भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५९ वर्तिकामकलान्तर्गतसपरार्धकलारूपाणां वह्निसूर्यसोम¹कुण्डलिनीनां त्रये। चक्राणां पूर्वपूर्वैषाम्। "अकुले विषुसंज्ञे च" (१।२५) इत्यत्रोक्ताऽकुलादिबिन्दुन्तस्थानेषु नवसु भावितानां त्रैलोक्यमोहनादिनवचक्राणामेकैकस्मिन् बीजे कुण्डलिन्यां च त्रिशस्त्रिशो विभज्य योजितानां नादरूपेण योजनम्। त्रैलोक्यमोहनादि²नवचक्र- स्थादित्रयस्याधारस्थवह्नि³मण्डलस्थितवाग्भवशिखरवर्तिकामकलान्तर्गतहार्धकला- रूपवह्निकुण्डलिन्युत्थानोदितहृद्⁴गतकामराजबीजपर्यन्तव्यापिनादमयताभावनं वाग्भवबीजजपः। सर्वसौभाग्यदायकादिचक्रत्रयस्य हृदयस्थसूर्यमण्डलस्थित- कामराजशिखरवर्तिकामकलान्तर्गतहार्धकलारूपसूर्यकुण्डलिन्युत्थानोदितबिन्दुस्था- नगतशक्तिबीजपर्यन्तव्यापिनादमयताभावनं कामराजबीजजपः। सर्वरोगहरादि- चक्रत्रयस्य "बिन्दुस्थानेन्दुमण्डलान्तर्गतशक्तिबीजशिखरवर्ति⁶कामकलान्त- र्गतहार्धकलारूपसोमकुण्डलिन्युत्थानोदितब्रह्मरन्ध्रोपरिस्थितशिवतत्त्वातीतसमना- सोमपर्यन्तव्यापिना नादेन सहोन्मन्यां लयभावनं शक्तिबीज⁷जप इत्यर्थः। तदुक्त- मभियुक्तैः— अभिप्राय यह होगा कि आधार, हृदय और भ्रूमध्य में स्थित तीन बीजों के शीर्ष स्थान में विद्यमान कामकला के अन्तर्गत सपरार्धकला स्वरूप वह्नि, सूर्य और सोम नामक तीन कुण्डलिनियाँ हैं। पहले (१।२५) बताई गई पद्धति से अकुल से बिन्दु पर्यन्त नौ स्थानों में भावित त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों का एक एक बीज और कुण्डलिनी में तीन तीन विभाग कर नाद रूप से संयोजित करने को ही यहाँ जप कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि त्रैलोक्यमोहन आदि तीन चक्रों को आधारस्थ वह्निमण्डल में विद्यमान वाग्भव बीज के शिखर में स्थित कामकला के अन्तर्गत हार्धकलारूप वह्नि- कुण्डलिनी के उत्थान से वहाँ से उठकर हृत्स्थानगत कामराज बीजपर्यन्त व्याप्त नादमयता की भावना का नाम वाग्भव बीज का जप है। सर्वसौभाग्यदायक आदि तीन चक्रों की हृदयस्थ सूर्यमण्डल में विद्यमान कामराज बीज के शिखर में स्थित कामकला के अन्तर्गत हार्धकलारूप सूर्यकुण्डलिनी के उत्थान से वहाँ से उठकर बिन्दुस्थानगत शक्तिबीज पर्यन्त व्याप्त नादमयता की भावना का नाम कामराज बीज का जप है। सर्वरोगहर आदि तीन चक्रों की बिन्दुस्थान स्थित चन्द्रमण्डल में विद्यमान शक्तिबीज के शिखर में स्थित कामकला के अन्तर्गत हार्धकलारूप सोमकुण्डलिनी के उत्थान से वहाँ से उठकर ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर स्थित शिवतत्त्व से अतीत समना की सीमा तक व्याप्त नाद की उन्मना शक्ति में लीन होने की भावना का नाम शक्तिबीज का जप कहलाता है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने इस विषय में कहा है— १. कुण्डलीनां-ख. झ. उ. । २. नादिचक्रत्रय-क. ग. । ३. वह्निकुण्डली-क. ग. ज. । ४. हृत्स्थ-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. बिन्दुमण्डलान्तर्गत-क. ग. ने. । ६. 'कामकलान्तर्गत' नास्ति-क. ग. ने. । ७. बीजोच्चार-ख. ने. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)