योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३५७ चक्रपूजामुपसंहरन् कुलदीपनिवेदनमाह— अलिना पिशितैर्गन्धैर्धूपैराराध्य देवताः ॥१६७॥ चक्रपूजां विधायेत्थं कुलदीपं निवेदयेत् । अन्तर्बहिर्भासमानं स्वप्रकाशोज्ज्वलं प्रिये ॥१६८॥ अलिना हेतुना। १पिशितगन्धधूपशब्दाः स्पष्टार्थाः। देवताः त्रैलोक्यमोहनादि- बैन्दवान्तनवचक्रगताः, अलिपिशितगन्ध २धूपैराराध्य, इत्थ पूर्वोक्तरीत्या चक्रपूजां विधाय कुलदीपम्, कुलं षट्त्रिंशत्तत्त्वसमुदायरूपं शरीरम्, तत्र भवं ३ दीपम्, "ततो हृदयपद्मान्तः स्फुरन्तीं सांविदीं४ कलाम्" (सु० ३४) इत्यभियुक्त ५वचनोक्त- रीत्या हृदयान्तर्भासमानं संवित्कलारूपं दीपम्, इन्द्रियद्वारा बहिरर्थेषु तद्रूपेण ६भासमानम्, अत एव स्वप्रकाशोज्ज्वलं तत्र प्रमाणनिरपेक्षप्रतीतिकं निर्वाणरहितं करनी चाहिये। यहां सुधी पद का अर्थ है उन उन काम्य कर्मों के विधि-विधान को अच्छी तरह से जानने वाला ॥१६६-१६७॥ चक्रपूजा का उपसंहार करते हुए कुलदीप के निवेदन की विधि बताते हैं— अलि, पिशित, गन्ध, धूप आदि से सभी देवताओं की आराधना करने के बाद चक्रपूजा की समाप्ति पर कुलदीप प्रज्वलित करे । हे प्रिये ! यह कुलदीप अपने प्रकाश की उज्ज्वल आभा से हृदय के भीतर और बाहर भी आलोक फैलाने वाला है ॥१६७-१६८॥ अलि का अर्थ हेतु द्रव्य है। पिशित, गन्ध और धूप शब्दों का अर्थ स्पष्ट है। त्रैलोक्यमोहन से बैन्दव पर्यन्त सभी नौ चक्रों में निवास करने वाले देवताओं की अलि, पिशित, गन्ध, धूप आदि से ऊपर बताई पद्धति के अनुसार आराधना कर लेने के उपरान्त कुलदीप को प्रज्वलित करना चाहिये। कुल शब्द का अर्थ है छत्तीस तत्त्वों का समुदाय स्वरूप यह शरीर । इस शरीर में दीपक जलाना चाहिये। शिवानन्द मुनि के अनुसार "हृदय रूपी कमल में स्फुरित होने वाली सांविदी कला ही दीपक है"। संवित्कला के स्फुरण से हृदय के भीतर प्रज्वलित यह दीप इन्द्रियों के द्वारा बाह्य पदार्थों में अपना प्रकाश फैलाता है। अपने इस अद्भुत उज्ज्वल प्रकाश से यह दीपक हृदय के भीतर और बाहर भी बिना किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा रखे भासित होता रहता है और यह कभी १. पिशितैर्मांसैः-क. ग. ने. । २. धूपदीपै-क. ग. । ३. 'भवं' नास्ति-ख. ने.०ज. झ. ड. । ४. संविदं-ख. ने. ज. झ. ड. । ५. युक्तोक्त-ख. ने. ज. झ. ड. । ६. 'भासमानं' नास्ति-ख. ज. झ. ड. । की व्याख्या का खण्डन करते समय वे वज्रेश्वरी का उल्लेख करते हैं, किन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि तिथिनित्याओं में वज्रेश्वरी की गणना नहीं है।