योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पूर्वोक्ताः (३।४४), त्वत्प्रसादतः सिद्धयन्ति । प्रकाशात्मनो मम विमर्शशक्तौ त्वयि प्रसन्नायाम्—"१तत्र तत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते प्रभोः” (श्लो० ११४) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या सर्वप्रत्ययमय२ता[या]मुपगतायां तव प्रसादात् स्वायत्ता भवन्तीत्यर्थः ॥१८६-१८९॥ एवं कृत्वा जपं देव्या वामहस्ते निवेदयेत् ॥१८९॥ एवम् उक्तभावनापुरःसरम्, जपम् उक्तलक्षणं कृत्वा प्रकाशविमर्शसाम- रस्यरूपाया वामहस्ते विश्वकवलीकारपरे विमर्शमये निवेदयेत् ॥१८९॥ पूजाविधिमुक्त्वा तर्पणविधिमाह— अनामाङ्गुष्ठयोगेन तर्पयेच्चक्रदेवताः । अनामा शक्तिः, अङ्गुष्ठः शिवः, तयोर्योगेन मेलनेन, शिवशक्ति३मेलापनमुद्र- येत्यर्थः। चक्रदेवताः चतुरस्रादिबैन्दवान्तनवचक्रनिवासिनोः४ प्रकाशविमर्शसमरसी- भूताः, ५तर्पयेत्, (इत्यर्थः)६ । प्राप्त कर लेता है। प्रकाशात्मक मुझ शिव का तुम विमर्शारूप शक्ति हो। तुम्हारी प्रसन्नता के मिल जाने पर विज्ञानभैरव भट्टारक की बताई विधि से इन्द्रियों के द्वार से आत्मा के बाहर निकलने पर भी सर्वत्र भगवान् का ही स्वरूप भासित होता है। इस तरह से सभी प्रकार की अनुभूतियों में भगवान् के ही भासित होने पर भगवती के प्रसाद से सभी प्रकार की सिद्धियाँ साधक को स्वायत्त हो जाती हैं ॥१८६-१८९॥ इस तरह जप करके देवी के वामहस्त में उस जप को समर्पित कर दे ॥१८९॥ ऊपर बताई गई भावनाविधि के साथ ऊपर बताये गये जप को पूरा करके प्रकाश- विमर्श-सामरस्यस्वरूपिणी देवी के उस विमर्शमय बायें हाथ में, जिससे पकड़ कर वह देवी सारे विश्व को खा जाती है, समर्पित कर दे ॥१८९॥ पूजाविधि के उपरान्त तर्पण की विधि बताते हैं— अनामा और अंगुष्ठ के योग से श्रीचक्र में निवास करने वाले देवताओं को तृप्त करे ॥ अनामिका अंगुली शक्ति की और अंगुष्ठ शिव का प्रतीक है। इनके योग से, इनको मिलाकर, अर्थात् शिवशक्ति की मेलापन मुद्रा से चतुरस्र से बैन्दव पर्यन्त नौ चक्रों में निवास करने वाले प्रकाशविमर्श-सामरस्यरूप समस्त आवरण१ देवताओं (शक्तियों) को १. यत्र यत्रा-मु० । २. मध्यता-क. झ. उ. । ३. मेलन-क. ख. ग. । ४. सिन्यः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'तर्पयेदित्यर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'इत्यर्थः' इत्यनावश्यकः।
- एक सौ ग्यारह आवरण देवताओं की चर्चा पहले (२।१७) आ चुकी है।