भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 408

३५८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः च १कुलदीपं निवेदयेत् । पुनः प्रत्यङ्मुखतया तेनैव द्वारेणान्तः संविद्विश्रान्ति- स्तन्निवेदनं नाम ॥१६७-१६८॥ पुष्पाञ्जलिं ततः कृत्वा जपं कुर्यात् समाहितः । संयम्येन्द्रियसंचारं प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् । एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः ॥ इति २प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या समाहितः३ नियतेन्द्रियः, नादरूपमन्त्रो- च्चारणलक्षणं जपं कुर्यात् । शिष्टं स्पष्टम् ॥१६९॥ जपप्रकारमाह४— कूटत्रये महादेवि कुण्डलीत्रितयेऽपि च ॥१६९॥ चक्राणां पूर्वपूर्वेषां नादरूपेण योजनम् । कूटत्रये कूटानां वाग्भवकामराजशक्तिबीजाख्यानां त्रये । कुण्डलीत्रितयेऽपि च । कुण्डलीनां त्रितयं ५कुण्डलीत्रयम्, “आधारं ६हृदयं बिन्दुस्थानं च परिकी- र्तितम्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तेषु आधारहृदयभ्रूमध्येषु स्थितानां बीजत्रयशिखर- बुझता नहीं है । इस तरह के कुलदीप को देवियों को समर्पित करे । बाहर की तरफ दौड़ रही इन्द्रिय-वृत्तियों को अन्तर्मुख बना कर, उसी इन्द्रिय-मार्ग से उनको भीतर ले जा कर अपने संवित्स्वभाव में उनको विलीन कर देना हो, उनको विश्राम दिला देना ही यहाँ निवेदन शब्द का अर्थ है ॥१६७-१६८॥ तब पुष्पांजलि प्रदान कर समाहित चित्त से जप करे ॥ किसी प्रामाणिक१ व्यक्ति ने जप के विषय में कहा है— इन्द्रियों के बाहरी संचार को रोक कर आन्तर नाद का उच्चारण करे । वास्तविक जप इसी को कहा जाता है । बाह्य जप वस्तुतः जप नहीं है ॥ साधक को चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियों को वश में करके नादरूप मन्त्र का उच्चारण करते हुए जप करे । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१६९॥ अब इस जप की विधि बताते हैं— हे महादेवि ! तीन कूटों में और तीन कुण्डलियों में एक एक चक्र का नाद के रूप में संयोजन हो जप कहलाता है ॥१६९-१७०॥ कूटत्रय का अर्थ है वाग्भव, कामराज और शक्ति नामक तीन बीज और कुण्डली- त्रय का अर्थ स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण पर आधार, हृदय और बिन्दुस्थान है । इसका १. ‘कुलदीपं’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रमाण-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. हिते- न्द्रियः-ख. ने. ज. उ. । ४. मेवाह-ख. झ. उ. । ५. ‘कुण्डलीत्रयम्’ नास्ति-क. ग. । ६. चैव हृद्बिन्दु-ख. ने. ज. झ. । I. पृ० २२७ की दूसरी टिप्पणी देखिये ।