भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३७४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तत्परस्य शतांशस्तु १त्रुटिरित्यभिधीयते । इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या निमेषस्य त्रिसहस्रतमो भागस्तुटिः१। मुनयः सप्त, चन्द्र एकः, अष्ट दश संख्ये प्रसिद्धे । तेन हकाराद्युन्मन्यन्तानां विद्यावयवानां सप्त- दशाधि२काष्टशतोत्तरदशसहस्र३त्रुटिभिरुच्चारे "अकुले विषुसंज्ञे च" (१।२५) इत्युक्तरीत्या कृते सति नादस्यान्ते तत्त्वस्य वेदनमित्यर्थः । तत्त्वविषुवभावनामाह— चैतन्यव्यक्तिहेतुश्च विषुवं तत्त्वसंज्ञकम्३ ॥१८७॥ ४चैतन्यस्य स्वात्मतत्त्वस्य, व्यक्तिः प्रकाशस्य,५ हेतुस्तत्त्वविषुवम् । कोऽर्थः ? उन्मनोध्वेऽनन्तरोक्तसंख्यात६त्रुटिभिर्नादिलयात् स्वात्मानुसन्धानं तत्त्वविषुव- मित्यर्थः । तदुक्तं शैवतन्त्रे—"स्वाधिकारे परे धाम्नि विषुवं तत्त्वसंज्ञकम्" इति ॥१८७॥ परं स्थानं महादेवि निसर्गानन्दसुन्दरम् । के अनुसार निमेष का तीन हजारवाँ हिस्सा त्रुटि कहलाता है । मुनि से सात और चन्द्र से एक संख्या ली जाती है । आठ और दस संख्यायें प्रसिद्ध हैं । इस तरह से हकार से उन्मनी पर्यन्त विद्या के अवयवों के उच्चारण में पहले (१।२५) बताई गई विधि के अनु- सार १०८१७ त्रुटि काल लगेगा । इसके साथ ही नाद की समाप्ति पर तत्त्वविषुव की प्रतीति होगी ॥ अब तत्त्वविषुव की भावना बताते हैं— चैतन्य की व्यक्ति जिससे होती है, उसको तत्त्वविषुव कहते हैं ॥१८७॥ चैतन्य स्वात्मतत्त्व को कहते हैं । उसकी व्यक्ति, अर्थात् प्रकाश का कारण तत्त्व- विषुव है । इसका अभिप्राय यह है कि उन्मना के ऊपर अभी बताई गई संख्या की त्रुटियों के बीत जाने पर जब नाद का लय हो जाता हैं, तब साधक भी स्वात्मानुसन्धान में लीन हो जाता है । उसी स्थिति को तत्त्वविषुव की भावना कहते हैं । शैवतन्त्र में भी बताया गया है—"पर धाम स्वरूप स्वात्मतत्त्व जब अपने अधिकार में आ जाय, तो यही स्थिति तत्त्वविषुव कहलाती है" ॥१८७॥ हे महादेवि ! पर स्थान स्वाभाविक आनन्द से परिपूर्ण, अत एव परम सुन्दर है ॥ १. त्रुटि-क. ग. । २. काष्टोत्तर-क. ग., काष्टदशोत्तर-झ. । ३. ज्ञितम्-क. ख. ग. ने. । ४. अनन्तरोक्तरीत्या चैत-क. ग. । ५. शसाम्यहे-ने. । ६. संख्यावत् त्रु- क. ग. ने. ।