कुण्डलीनां त्रितयं ५कुण्डलीत्रयम्, “आधारं ६हृदयं बिन्दुस्थानं च परिकी- र्तितम्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तेषु आधारहृदयभ्रूमध्येषु स्थितानां बीजत्रयशिखर- बुझता नहीं है । इस तरह के कुलदीप को देवियों को समर्पित करे । बाहर की तरफ दौड़ रही इन्द्रिय-वृत्तियों को अन्तर्मुख बना कर, उसी इन्द्रिय-मार्ग से उनको भीतर ले जा कर अपने संवित्स्वभाव में उनको विलीन कर देना हो, उनको विश्राम दिला देना ही यहाँ निवेदन शब्द का अर्थ है ॥१६७-१६८॥ तब पुष्पांजलि प्रदान कर समाहित चित्त से जप करे ॥ किसी प्रामाणिक१ व्यक्ति ने जप के विषय में कहा है— इन्द्रियों के बाहरी संचार को रोक कर आन्तर नाद का उच्चारण करे । वास्तविक जप इसी को कहा जाता है । बाह्य जप वस्तुतः जप नहीं है ॥ साधक को चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियों को वश में करके नादरूप मन्त्र का उच्चारण करते हुए जप करे । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१६९॥ अब इस जप की विधि बताते हैं— हे महादेवि ! तीन कूटों में और तीन कुण्डलियों में एक एक चक्र का नाद के रूप में संयोजन हो जप कहलाता है ॥१६९-१७०॥ कूटत्रय का अर्थ है वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक तीन बीज और कुण्डली- त्रय का अर्थ स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण पर आधार, हृदय और बिन्दुस्थान है । इसका १. ‘कुलदीपं’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रमाण-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. हिते- न्द्रियः-ख. ने. ज. उ. । ४. मेवाह-ख. झ. उ. । ५. ‘कुण्डलीत्रयम्’ नास्ति-क. ग. । ६. चैव हृद्बिन्दु-ख. ने. ज. झ. । I. पृ० २२७ की दूसरी टिप्पणी देखिये ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५९ वर्तिकामकलान्तर्गतसपरार्धकलारूपाणां वह्निसूर्यसोम¹कुण्डलिनीनां त्रये। चक्राणां पूर्वपूर्वैषाम्। "अकुले विषुसंज्ञे च" (१।२५) इत्यत्रोक्ताऽकुलादिबिन्दुन्तस्थानेषु नवसु भावितानां त्रैलोक्यमोहनादिनवचक्राणामेकैकस्मिन् बीजे कुण्डलिन्यां च त्रिशस्त्रिशो विभज्य योजितानां नादरूपेण योजनम्। त्रैलोक्यमोहनादि²नवचक्र- स्थादित्रयस्याधारस्थवह्नि³मण्डलस्थितवाग्भवशिखरवर्तिकामकलान्तर्गतहार्धकला- रूपवह्निकुण्डलिन्युत्थानोदितहृद्⁴गतकामराजबीजपर्यन्तव्यापिनादमयताभावनं वाग्भवबीजजपः। सर्वसौभाग्यदायकादिचक्रत्रयस्य हृदयस्थसूर्यमण्डलस्थित- कामराजशिखरवर्तिकामकलान्तर्गतहार्धकलारूपसूर्यकुण्डलिन्युत्थानोदितबिन्दुस्था- नगतशक्तिबीजपर्यन्तव्यापिनादमयताभावनं कामराजबीजजपः। सर्वरोगहरादि- चक्रत्रयस्य "बिन्दुस्थानेन्दुमण्डलान्तर्गतशक्तिबीजशिखरवर्ति⁶कामकलान्त- र्गतहार्धकलारूपसोमकुण्डलिन्युत्थानोदितब्रह्मरन्ध्रोपरिस्थितशिवतत्त्वातीतसमना- सोमपर्यन्तव्यापिना नादेन सहोन्मन्यां लयभावनं शक्तिबीज⁷जप इत्यर्थः। तदुक्त- मभियुक्तैः— अभिप्राय यह होगा कि आधार, हृदय और भ्रूमध्य में स्थित तीन बीजों के शीर्ष स्थान में विद्यमान कामकला के अन्तर्गत सपरार्धकला स्वरूप वह्नि, सूर्य और सोम नामक तीन कुण्डलिनियाँ हैं। पहले (१।२५) बताई गई पद्धति से अकुल से बिन्दु पर्यन्त नौ स्थानों में भावित त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों का एक एक बीज और कुण्डलिनी में तीन तीन विभाग कर नाद रूप से संयोजित करने को ही यहाँ जप कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि त्रैलोक्यमोहन आदि तीन चक्रों को आधारस्थ वह्निमण्डल में विद्यमान वाग्भव बीज के शिखर में स्थित कामकला के अन्तर्गत हार्धकलारूप वह्नि- कुण्डलिनी के उत्थान से वहाँ से उठकर हृत्स्थानगत कामराज बीजपर्यन्त व्याप्त नादमयता की भावना का नाम वाग्भव बीज का जप है। सर्वसौभाग्यदायक आदि तीन चक्रों की हृदयस्थ सूर्यमण्डल में विद्यमान कामराज बीज के शिखर में स्थित कामकला के अन्तर्गत हार्धकलारूप सूर्यकुण्डलिनी के उत्थान से वहाँ से उठकर बिन्दुस्थानगत शक्तिबीज पर्यन्त व्याप्त नादमयता की भावना का नाम कामराज बीज का जप है। सर्वरोगहर आदि तीन चक्रों की बिन्दुस्थान स्थित चन्द्रमण्डल में विद्यमान शक्तिबीज के शिखर में स्थित कामकला के अन्तर्गत हार्धकलारूप सोमकुण्डलिनी के उत्थान से वहाँ से उठकर ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर स्थित शिवतत्त्व से अतीत समना की सीमा तक व्याप्त नाद की उन्मना शक्ति में लीन होने की भावना का नाम शक्तिबीज का जप कहलाता है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने इस विषय में कहा है— १. कुण्डलीनां-ख. झ. उ. । २. नादिचक्रत्रय-क. ग. । ३. वह्निकुण्डली-क. ग. ज. । ४. हृत्स्थ-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. बिन्दुमण्डलान्तर्गत-क. ग. ने. । ६. 'कामकलान्तर्गत' नास्ति-क. ग. ने. । ७. बीजोच्चार-ख. ने. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

३६० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पिण्डो १वाचकविस्तरस्य महतः संस्कारशेषा२ स्थिति- र्नादोऽसौ तव देवि मूर्ध्नि समनासीमानमुल्लङ्घयन् । घण्टाक्वाण इव क्रमेण विरमन्नन्यामणीयस्तनी-३ माजिघ्रन् परचिद्दशामनुभवन् मूर्तिं पुराणीमुमे४ ॥ इति५ ॥१६९-१७०॥ ननु “दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त६ इष्यते” (१।२८) इत्यादि त्रिष्वपि बीजेषु७ उन्मनीपर्यन्तमुच्चारः किमिति नोक्तः ? प्राणादीनामुन्मन्यन्तानां द्वाद- शांशानां सर्वत्र साधारण्येन वक्तुं शक्यत्वादित्यत आह— तेषु प्राणाग्निमायार्णकलाबिन्द्वर्धचन्द्रकाः८ ॥१७०॥ रोधिनोनादनादान्ताः ९शक्तिर्व्यापिकयान्विता । वर्ण, पद, वाक्यरूप इस विशाल शब्द विस्तार की जहाँ संस्कार के रूप में स्थिति बनी रहती है, उसी का नाम पिण्ड है। इसको नाद भी कहते हैं। इसका भाव यह है कि नाद के रूप में परिणत हुए पिण्ड-मन्त्र में वर्ण, पद, वाक्यरूप शब्दप्रपंच की संस्कार के रूप में स्थिति रहती है, सारा शब्दप्रपंच यहाँ आकर शान्त हो जाता है। हे देवि उमे ! यह नाद ललाट से ऊपर बढ़ता हुआ जब समना की सीमा को लांघ कर उन्मना अवस्था में पहुँचता है, तब वह एक अनोखी सूक्ष्मतर अवस्था को स्पर्श करता हुआ परचिद् दशा रूप अपने पुराने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है। यह कैसे होता है ? इसका उदाहरण है—घण्टा-ध्वनि । जैसे घण्टे के बजने से उत्पन्न हुई ध्वनि धीरे-धीरे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती हुई सनसनाहट के रूप में बदल कर अन्ततः विलीन हो जाती है, उसी तरह से नाद भी समना पर्यन्त सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था में पहुँचता हुआ अन्त में उन्मना में विलीन हो जाता है, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥१६९-१७०॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि पहले (१।२८) बिन्दु से उन्मना पर्यन्त मात्राओं का उच्चा- रण काल आदि बताया गया है, यहाँ ऐसा क्यों नहीं किया गया ? प्राण से उन्मना पर्यन्त द्वादश मात्राओं का समान रूप से सर्वत्र वर्णन होना चाहिये था ? इस प्रश्न का समाधान करते हुए कहते हैं— इन तीनों बीजों में प्राण, अग्नि, मायार्ण नामक कला के साथ बिन्दु, अर्ध- चन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना—ये सब १. वाक्पद–ख. ने. झ. उ. । २. दोषा–ख. ने., दोषोत्थितिः–ज. । ३. स्तमा–क. ग. । ४. णीं मम–ख. ज. झ. उ. । ५. इत्यत्रैवोक्तम्–ज. विहाय सर्वत्र । ६. बिन्दुरि–ज. । ७. पोठेषु–ने., भेदेषु–झ. । ८. न्द्रिकाः–क. ग. । ९. शक्तिव्यापि- कलान्विताः–क. ग. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६१ समना चोन्मना चेति द्वादशान्ते स्थिता प्रिये ॥१७१॥ मूलकुण्डलिनीरूपे मध्यमे च ततः पुनः । सृष्ट्युन्मुखे च विश्वस्य स्थितिरूपे १महेश्वरि ॥१७२॥ केवलं नादरूपेण उत्तरोत्तरयोजनम् । शबलाकारके देवि तृतीये द्वादशी कला ॥१७३॥ तेषु त्रिष्वपि बीजेषु । प्राणो हकारः, अग्नी रेफः, मायार्ण ईकारः, स एव कला । तदुक्तं कामकलाविलासे— बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः । कामः कमनीयतया कला च दहनेन्दुविग्रहो बिन्दू ॥ (श्लो० ७) इति । बिन्द्वादय उन्मन्यन्ताः पूर्वोक्त(१।२८-३४)लक्षणाः । एते प्राणादय उन्म- न्यन्ता २द्वादशान्ते स्थिताः । ३मूलकुण्डलिनीरूपे वाग्भवबीजे, या मात्रा त्रपुसोलतातनुलसत्तन्तूत्थितिस्र्पधिनी वाग्बीजे प्रथमे स्थिता तव सदा तां मन्महे ते वयम् । हे प्रिये ! द्वादशान्त में स्थित हैं। मूल कुण्डलिनी रूप सृष्ट्युन्मुख वाग्भव बीज में और विश्व के स्थिति रूप मध्यम कामराज बीज में हे महेश्वरि ! केवल नाद- रूपता का उत्तर उत्तर बीज में संयोजन किया जाता है । हे देवि ! पूर्ववर्ती दोनों बीजों के संयोजन से शबल आकार वाले तृतीय बीज में ही बारहवीं कला (उन्मना) पर्यन्त उच्चारण होता है ॥१७०-१७३॥ ऊपर बताये गये तीनों बीजों में प्राण (हकार), अग्नि (रेफ) और मायार्ण (ईकार) की स्थिति रहती है । ईकार को ही कला कहा जाता है, जैसा कि कामकलाविलास में बताया गया है— यह श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल अहंकारस्वरूप है । इसका नाम रवि है । इसमें दोनों बिन्दु समरसभाव से रहते हैं । यह समरसभाव सबके लिये कमनीय (स्पृहणीय) है । इसलिये इसे काम भी कहते हैं। अग्नि और चन्द्र (अग्नीषोम) नामक दो बिन्दु इस काम की कलाएँ कहलाती हैं ॥ बिन्दु से उन्मनी पर्यन्त कलाओं का स्वरूप पहले (१।२८-३४) बताया जा चुका है । प्राण से उन्मनी पर्यन्त सबकी स्थिति द्वादशान्त में है। मूलकुण्डलिनी रूप वाग्भव बीज विश्व की सृष्टि के लिये उन्मुख रहता है । लघुस्तोत्र में इसका वर्णन करते हुए कहा गया है— हे भगवति त्रिपुरे ! ककड़ी की लता से निकल रहे सूक्ष्म तन्तुओं के समान कुटिल आकृति वाली ईकार स्वरूपिणी जो मात्रा तुम्हारे प्रथम वाग्भव बीज में स्थित है, उसी- १. परे-ख., तथे-ने. च. छ. ज. झ. उ. । २. द्वादश-क. ने. उ. । ३. कुल-ने. ।

३६२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः शक्तिः कुण्डलिनीति विश्वजननव्यापारबद्धोद्यमा ज्ञात्वेत्थं न पुनः स्पृशन्ति जननीगर्भेऽर्भकत्वं नराः ॥ (श्लो० २) इति लघुस्तोत्रोक्तरीत्या विश्वस्य सृष्ट्युन्मुखे, मध्यमे कामराजबीजे विश्वस्य स्थितिरूपे, संहारसृष्ट्योर्मध्यस्थितत्वात् । केवलं नादरूपेण नादाद्युन्मन्यन्तावय- वोच्चारवर्जं नादमात्ररूपेण । उत्तरोत्तरयोजनम्, उच्चारक्रियाविशेषणम् । वाग्भव- बीजशिखरवत्तिनं नादं हृद्गतकामराजबीजपर्यन्तमुच्चरेत्, कामराजबीजशिखर- वर्तिनं नादं बिन्दुस्थानगतशक्तिबीजपर्यन्तमुच्चरेदित्यर्थः । शबलाकारके एत- द्वीजद्वयनादद्वययोगान्मिश्ररूपे तृतीये शक्तिबीजे द्वादशी कला ^१उन्मना, स्थिते- त्यनुषङ्गः । तेन प्राणादयो द्वादशकला अपि तृतीयबीजशिखरे स्थिता उच्चार्या इति लभ्यते । कोऽर्थः ? यद्यपि ^२वाग्भवकामराजशक्तिबीजत्रयाणामप्यन्ते प्राणाग्निमायाबिन्द्वर्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनाख्या द्वादश- कला वक्तुं शक्यन्ते, तथापि वाग्भवकामराजबीजयोः^३ सृष्टिस्थितिरूपत्वान्न विश्वातीतोन्मनापर्यन्तमुच्चारः । अतो न विरोध इत्यर्थः ॥ १७०-१७३ ॥ को हम तुम्हारे भक्तगण वास्तविक मात्रा मानते हैं। यही कुण्डलिनी शक्ति है। विश्व की उत्पत्ति के व्यापार में यह सचेष्ट रहती है। ऐसा जान लेने पर मनुष्य फिर जननी के गर्भ में बच्चे के रूप में जन्म नहीं लेता ॥ मध्यम कामराज बीज स्थितिरूप है, क्योंकि संहार और सृष्टि के मध्य में इसकी स्थिति है। इन दोनों बीजों में नाद से उन्मनी पर्यन्त कलाओं का उच्चारण किये बिना प्रथम से उत्तर बीज में केवल सामान्य नाद का संयोजन किया जाता है। अर्थात् वाग्भव बीज के शिखरवर्ती नाद को हृदयगत कामराज बीज पर्यन्त पहुँचा दिया जाता है और कामराज बीज के शिखरवर्ती नाद को बिन्दुस्थान गत शक्तिबीज पर्यन्त उच्चारित किया जाता है। इन दोनों बीजों के दोनों नादों के मिलन से तृतीय शक्तिबीज का स्वरूप शबल (मिश्रित) आकार का हो जाता है। नाद की बारहवीं कला वस्तुतः यहीं रहती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राण आदि बारह कलाओं का उच्चारण तृतीय बीज के शिखर स्थान में ही करना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि वाग्भव, कामराज और शक्ति, तीनों बीजों के अन्त में प्राण, अग्नि, माया, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और उन्मना नामक बारह कलाओं का उच्चारण किया जा सकता है, तो भी वाग्भव और कामराज बीज सृष्टि और स्थिति रूप हैं, अतः इनका विश्वातीत्त उन्मना पर्यन्त उच्चारण नहीं किया जाता। इस तरह से पूर्वापर ग्रन्थ में यहाँ किसी प्रकार के विरोध की आशंका नहीं करनी चाहिये ॥१७०-१७३॥ १. उन्मनी-ख. ने. ज. झ. । २. 'वाग्भव''''तथापि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ३. योः प्राणादय उन्मन्यन्तास्तथापि तयोः सृष्टि-ख. ने. ज. झ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६३ जपकाले¹ भाव्यानाह— शून्यषट्कं ²तथा देवि ह्यवस्थापञ्चकं पुनः। विषुवं³ सप्तरूपं च भावयन् मनसा जपेत् ॥१७४॥ ⁴जपकाले एतानि विद्यावयवेषु भाव्यानि। शिखि⁵पक्षचित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम्। ध्यायतोऽनुत्तरे ⁶शून्ये ⁷परं व्योमतनुर्भवेत् ॥ (श्लो० ३२) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोकरीत्या शून्यषट्कस्य रूपं ज्ञेयम्। अवस्थापञ्चकं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुर्यतुर्यातीतात्मकम्। एषां जाग्रदादीनां स्वरूपं वक्ष्यति (३।१७६- १८१), ⁸विषुवं सप्तरूपं च वक्ष्यति (३।१८१-१८७) ॥१७४॥ ⁹शून्यादीनां स्थानानि स्वरूपाणि च क्रमेणाह— अग्न्यादिद्वादशान्तेषु¹⁰ त्रींस्त्रीन् त्यक्त्वा वरानने। शून्यत्रयं विजानीयादेकैकान्तरतः¹¹ प्रिये ॥१७५॥ शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं विभावयेत्। जप के समय इनकी भावना करनी चाहिये— हे देवि ! शून्यषट्क की तथा अवस्थापंचक को एवं सप्तविध विषुव की जप करते समय मन से भावना करनी चाहिये ॥१७४॥ जप करते समय विद्या के अवयवों में इनकी भावना करनी चाहिये। शून्यषट्क का स्वरूप विज्ञानभैरव भट्टारक ने इस तरह से बताया है— मयूर के पंख के चित्र-विचित्र चन्द्रकों में जैसे पाँच शून्य दिखाई पड़ते हैं, उसी तरह से पंचेन्द्रिय मण्डल से चित्र-विचित्र भासमान शून्यपंचक रूप जगत् को अनुत्तर शून्य में विलीन कर देने वाला योगी परभैरव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है ॥ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्य और तुर्यातीत ये पाँच अवस्थाएँ हैं। इनका स्वरूप अभी आगे बताया जायगा। सात विषुवों का स्वरूप भी यहीं आगे बताया जा रहा है ॥१७४॥ पहले छः शून्यों के स्थान और स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं— हे वरानने ! अग्न्यादि (हकार) से द्वादशान्त (उन्मना) पर्यन्त स्थानों में तीन तीन को छोड़कर तीन शून्य जाने। हे प्रिये ! इसी तरह से एक एक के अन्तराल १. कालां भावनामाह-ख. ज. झ. ड. । २. सुरेशानि-ख. च. छ. ज. झ. । ३. विषुवत्-ख. ने. च. छ. ज. झ. ड. । ४. जपकाल इति केवलं जमातृकायाम् । ५. पिच्छ- क. ग. । ६. शून्यं-ख. ने. ज. झ. ड. । ७. रूपं-क. ग. । ८. विषुवत्-ख. ने. झ. ड. । ९. शून्यानां-ख. ने. झ. ड. । १०. शांतेषु-ख. ने. च. ड. । ११. रितं-क. ग. ज. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

३६४ योगिनोहृदयम् [ पूजासंकेतः एकश्च एकश्च द्वयोर्द्वयोरन्तरत¹ इत्यर्थः । अग्न्यादि अग्निः रेफः, तदादीन् त्रीन् त्रीन् षट् त्यक्त्वा, शून्यत्रयं षट् शून्यानि, विजानीयात् । कोऽर्थः ? हकार- मायाक्षरयोर्मध्ये रेफम्², मायार्धचन्द्रयोर्मध्ये बिन्दुम्², अर्धचन्द्रनादयोर्मध्ये रोधि- नीम्², नादशक्त्योर्मध्ये नादान्तम्², शक्तिसमनयोर्मध्ये व्यापिकाम्², समनोर्ध्वे चोन्मना²मिति षट् त्यक्त्वा । तत्र रेफबिन्दुरोधिनीनादान्तव्यापिकास्थानेषु पञ्चसु "शिखिपक्षचित्ररूपैः" (श्लो० ३२) इत्यादिपूर्वोक्तरीत्या बर्हिबर्हगतचन्द्रक³- सदृशरूपाणि पञ्च शून्यानि ⁴भावनीयानीत्यर्थः । षष्ठोन्मनास्थाने तु "पञ्च- व्योमतनुर्भवेत्" (श्लो० ३२) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्यैव व्योमतनु शून्यं ज्ञेयमित्यन्यश्च⁶ विशेषः । शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं निराकारं विभावयेदित्यर्थः ॥१७५-१७६॥ में भी तीन शून्यों की स्थिति है। (प्रथम) शून्यत्रय से आगे के स्थान में, अर्थात् उन्मना स्थित तृतीय शून्य में महाशून्य की भावना करे ॥१७५-१७६॥ 'एकैकान्तरतः' इस पद में एक और एक मिलकर दो होता है। इसका अर्थ होगा दो दो के अन्तराल से । अग्नि रेफ को कहते हैं। ¹रेफ का आदि हकार है। हकार से तीन तीन को छोड़कर छः शून्यों की भावना करे। इसका अभिप्राय यह है कि हकार और मायाक्षर के बीच में रेफ को, माया और अर्धचन्द्र के बीच में बिन्दु को, अर्धचन्द्र और नाद के बीच में रोधिनी को, नाद और शक्ति के बीच में नादान्त को, शक्ति और समना के बीच में व्यापिका को और समना के ऊपर उन्मना को—इस तरह से छः स्थानों को भली भाँति जानकर उनमें छः शून्यों की भावना करनी चाहिये । इनमें से रेफ, बिन्दु, रोधिनी, नादान्त और व्यापिका नामक पाँच स्थानों में विज्ञानभैरव भट्टारक के अभी अभी उद्धृत वचन के अनुसार मोर के पंख में विद्यमान चंदवों के समान आकार वाले पाँच शून्यों की भावना करनी चाहिये । षष्ठ उन्मना स्थान में विज्ञानभैरव भट्टारक की ही पद्धति पर परमाकाश रूप षष्ठ शून्य की भावना करे । अन्य पाँच शून्यों से इस षष्ठ शून्य की यही विशेषता है कि शून्यत्रय से पर स्थान में, अर्थात् उन्मना स्थित षष्ठ शून्य में निराकार महाशून्य के रूप में इसकी भावना करनी चाहिये ॥१७५-१७६ ॥ १. रन्तर इ-क. ग. ज. झ. । २. रेफः, बिन्दुः, रोधिनी, नादान्तः, व्यापिका, उन्मना-इत्येवं सर्वत्र प्रथमान्तः पाठः-क. ग. ज. । ३. चन्द्रिका-क., चन्द्रकला-उ. । ४. भाव्यानी-ख. ने. उ. । ५. पञ्च ˙˙˙˙'परे स्थाने' नास्ति-क. ग. ने. । ६. मित्यन्य- शेषः-ख., मित्यस्य शेषः-ज. ।

  1. हकार का ग्रहण करने पर ही पहली आवृत्ति में तीन तीन को छोड़ कर तीन शून्य बनेंगे तथा दूसरी आवृत्ति में एक एक को छोड़ कर तीन शून्य बनेंगे । इस तरह से छः शून्य बन जायंगे । इनमें से पाँच शून्य सामान्य हैं और अन्तिम को महाशून्य कहा गया है । यह महाशून्य प्रथम आवृत्ति के तीन शून्यों में से अन्तिम है । दीपिका की पद-

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६५ इदानीमवस्थापञ्चकभावनां क्रमेण विवक्षन्नादौ जागरितावस्थाभावना- माह— प्रबोधकरणेष्व१ऽथ जागरत्वेन भावनम् ॥१७६॥ वह्नौ देवि महाजाग्रदवस्था त्विन्द्रियद्वयैः । इन्द्रियद्वयैः ज्ञानकर्मेन्द्रियद्वयैः२ दशैन्द्रियैः, प्रमातु३र्व्यवहारो जागरणणं प्रबोधो जागर इत्युच्यते । ४तत्करणस्य प्रकाशस्य जागरत्वेन भावनम् । ५अन्तः- प्रकाशके वह्नौ तार्तीयबीज६शिखरवर्तिनि रेफे, महाजाग्रदवस्था सार्वकालिक- निद्राक्षयलक्षणा परप्रबोधदशा भावनीयेत्यर्थः ॥१७६-१७७॥ अब पाँच अवस्थाओं की भावना का क्रमशः वर्णन करना चाहते हैं । सबसे पहले उनमें से जागरित अवस्था की भावना बताते हैं— ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के द्वारा प्रबोध के करण प्रकाश की जागरा- वस्था के रूप में भावना की जाती है । अतः हे देवि ! वह्नि में महाजाग्रदवस्था की भावना करनी चाहिये ॥१७६-१७७॥ इन्द्रियद्वय का अर्थ है ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय नामक दस इन्द्रियाँ । इनकी सहा- यता से जो प्रमाता का व्यवहार चलता है, उसी को जागरण, प्रबोध, जागर आदि शब्दों से कहा जाता है । इस प्रबोध का करण प्रकाश है । इसी की जागर दशा के रूप में भावना की जाती है । इस प्रकाश का वाचक वर्ण वह्नि, अर्थात् तृतीय बीज के शिखर में स्थित रेफ है । इस रेफ में महाजाग्रदवस्था की भावना करनी चाहिये । ऐसा करने से सदा सदा के लिये निद्रा दशा समाप्त हो जाती है और परम प्रबोध की स्थिति सदा बनी रहती है ॥१७६-१७७॥ १. णार्थस्य-ख. ने. छ. ज. । २. न्द्रियैर्दशभिः प्र-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. जाग्रद् व्यव-क. ग. झ. उ. । ४. तत्कार-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अतः प्रकाशवाचके-क. ग. । ६. 'शिखर' नास्ति-ख. ने. झ. । व्याख्या से इसके अभिप्राय की संगति नहीं बैठ पाती । उक्त व्याख्या से मूल के अक्षरों की तथा दीपिका के अभिप्राय की संगति बैठ जाती है । जैसे कि हकार, रेफ, ईकार, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना—ये बारह स्थान हैं । इनमें प्रथम तीन के बाद बिन्दु की स्थिति है, द्वितीय तीन के बाद नादान्त की तथा तृतीय तीन के बाद उन्मना की स्थिति है । इस तरह से तीन तीन को छोड़ने पर तीन शून्य बन गये । एक एक को छोड़कर तीन शून्य बनाते समय हम पूर्व के तीन शून्य स्थानों को छोड़ देंगे । तब हकार के बाद रेफ में, अर्धचन्द्र के बाद रोधिनी में और शक्ति के बाद व्यापिका में तीन शून्यों की भावना करेंगे । इस क्रम से अन्ततः एक एक स्थान को छोड़ने पर छः शून्य बन जाते हैं और मूल श्लोक के पदों का लाक्षणिक अर्थ नहीं करना पड़ता ।

३६६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः स्वप्नभावनामाह— आन्तरैः करणैरेव १स्वप्नो मायावबोधनः ॥१७७॥ गलदेशे बाह्येन्द्रिय२रहितैरान्तरैः करणैर्मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्ताख्यैरेव व्यवहारः प्रमातुः स्वप्नः। स मायया तार्तीय३बोजस्थेन चतुर्थस्वरेण, अवगतबोधनः, तद्वाच्य इत्यर्थः। गलदेशे स्वप्नस्य स्थानम् ॥१७७-१७८॥ सुषुप्तिभावनामाह— सुषुप्तिस्तु लीनपूर्वस्य वेदनम्। अन्तःकरणवृत्तीनां लयतो विषयस्य तु ॥१७८॥ पूर्ववर्णानां विलोमेन भ्रूमध्ये बिन्दुसंस्थिता। स्वप्ने विद्यमानानामन्तःकरणवृत्तीनां लयतः सर्वेन्द्रियोपरतिः सुषुप्तिरिति हि लक्षणम्। अतो लीनपूर्वस्य देहाक्षादिषु४ क्रोडीकृतस्य ५लीनस्थितस्यैव स्वात्मनो वेदनं प्रकाशनं भवति। 'सुखमहमस्वाप्सम्' इति हि पश्चात् सुखमयं स्वात्मरूपं स्वप्न की भावना बताते हैं— केवल आन्तर इन्द्रियों से स्वप्न का व्यवहार चलता है। माया बीज इसका बोधक है। गल देश में इसकी स्थिति है ॥१७७॥ बाह्य इन्द्रियों से रहित केवल आन्तर करणों से, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त से जो प्रमाता का व्यवहार चलता है, उसे स्वप्न कहते हैं। तृतीय बीज में स्थित चतुर्थ स्वर मायाक्षर ईकार से इसका बोध होता है। इसकी भावना कण्ठ स्थान में की जाती है ॥१७७॥ सुषुप्ति की भावना बताते हैं— सुषुप्ति दशा में अपने विलीन स्वरूप का बोध होता है। यहाँ अन्तःकरण की सभी वृत्तियाँ विलीन हो जाती हैं। तृतीय बीज के पूर्व वर्णों को विलोम क्रम से रखकर भ्रूमध्य में इसकी भावना की जाती है ॥१७८-१७९॥ स्वप्नदशा में अन्तःकरण की वृत्तियाँ काम करती रहती हैं। जब इन वृत्तियों का भी लोप हो जाता है, तो सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने व्यापार से उपरत हो जाती हैं। इसी स्थिति को सुषुप्ति दशा कहते हैं। इस दशा में देह, इन्द्रिय आदि में विलीन केवल स्वात्मस्वरूप का भान होता है। सोकर उठने के बाद 'मैं आराम से सोया' इस तरह १. स्वप्नमायावबोधकः-क. ग.। २. विरहितैः-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. यस्थाने ४. बोजे-घ.। ५. देहादिषु-ख. ने. ज. झ.। ६. लीनस्यैव-क. ग.।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६७ परामृश्यते । १सेयं सुषुप्तिः । विषयस्य तु । विषयं तार्तीयं बीजम्, विश्वव्याप्ति२- स्थानत्वात् । तस्य पूर्वार्णानां बिन्दुपूर्वस्थितानां वर्णानाम्, विलोमेन—"मायाबीजं महेशानि मादनं शक्रसंयुक्तम् । ३चन्द्रबीजं केवलं तु" (१।११६-११७) इत्यादि, "संहारक्रमयोगेन शक्तिबीजं समुद्धरेत्" (१।११८) इत्यन्तेन चतुःशतीशास्त्रे४ संहारक्रमोद्धृतानां शक्तिबीजवर्णानां विलोमक्रमेण परिपाट्या, भ्रूमध्ये बिन्दुसं- स्थिता भ्रूमध्यस्थानस्थितहृल्ले खोर्ध्वबिन्दौ स्थिता, भावनीयेत्यर्थः ।।१७८-१७९।। तुरीय५भावनामाह— तुर्यरूपं ६तस्य चात्र वृत्ताधार्दिस्तु संग्रहः ।।१७९।। चैतन्यव्यक्तिहेतोस्तु नादरूपस्य वेदनम् । चैतन्यस्य संविदो व्यक्तेः परामर्शस्य हेतोः, नादरूपस्य पूर्वोक्त(१।३३)लक्षण- नादस्य, वेदनम् अभिव्यक्तिः, ७तुर्यरूपम् । तस्य ७तुर्यरूपस्य । अत्र तार्तीय- बीजे, वृत्ताधार्दिः, वृत्ताधंम् अर्धचन्द्रः, आदिशब्देन८रोधिनीनादौ गृह्येते, तेषां से सुखमय स्वात्मस्वरूप का सभी कोई अनुभव करते हैं। इसी को सुषुप्ति कहते हैं। विषय का अर्थ यहाँ तृतीय (शक्ति) बीज किया जाता है, क्योंकि सारे विश्व में यह व्याप्त है। उसके पूर्व वर्षों का, अर्थात् बिन्दु के पहले विद्यमान वर्णों का उद्धार चतुः- शती शास्त्र (१।११६-११८) में विलोम क्रम से बताया गया है। संहार क्रम से उद्धृत इस शक्ति बीज के अक्षरों की विलोम क्रम से भ्रूमध्य में, अर्थात् भ्रूमध्य स्थान में विद्यमान हृल्लेखा के ऊपर स्थित बिन्दु में जो भावना की जाती है, यही सुषुप्ति दशा की भावना कही गई है ।।१७८-१७९।। तुरीयावस्था की भावना बताते हैं— चैतन्य की व्यक्ति के कारणभूत नादस्वरूप की अभिव्यक्ति को ही तुर्या- वस्था कहते हैं। इसकी स्थिति तृतीय बीज के अर्धचन्द्र, रोधिनी और नाद में रहती है ।।१७९-१८०।। चैतन्य, अर्थात् संवित् की अभिव्यक्ति नाद के कारण होती है। नाद का स्वरूप पहले (१।३३) बताया जा चुका है। नाद के कारण ही हम संवित् के स्वरूप को जान पाते हैं। स्वरूप की यह अभिव्यक्ति ही तुरीय दशा है। इस तुरीय दशा की भावना यहाँ तृतीय बीज के वृत्तार्ध (अर्धचन्द्र) में और आदि शब्द से रोधिनी तथा नाद में की जाती है। इन सबका संग्रह कर समष्टि रूप में इन तीन स्थानों में यह भावना की जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि तृतीय बीज के शिखर पर वर्तमान अर्धचन्द्र, १. 'सेयं सुषुप्तिः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । २. व्यापि-क. ग. झ. उ. । ३. इन्दु- ख. ने. । ४. शास्त्रोक्तरीत्या-ख., शास्त्रोक्त्या-ने. झ. । ५. तुर्य-उ. । ६. तथा-क. ग., च तस्यात्र-ख., तूर्यस्य-क., ७. तूर्य-क. ग., ८. शब्दात्-ख. ने. झ.।

३६८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः संग्रहः । तार्तीयबीजशिखरवर्त्यर्धचन्द्ररोधिनीनादेषु स्वात्मचैतन्याभिव्यक्तिकारण- १नादकलनात्मकं तुर्यं तुरीयं भावनीयमित्यर्थः ॥१७९-१८०॥ २तुर्यातीतभावनामाह— तुर्यातीतं सुखस्थानं नादान्तादिस्थितं प्रिये ॥१८०॥ अत्रैव जपकाले तु पञ्चावस्थाः स्मरेद् बुधः । ३तुर्यातीतम्—“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्” (तै० उ० २।४) इत्युपनिषदुक्तरीत्या३ ४मनोवागतीतपरमा५नन्दस्वरूपं सुखस्थानं नादान्तादिस्थितं६ नादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनासु स्थितं ७तुर्यातीतं भावनीयमित्यर्थः । अत्रैव शक्तिबीज एव, पञ्चावस्था जागरिताद्याः पूर्वोक्ताः, जपकाले स्मरेद् बुधः पञ्चावस्थानुसन्धानपुरःसरं विद्याजपकरणावधाननिपुणः ॥१८०-१८१॥ रोधिनी और नाद स्थानों में अपने चैतन्य को अभिव्यक्ति देनेवाली नाद की स्थिति में साधक के कलनात्मक व्यापार का स्फुरण ही वस्तुतः तुरीय दशा की भावना कही जाती है ॥१७९-१८०॥ अब तुर्यातीत अवस्था की भावना बताते हैं— हे प्रिये ! तुर्यातीत वह सुखमय स्थान है, जिसकी भावना नादान्त आदि में की जाती है । विद्वान् साधक को चाहिये कि जप करते समय शक्ति बीज में ही इन पाँच अवस्थाओं की भावना करे ॥१८०-१८१॥ “जिस ब्रह्म तक बिना पहुँचे मन सहित इन्द्रियां वापस लौट पड़ती हैं, उस ब्रह्म की आनन्द स्वरूपता को जानने वाला (किसी से डरता नहीं)” इस तैत्तिरीय श्रुति के प्रमाण पर मन और वाणी से अतीत परमानन्द स्वरूप सुखमय स्थान ही तुर्यातीत अवस्था है । नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना स्थान में इस तुर्यातीत अवस्था की भावना करनी चाहिये । इस १शक्तिबीज में ही यहाँ बताई गई जागरित आदि पाँचों अवस्थाओं का जप के समय विद्वान् साधक को स्मरण करना चाहिये, श्रीविद्या का जप करते समय पूरी सावधानी से इन पाँचों अवस्थाओं का अनुसन्धान करते रहना चाहिये ॥१८०-१८१॥ १. णक्वणन्नादात्मकतुरीयरूपं भाव-क. । २. तुरीया-क ग. । ३. क्रमेण-ख. ने. उ. । ४. 'मनो' नास्ति-ख. ने. उ. । ५. परानन्द-ख. ने. झ. उ. । ६. इतः परम्— 'विलोमसुखस्थाने स्थितम्' इत्यधिकः पाठः-क. ग., 'विलोमक्रमेणैव सुखस्थानस्थितम्' इति तु-झ. । ७. तुरीया-क. ग. । १. केवल तृतीय शक्ति बीज में ही बारह कलाओं की भावना की जाती है । इस विषय की चर्चा पहले (३।१७०-१७३) आ चुकी है, अतः इन पाँच अवस्थाओं की भावना भी वहीं की जायेगी ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६९ इदानीं सप्तविषुवभावनां विवक्षन्नादौ१ प्राणविषुवभावनामाह— योगः प्राणात्ममनसां विषुवं प्राणसंज्ञकम्२ ॥१८१॥ प्राणस्य ३हकारात्मनो वायोः, आत्मनो यष्टुः, मनसश्च संयोगः प्राणविषुव४- मित्य॒च्यते। तदुक्तं ५शैवतन्त्रे—"शिष्यात्मप्राणमनसां संयोगं प्राणकं विदुः" इति ॥१८१॥ मन्त्रविषुवभावनामाह— आधारोत्थितनादे तु लीनं बुद्ध्वात्मरूपकम् । संयोगेन वियोगेन मन्त्राणां महेश्वरि ॥१८२॥ अनाहताद्याधारान्तं नादात्मत्वविचिन्तनम् । विषुवं६ आधाराद् मूलाधारात्, उत्थितेन वायुना, ७संभूते नादे ८विद्याशिखर- वर्तिनि, आत्मरूपकम् आत्मनो यद् रूपं संविदात्मकमानन्दैकरसीभूतम्, विद्या- अब सात विषुवों की भावना को कहने की इच्छा से पहले प्राण विषुव की भावना बताते हैं— प्राण, आत्मा और मन के संयोग को प्राणविषुव कहते हैं ॥ हकारात्मक वायु को यहाँ प्राण कहा गया है, आत्मा का अर्थ यहाँ यष्टा (यजन करने वाला) साधक है। प्राण वायु, साधक और मन का संयोग प्राणविषुव कहलाता है। किसी शैवतन्त्र में कहा गया है—'शिष्य की आत्मा, प्राण और मन के संयोग को प्राण- विषुव जानते हैं ॥१८१॥ मन्त्रविषुव की भावना बताते हैं— हे महेश्वरि ! मूलाधार से उठे नाद में आत्मस्वरूप को लीन जान कर श्रीविद्या के वर्णों के संयोग और वियोग से अनाहत से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त सर्वत्र नादात्मकता का चिन्तन ही मन्त्रविषुव है ॥१८२-१८३॥ आधार (मूलाधार) से उठे वायु से पैदा हुए विद्याशिखरवर्ती नाद में संविदात्मक आनन्द से समरस हुआ अपना जो स्वरूप है, साधक को पहले उसे भलीभाँति समझ लेना १. वक्ष्यन्नादौ-क.। २. ज्ञितम्-क. ग.। ३. ककारा-ख. ने. झ. उ.। ४. वदित्यु-ख. ने. ज. झ. उ.। ५. स्वैरतन्त्रे-ख. ग. ने. झ. उ.। ६. 'विषुवं' नास्ति-क. ग.। ७. 'संभूते' नास्ति-क. झ. उ.। ८. 'विद्या....मन्त्राणां' इत्यस्य स्थाने 'बिन्द्वादिषु वर्तिन्यात्मनो यष्टुः रूपं संविदात्मकं लीनं नादेनैकरसीभूतं बुद्ध्वा मन्त्राणां' इति पाठः-ख. ने. झ. उ.। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012) २४

३७० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः मन्त्राणां वाग्भवकामराजशक्तिबीजानाम्, वियोगेन ¹व्यासरूपेण, संयोगेन समष्टिरूपेण ²तुरीयबीजेन, अनाहताद्याधारान्तम्, अनाहतं हृदयस्थानम्, आधा- राणां सर्वेषामन्तस्थानं ब्रह्मरन्ध्रम्, तत्पर्यन्तम् । अत्रान्तशब्दस्तन्त्रेणोच्चारितः । अनाहताद्याधारान्तमिति यावत् । नादात्मत्वविचिन्तनं नादस्य यष्टृरूपत्वविभावनं विषुवम्, मन्त्र³संज्ञकमिति शेषः । कोऽर्थः ? मूलाधारस्थितवाग्भवशिखरवर्तिनं नादं हृदयपर्यन्तमुच्चार्य तत्र स्वयं लीनो भूत्वा स्वात्मनस्तन्मयतानुसन्धानं मन्त्र- विषुवमित्यर्थः । तदुक्तं शैवतन्त्रे— आत्मनो⁴ नादमध्ये तु लयं संचार्य⁵ तत्त्वतः । अकारोकारवर्णादिसंयोगेन वियोगतः ॥ हृदया⁶दिबिलान्तं च विषुवं मन्त्रसंज्ञकम् । इति ॥१८२-१८३॥ नाडीविषुवभावनामाह— ⁷नादसंस्पर्शान्नाडीविषुवमुच्यते ॥१८४॥ चाहिये । इसके बाद श्रीविद्या नामक मन्त्र के वाग्भव, कामराज और शक्ति बीजगत वर्णों की अलग-अलग तथा तुरीय बीज को समष्टिरूप में अनाहत (हृदय) से लेकर समस्त आधारों के अन्त में स्थित ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त भावना करनी चाहिये । यहाँ अन्त शब्द की दो बार आवृत्ति की जाती है । एक अन्त शब्द का अर्थ आधारान्त (ब्रह्मरन्ध्र) और दूसरे अन्त शब्द का अर्थ पर्यन्त होगा, अर्थात् हृदय से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त यह भावना की जाती है । यहाँ नाद की आत्मरूपता का चिन्तन किया जाता है, नाद ही यष्टा (साधक) है, ऐसी भावना की जाती है । इसी को मन्त्रविषुव कहा जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि मूलाधार स्थित वाग्भव बीज के शिखर में वर्तमान नाद का हृदय पर्यन्त उच्चारण कर साधक उसी में लीन हो जाय और तब अपने में नादमयता का ही अनुसन्धान करे, नादमय मन्त्र में अपने को लीन समझे । इसी को मन्त्रविषुव की भावना कहते हैं । शैव- तन्त्र में मन्त्रविषुव का वर्णन इस तरह से किया गया है— वास्तव में नाद के मध्य में अपना विलय करके अकार, उकार आदि वर्णों का अलग अलग तथा समष्टि रूप में हृदय से ब्रह्मबिल (रन्ध्र) पर्यन्त उच्चारण ही मन्त्रविषुव कहलाता है ॥१८२-१८३॥ नाडीविषुव की भावना बताते हैं— हे प्रिये ! कामकलाक्षर से उठा नाद बारह ग्रन्थियों का भेदन करता हुआ जब सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचता है, तब उसका जो नाड़ियों १. ध्यान-क. ग., न्यास-झ. । २. तुर्य-ख. ने. उ. । ३. संज्ञित-क. ग. ज. झ. । ४. आत्मना-क. ग. ज. । ५. संचित्य पञ्चमः-ख. ने. झ. उ. । ६. याद्याधा- रान्तं-झ. । ७. नादसंस्पर्शात्तच्च स्यान्नाडी-क. ग.

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७१ द्वादशग्रन्थिभेदेन वर्णाद् ¹नाड्यन्तरे प्रिये । वर्णाद् बीजत्रयंशिखरवर्ति²कामकलाक्षरात्, द्वादशग्रन्थिभेदेन मूलादिषट्- चक्रद्वादशग्रन्थीन् भित्त्वा तेन, नाड्यन्तरे सुषुम्नामध्यमार्गे³, नादसंस्पर्शात् त्रिबीज- शिखरवर्तिनो नादस्य मूलादि⁴ब्रह्मरन्ध्रान्तमुच्चारतः संस्पर्शात्, नाडीविषुव- मुच्यते । तदुक्तं शैवतन्त्रे— “मूलमन्त्रत्रिशूलेन भित्त्वा ग्रन्थीननुक्रमात् । नादनाडीसमायोगान्नाडीविषुवभावनम् ॥ इति ॥ १८३-१८४ ॥ प्रशान्तविषुवभावनामाह— नादयोगः प्रशान्तं⁵ तु प्रशान्तेन्द्रियगोचरम् ॥१८४॥ वह्निं मायां⁶ कलां चैव चेतनामर्धचन्द्रकम् । रोधिनीनादनादान्तान् शक्तौ लीनान् विभावयेत् ॥१८५॥ से स्पर्श होता है, उसी को नाडीविषुव कहते हैं ॥१८३-१८४॥ वर्ण का अर्थ है तीनों बीजों के शीर्ष भाग में स्थित कामकला नामक अक्षर । यह मूलाधार आदि षट्चक्र और बारह ग्रन्थियों को भेदकर सुषुम्ना नाडी के मार्ग से ब्रह्म- रन्ध्र तक पहुँचता है । तब तीनों बीजों के शिखरवर्ती नादात्मक अक्षर की मूलाधार से उठ कर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त उच्चरित होने की स्थिति में पूरी सुषुम्ना नाडी इसके स्पर्श से भर जाती है । इसी को नाडीविषुव कहते हैं । शैवतन्त्र में नाडीविषुव का वर्णन इस तरह से किया गया है— मूलमन्त्र रूपी त्रिशूल से एक एक कर सभी ग्रन्थियों का भेदन कर देने के उपरान्त नाद और नाडी का संयोग परिपूर्ण हो जाता है । इसी को नाडीविषुव की भावना कहते हैं ॥१८३-१८४॥ प्रशान्तविषुव की भावना बताते हैं— वह्नि, माया, कला, चेतना, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद और नादान्त का लय शक्ति में हो गया है, ऐसी भावना करे । नाड़ी से संबद्ध नाद यहाँ शक्ति में लीन हो जाता है । प्रशान्त इन्द्रिय वाला साधक ही इसको समझ पाता है, अतः इसे प्रशान्तविषुव कहते हैं ॥१८४-८५॥ १. नामन्तरे-क. ग. । २. र्तिनो नादस्य-क. ग ज. । ३. मार्गेण-ख. ने. झ. उ. । ४. लाद् ब्रह्म-ख ने. झ. उ. । ५. स्थूल-ख. ने. झ. । ६. न्तस्तत्प्र-ख. ने. च. ७. न्द्रं विभावयेत्-ख. ने. झ. । ८. वै-ख. ने. झ. ।

३७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वह्निं रेफम्, मायाम् ईकारम्, १कलां तन्मध्यवर्तिसपरार्धकलां२ रेखा- रूपाम्, चेतनां३ [बिन्दुम्], बिन्दुश्चैतन्यस्य संस्कारः, वेदनरूपत्वात्। तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्—"बिन्दुर्वेद्यस्य संस्कारो विसर्गः४ सर्ग इत्यसौ" (श्लो० ३७) इति। अर्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तांश्च५ पूर्वोक्त(१।३१)लक्षणायां६ ७शक्तौ लीनान् विभावयेत्। यतोऽयं ८नादो यष्टुस्तदतीतशक्तिलक्षणः, अतः प्रशान्ते- न्द्रियगोचरं सकलेन्द्रियातीतविषयं तत् प्रशान्तविषुवमित्यनुषङ्गः। तदुक्तं शैवतन्त्रे— अकारोकारवर्णौ च ९मकारं बिन्दुमेव च। नादनादान्तसंज्ञे१० च त्यक्त्वा ब्रह्मादिभिः क्रमात्॥ सप्तमे शक्तिमध्ये तु शिष्यात्मानं विचिन्तयेत्। प्रशान्तं तद्विजानीयात् प्रशान्तेन्द्रियगोचरम्॥इति॥१८४-१८५॥ वह्नि रेफ को, माया ईकार को, कला ईकार के मध्य में विराजमान रेखा रूप सपरार्ध कला को और चेतना बिन्दु को कहते हैं। यह बिन्दु चैतन्य का संस्कार करने वाला है, वेदनरूप है। अतः इसे यहाँ चेतना शब्द से कहा गया है। परापंचाशिका के अनुसार—"बिन्दु वेद्य जगत् का संस्कार तथा विसर्ग सर्गात्मक (सृष्टिस्वरूप) है"। वह्नि आदि के साथ अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद और नादान्त का पूर्व (१।३१) प्रद- र्शित लक्षण वाली शक्ति में लय हो गया है, ऐसी भावना करे। चूँकि यह नाद साधक की लोकातीत शक्ति का द्योतक है, अतः इसका साक्षात्कार समस्त इन्द्रियों के प्रशान्त होने पर ही हो सकता है। इस तरह से समस्त इन्द्रियों से अतीत शक्ति कला में लीन करा देने वाली यह स्थिति प्रशान्तविषुव नाम से जानी जाती है। जैसा कि शैवतन्त्र में कहा गया है— अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद और नादान्त का ब्रह्म प्रभृति १कारणषट्क के साथ परित्याग कर सप्तम शक्तितत्त्व में शिष्य की आत्मा लीन हो गई है, ऐसी भावना करे। प्रशान्त इन्द्रियों के द्वारा गृहीत होने वाली यह स्थिति प्रशान्तविषुव कही जाती है॥१८४-८५॥ १. कालं-ख. ने. झ. उ. । २. कलासंबन्धिरखारूपं-ख. ने. झ. उ. । ३. चेतना बिन्दुर्वेद्यस्य-ख. ने. झ. । ४. विमर्शः-क. ग. झ. । ५. नादान्ताः-ख. ने. झ. उ. । ६. लक्षणाः-ख. ने. झ. उ. । ७. 'शक्तौ लीनान् विभावयेत्' नास्ति-ख. ने. उ. । ८. प्रशान्तो नादयोगो-ख. ने. झ. उ. । ९. मकारो बिन्दुरेव-क. ग. ज. । १०. शक्ती च-ख. ने. झ. उ. ।

  1. नेत्रतन्त्र (२२।१९-२०) में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव और शिव का कारणषट्क के रूप में वर्णन किया गया है और कहा गया है कि इन छहों कारणों को छोड़ कर सप्तम निरामय, निरामय पद में साधक को प्रवेश करना चाहिये। यहाँ समस्त

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७३ शक्तिकालविषुव¹योर्भावनामाह— विषुवं शक्तिसंज्ञं तु तदूर्ध्वं नादचिन्तनम् । तदूर्ध्वं कालविषुवमुन्मनान्तं महेश्वरि ॥१८६॥ तदूर्ध्वं शक्तेरूर्ध्वं समनान्तम्, नादस्य चिन्तनं शक्तिविषुवम् । तदूर्ध्वं सम- नाया अप्यूर्ध्वम्, “नात्र कालकलामानम्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या काला- तीतोन्मनान्तं नादस्य चिन्तनं कालविषुवम् । तदुक्तं शैवतन्त्रे— शक्तिमध्यगतो नादः समनान्तं प्रसर्पति । तच्छक्तिविषुवं प्रोक्तमुन्मन्यां कालसंज्ञितम् ॥ इति ॥१८६॥ ननु कियता कालेन ³नादस्तत्त्वं वेद⁴यतीत्याह— मुनिचन्द्राष्टदशभिस्तु⁵टिभिर्नादवेदनम् । स्वस्थे नरे ⁶समासीने यावत् स्पन्दति लोचनम् । तस्य त्रिंशत्तमो भागस्तत्परः परिकीर्तितः ॥ शक्ति और कालविषुव की भावना बताते हैं— हे महेश्वरि ! शक्ति से ऊपर समना पर्यन्त नाद का चिन्तन शक्तिविषुव और समना से भी ऊपर उन्मना पर्यन्त नाद का चिन्तन कालविषुव कहलाता है ॥१८६॥ शक्ति से ऊपर समना पर्यन्त नाद का चिन्तन शक्तिविषुव कहलाता है । समना से भी ऊपर काल की कला से अतीत उन्मना कला में नाद का चिन्तन कालविषुव कहलाता है । स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—‘‘उन्मना कला में काल की कला की प्रतीति नहीं होती’’ । शैवतन्त्र में भी इन दोनों विषुवों का वर्णन मिलता है— शक्ति कला तक पहुँचा हुआ नाद जब समना पर्यन्त फैल जाता है, तो इसे शक्ति- विषुव कहते हैं । नाद के उन्मनी पर्यन्त फैल जाने पर उसको कालविषुव कहा जाता है ॥१८६॥ अब प्रश्न होता है कि यह नाद कितने समय में अपने वास्तविक स्वरूप को बताने में समर्थ होता है, उसी का उत्तर यह है— मुनि (सात), चन्द्र (एक), आठ और दस (१०८१७) त्रुटियों में उच्चरित नाद के अन्त में तत्त्व का ज्ञान होता है ॥ ‘‘स्वस्थ बैठे हुए मनुष्य की जितने समय में आँख झपकती है, उसका तीसवां भाग तत्पर कहलाता है । तत्पर का शतांश त्रुटि कहलाता है’’ । किसी तन्त्रान्तर के इस वचन १. षुवभा—ख. ने. ज. । २. न्मन्थन्तं—छ. ज. उ. । ३. नादत-झ. । ४. यन्ती-झ. । ५. त्रुटि-क. ग. । ६. सुखा-क. ग. । पद के रूप में शक्तितत्त्व का ग्रहण किया गया है । कारणषट्क विषयक अन्य विवरण के लिये लुप्ता० उपो० पृ० १९९ की दूसरी टिप्पणी देखिये ।

३७४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तत्परस्य शतांशस्तु १त्रुटिरित्यभिधीयते । इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या निमेषस्य त्रिसहस्रतमो भागस्तुटिः१। मुनयः सप्त, चन्द्र एकः, अष्ट दश संख्ये प्रसिद्धे । तेन हकाराद्युन्मन्यन्तानां विद्यावयवानां सप्त- दशाधि२काष्टशतोत्तरदशसहस्र३त्रुटिभिरुच्चारे "अकुले विषुसंज्ञे च" (१।२५) इत्युक्तरीत्या कृते सति नादस्यान्ते तत्त्वस्य वेदनमित्यर्थः । तत्त्वविषुवभावनामाह— चैतन्यव्यक्तिहेतुश्च विषुवं तत्त्वसंज्ञकम्३ ॥१८७॥ ४चैतन्यस्य स्वात्मतत्त्वस्य, व्यक्तिः प्रकाशस्य,५ हेतुस्तत्त्वविषुवम् । कोऽर्थः ? उन्मनोध्वेऽनन्तरोक्तसंख्यात६त्रुटिभिर्नादिलयात् स्वात्मानुसन्धानं तत्त्वविषुव- मित्यर्थः । तदुक्तं शैवतन्त्रे—"स्वाधिकारे परे धाम्नि विषुवं तत्त्वसंज्ञकम्" इति ॥१८७॥ परं स्थानं महादेवि निसर्गानन्दसुन्दरम् । के अनुसार निमेष का तीन हजारवाँ हिस्सा त्रुटि कहलाता है । मुनि से सात और चन्द्र से एक संख्या ली जाती है । आठ और दस संख्यायें प्रसिद्ध हैं । इस तरह से हकार से उन्मनी पर्यन्त विद्या के अवयवों के उच्चारण में पहले (१।२५) बताई गई विधि के अनु- सार १०८१७ त्रुटि काल लगेगा । इसके साथ ही नाद की समाप्ति पर तत्त्वविषुव की प्रतीति होगी ॥ अब तत्त्वविषुव की भावना बताते हैं— चैतन्य की व्यक्ति जिससे होती है, उसको तत्त्वविषुव कहते हैं ॥१८७॥ चैतन्य स्वात्मतत्त्व को कहते हैं । उसकी व्यक्ति, अर्थात् प्रकाश का कारण तत्त्व- विषुव है । इसका अभिप्राय यह है कि उन्मना के ऊपर अभी बताई गई संख्या की त्रुटियों के बीत जाने पर जब नाद का लय हो जाता हैं, तब साधक भी स्वात्मानुसन्धान में लीन हो जाता है । उसी स्थिति को तत्त्वविषुव की भावना कहते हैं । शैवतन्त्र में भी बताया गया है—"पर धाम स्वरूप स्वात्मतत्त्व जब अपने अधिकार में आ जाय, तो यही स्थिति तत्त्वविषुव कहलाती है" ॥१८७॥ हे महादेवि ! पर स्थान स्वाभाविक आनन्द से परिपूर्ण, अत एव परम सुन्दर है ॥ १. त्रुटि-क. ग. । २. काष्टोत्तर-क. ग., काष्टदशोत्तर-झ. । ३. ज्ञितम्-क. ख. ग. ने. । ४. अनन्तरोक्तरीत्या चैत-क. ग. । ५. शसाम्यहे-ने. । ६. संख्यावत् त्रु- क. ग. ने. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७५ परं शून्यषट्कावस्थापञ्चकसप्तविषुवकोलाहलातीतं स्थानम्, विश्वविश्रान्ति- भूमित्वाद् निसर्गानन्दसुन्दरम् । सर्वविषयानन्दसमष्टिभूतः परमानन्दो निसर्गा- नन्दः । अत एवानित्याशुचिक्लेशैर्दुर्भगभेद२प्रपञ्चपरिपन्थी पराकारण३रूपत्वात् परमानन्दलक्षणपरमप्रेमास्पदपरमसुन्दरपरशिवरूपं निसर्गानन्दसुन्दरमित्यर्थः४ ॥१८८॥ पूर्वोक्तभावनायाः फलमाह— एवं चिन्तयमानस्य जपकालेषु पार्वति ॥१८८॥ सिद्धयः सकलास्तूर्णं सिद्ध्यन्ति त्वत्प्रसादतः । एवं पूर्वोक्तप्रकारेण, जपकालेषु५ । जपाः “आज्ञान्तं सकलं प्रोक्तम्” (१।२७- २८) इत्यादिपूर्वोक्तरीत्या सकल-सकलनिष्कल-केवलनिष्कलरूपास्त्रिविधाः, तेषां कालाः “दीपाकारोऽर्धमात्रश्च” (१।२८-३४) इत्यादिना पूर्वोक्तविद्यावयवाना- मुच्चारणकालाः, तेषु शून्यषट्कादिकं चिन्तयमानस्य, सकलाः सिद्धयोऽणिमाद्याः ऊपर बताये गये शून्यषट्क, अवस्थापंचक और सप्तविषुव रूपी कोलाहल से दूर यह परम स्थान है, जहाँ कि यह सारा जगत् विश्राम की अनुभूति करता है । यह स्थान निसर्गानन्दसुन्दर है । सभी प्रकार के विषयों के आनन्द का समष्टिभूत आनन्द, जिसकी एक मात्रा के रूप में विषयानन्द स्फुरित होता है, परमानन्द अथवा निसर्गानन्द कहलाता है । इसीलिये यह अनित्य, अशुचि, क्लेश आदि दुर्भाग्य से भरे भेदरूपी प्रपंच का विरोधी है। परा भगवती का भी कारण रूप होने से यह परमानन्दमय परम प्रेमास्पद परमसुन्दर परमशिव का स्वरूप निसर्गानन्द से परिपूर्ण अत एव सुन्दर है ॥ १८८॥ पूर्वोक्त भावना का फल बताते हैं— हे पार्वति ! जप करते समय इन सबकी भावना करने वाले साधक को सभी सिद्धियाँ तुम्हारे प्रसाद से शीघ्र ही प्राप्त हो जाती हैं ॥१८८-१८९॥ जप करते समय पूर्वोक्त प्रकार से शून्यषट्क आदि की भावना करने वाले साधक को सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। सकल, सकलनिष्कल और केवल निष्कल नामक तीन प्रकार के जपों का वर्णन पहले (१।२७-२८) आ चुका है। इनके उच्चारण का काल पहले (१।२८-३४) बताया जा चुका है। श्रीविद्या का इस विधि से जप करते समय, उसके अवयवों का उच्चारण करते समय, शून्यषट्क आदि की भावना करने वाला साधक भगवती के प्रसाद से शीघ्र ही समस्त अणिमा आदि पूर्वोक्त (३।४४) सिद्धियों को १. ‘क्लेश’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. भेदप्रदेशपञ्चकपरि-क. ग. । ३. पर- त्वात्-क. ग. । ४. ‘इत्यर्थः’ नास्ति-क. ग. उ. । ५. काले तु-क. ग. उ. ।