भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७७ १प्रदानैस्तर्पणैः सम्यग् विशुद्धैरमृतात्मभिः । महाहन्ती २करोमोदं विश्वं हव्यपु३र्धरम् ॥ (सु० वा० ३९) इत्यभियुक्त ४वचनोक्तरीत्या परस्मिन् लयं भावयेदित्यर्थः ॥१९०॥ तर्पणसाधनानि वस्तून्याह— मद्यं मांसं तथा मत्स्यं देव्यै५ तु विनिवेदयेत् ॥१९०॥ शिवशक्तिमेलनमुद्रया समस्तमद्यस्य मांसस्य मत्स्यस्य च निवेदनमेव तर्पण- मिति भावः ॥१९०॥ समयस्थैरेव ६ सह पूजयेदित्याह— ७कौलाचारसमायुक्तैर्वीरैस्तु सह पूजयेत् । कुलमुक्त (१।५०,३।१३१)लक्षणं हेयतया ज्ञेयं येषां८ ते कौला दक्षिणादि- स्रोतःसु दीक्षिताः, तेषामाचारः "गुरुभक्तिश्च शान्तिश्च पूजा श्रद्धा क्षमा तृप्त करे । आन्तर तर्पण की विधि शुभगोदयवासना में शिवानन्द मुनि ने इस तरह से बताई है— शास्त्रप्रदर्शित विधि से परिशुद्ध, अमृतात्मक वस्तुओं के अर्पण और तर्पण के द्वारा मैं इस सारे विश्व को हवि का स्वरूप मानकर आत्माहन्ता में विलीन कर दे रहा हूँ ॥ इसका अभिप्राय यह है कि इस समस्त विश्व को परम तत्त्व में विलीन कर देना ही, इदन्ता का अहन्ता में लय कर देना ही, आन्तर तर्पण है । प्रधानतः साधक को इसी की भावना करनी चाहिये कि यह सारा जगत् मेरे ही स्वरूप में विलीन हो गया है ॥१९०॥ इस तर्पण के साधन द्रव्य ये हैं— देवी को मद्य, मांस और मत्स्य समर्पित करे ॥१९०॥ शिवशक्ति-मेलनमुद्रा द्वारा समस्त मद्य, मांस और मत्स्य का निवेदन ही तर्पण कहलाता है ॥१९०॥ समय में स्थित व्यक्तियों के साथ ही पूजा करनी चाहिये— कौलाचार से समायुक्त वीरों के साथ पूजन करे ॥ माता, मान और मेय लक्षण यह जगत् ही कुल है । इसका परित्याग करने के अभिप्राय से जो इस कुल को जानना चाहते हैं, उनको कौल कहते हैं । ये कौल दक्षिणा- म्नाय आदि में दीक्षित होते हैं । इनका आचार कौलाचार कहलाता है । स्वच्छन्दसंग्रह १. नैदानैः-ख. ज. झ. । २. हन्तां-दी. । ३. पुरःसरम्-ज. ग. । ४. क्तोक्त-ख. ने. ज. झ. । ५. देव्यास्तु-क. ग. । ६. स्थेनैव-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. कौलिकाचारसं- ख. ने. च. छ. झ. उ. । ८. यैस्ते कौलिकाः-ख. ने. ज. झ. उ. ।