भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३६० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पिण्डो १वाचकविस्तरस्य महतः संस्कारशेषा२ स्थिति- र्नादोऽसौ तव देवि मूर्ध्नि समनासीमानमुल्लङ्घयन् । घण्टाक्वाण इव क्रमेण विरमन्नन्यामणीयस्तनी-३ माजिघ्रन् परचिद्दशामनुभवन् मूर्तिं पुराणीमुमे४ ॥ इति५ ॥१६९-१७०॥ ननु “दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त६ इष्यते” (१।२८) इत्यादि त्रिष्वपि बीजेषु७ उन्मनीपर्यन्तमुच्चारः किमिति नोक्तः ? प्राणादीनामुन्मन्यन्तानां द्वाद- शांशानां सर्वत्र साधारण्येन वक्तुं शक्यत्वादित्यत आह— तेषु प्राणाग्निमायार्णकलाबिन्द्वर्धचन्द्रकाः८ ॥१७०॥ रोधिनोनादनादान्ताः ९शक्तिर्व्यापिकयान्विता । वर्ण, पद, वाक्यरूप इस विशाल शब्द विस्तार की जहाँ संस्कार के रूप में स्थिति बनी रहती है, उसी का नाम पिण्ड है। इसको नाद भी कहते हैं। इसका भाव यह है कि नाद के रूप में परिणत हुए पिण्ड-मन्त्र में वर्ण, पद, वाक्यरूप शब्दप्रपंच की संस्कार के रूप में स्थिति रहती है, सारा शब्दप्रपंच यहाँ आकर शान्त हो जाता है। हे देवि उमे ! यह नाद ललाट से ऊपर बढ़ता हुआ जब समना की सीमा को लांघ कर उन्मना अवस्था में पहुँचता है, तब वह एक अनोखी सूक्ष्मतर अवस्था को स्पर्श करता हुआ परचिद् दशा रूप अपने पुराने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है। यह कैसे होता है ? इसका उदाहरण है—घण्टा-ध्वनि । जैसे घण्टे के बजने से उत्पन्न हुई ध्वनि धीरे-धीरे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती हुई सनसनाहट के रूप में बदल कर अन्ततः विलीन हो जाती है, उसी तरह से नाद भी समना पर्यन्त सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था में पहुँचता हुआ अन्त में उन्मना में विलीन हो जाता है, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥१६९-१७०॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि पहले (१।२८) बिन्दु से उन्मना पर्यन्त मात्राओं का उच्चा- रण काल आदि बताया गया है, यहाँ ऐसा क्यों नहीं किया गया ? प्राण से उन्मना पर्यन्त द्वादश मात्राओं का समान रूप से सर्वत्र वर्णन होना चाहिये था ? इस प्रश्न का समाधान करते हुए कहते हैं— इन तीनों बीजों में प्राण, अग्नि, मायार्ण नामक कला के साथ बिन्दु, अर्ध- चन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना—ये सब १. वाक्पद–ख. ने. झ. उ. । २. दोषा–ख. ने., दोषोत्थितिः–ज. । ३. स्तमा–क. ग. । ४. णीं मम–ख. ज. झ. उ. । ५. इत्यत्रैवोक्तम्–ज. विहाय सर्वत्र । ६. बिन्दुरि–ज. । ७. पोठेषु–ने., भेदेषु–झ. । ८. न्द्रिकाः–क. ग. । ९. शक्तिव्यापि- कलान्विताः–क. ग. ।