योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७३ शक्तिकालविषुव¹योर्भावनामाह— विषुवं शक्तिसंज्ञं तु तदूर्ध्वं नादचिन्तनम् । तदूर्ध्वं कालविषुवमुन्मनान्तं महेश्वरि ॥१८६॥ तदूर्ध्वं शक्तेरूर्ध्वं समनान्तम्, नादस्य चिन्तनं शक्तिविषुवम् । तदूर्ध्वं सम- नाया अप्यूर्ध्वम्, “नात्र कालकलामानम्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या काला- तीतोन्मनान्तं नादस्य चिन्तनं कालविषुवम् । तदुक्तं शैवतन्त्रे— शक्तिमध्यगतो नादः समनान्तं प्रसर्पति । तच्छक्तिविषुवं प्रोक्तमुन्मन्यां कालसंज्ञितम् ॥ इति ॥१८६॥ ननु कियता कालेन ³नादस्तत्त्वं वेद⁴यतीत्याह— मुनिचन्द्राष्टदशभिस्तु⁵टिभिर्नादवेदनम् । स्वस्थे नरे ⁶समासीने यावत् स्पन्दति लोचनम् । तस्य त्रिंशत्तमो भागस्तत्परः परिकीर्तितः ॥ शक्ति और कालविषुव की भावना बताते हैं— हे महेश्वरि ! शक्ति से ऊपर समना पर्यन्त नाद का चिन्तन शक्तिविषुव और समना से भी ऊपर उन्मना पर्यन्त नाद का चिन्तन कालविषुव कहलाता है ॥१८६॥ शक्ति से ऊपर समना पर्यन्त नाद का चिन्तन शक्तिविषुव कहलाता है । समना से भी ऊपर काल की कला से अतीत उन्मना कला में नाद का चिन्तन कालविषुव कहलाता है । स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—‘‘उन्मना कला में काल की कला की प्रतीति नहीं होती’’ । शैवतन्त्र में भी इन दोनों विषुवों का वर्णन मिलता है— शक्ति कला तक पहुँचा हुआ नाद जब समना पर्यन्त फैल जाता है, तो इसे शक्ति- विषुव कहते हैं । नाद के उन्मनी पर्यन्त फैल जाने पर उसको कालविषुव कहा जाता है ॥१८६॥ अब प्रश्न होता है कि यह नाद कितने समय में अपने वास्तविक स्वरूप को बताने में समर्थ होता है, उसी का उत्तर यह है— मुनि (सात), चन्द्र (एक), आठ और दस (१०८१७) त्रुटियों में उच्चरित नाद के अन्त में तत्त्व का ज्ञान होता है ॥ ‘‘स्वस्थ बैठे हुए मनुष्य की जितने समय में आँख झपकती है, उसका तीसवां भाग तत्पर कहलाता है । तत्पर का शतांश त्रुटि कहलाता है’’ । किसी तन्त्रान्तर के इस वचन १. षुवभा—ख. ने. ज. । २. न्मन्थन्तं—छ. ज. उ. । ३. नादत-झ. । ४. यन्ती-झ. । ५. त्रुटि-क. ग. । ६. सुखा-क. ग. । पद के रूप में शक्तितत्त्व का ग्रहण किया गया है । कारणषट्क विषयक अन्य विवरण के लिये लुप्ता० उपो० पृ० १९९ की दूसरी टिप्पणी देखिये ।