योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 425, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७५ परं शून्यषट्कावस्थापञ्चकसप्तविषुवकोलाहलातीतं स्थानम्, विश्वविश्रान्ति- भूमित्वाद् निसर्गानन्दसुन्दरम् । सर्वविषयानन्दसमष्टिभूतः परमानन्दो निसर्गा- नन्दः । अत एवानित्याशुचिक्लेशैर्दुर्भगभेद२प्रपञ्चपरिपन्थी पराकारण३रूपत्वात् परमानन्दलक्षणपरमप्रेमास्पदपरमसुन्दरपरशिवरूपं निसर्गानन्दसुन्दरमित्यर्थः४ ॥१८८॥ पूर्वोक्तभावनायाः फलमाह— एवं चिन्तयमानस्य जपकालेषु पार्वति ॥१८८॥ सिद्धयः सकलास्तूर्णं सिद्ध्यन्ति त्वत्प्रसादतः । एवं पूर्वोक्तप्रकारेण, जपकालेषु५ । जपाः “आज्ञान्तं सकलं प्रोक्तम्” (१।२७- २८) इत्यादिपूर्वोक्तरीत्या सकल-सकलनिष्कल-केवलनिष्कलरूपास्त्रिविधाः, तेषां कालाः “दीपाकारोऽर्धमात्रश्च” (१।२८-३४) इत्यादिना पूर्वोक्तविद्यावयवाना- मुच्चारणकालाः, तेषु शून्यषट्कादिकं चिन्तयमानस्य, सकलाः सिद्धयोऽणिमाद्याः ऊपर बताये गये शून्यषट्क, अवस्थापंचक और सप्तविषुव रूपी कोलाहल से दूर यह परम स्थान है, जहाँ कि यह सारा जगत् विश्राम की अनुभूति करता है । यह स्थान निसर्गानन्दसुन्दर है । सभी प्रकार के विषयों के आनन्द का समष्टिभूत आनन्द, जिसकी एक मात्रा के रूप में विषयानन्द स्फुरित होता है, परमानन्द अथवा निसर्गानन्द कहलाता है । इसीलिये यह अनित्य, अशुचि, क्लेश आदि दुर्भाग्य से भरे भेदरूपी प्रपंच का विरोधी है। परा भगवती का भी कारण रूप होने से यह परमानन्दमय परम प्रेमास्पद परमसुन्दर परमशिव का स्वरूप निसर्गानन्द से परिपूर्ण अत एव सुन्दर है ॥ १८८॥ पूर्वोक्त भावना का फल बताते हैं— हे पार्वति ! जप करते समय इन सबकी भावना करने वाले साधक को सभी सिद्धियाँ तुम्हारे प्रसाद से शीघ्र ही प्राप्त हो जाती हैं ॥१८८-१८९॥ जप करते समय पूर्वोक्त प्रकार से शून्यषट्क आदि की भावना करने वाले साधक को सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। सकल, सकलनिष्कल और केवल निष्कल नामक तीन प्रकार के जपों का वर्णन पहले (१।२७-२८) आ चुका है। इनके उच्चारण का काल पहले (१।२८-३४) बताया जा चुका है। श्रीविद्या का इस विधि से जप करते समय, उसके अवयवों का उच्चारण करते समय, शून्यषट्क आदि की भावना करने वाला साधक भगवती के प्रसाद से शीघ्र ही समस्त अणिमा आदि पूर्वोक्त (३।४४) सिद्धियों को १. ‘क्लेश’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. भेदप्रदेशपञ्चकपरि-क. ग. । ३. पर- त्वात्-क. ग. । ४. ‘इत्यर्थः’ नास्ति-क. ग. उ. । ५. काले तु-क. ग. उ. ।