भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६१ समना चोन्मना चेति द्वादशान्ते स्थिता प्रिये ॥१७१॥ मूलकुण्डलिनीरूपे मध्यमे च ततः पुनः । सृष्ट्युन्मुखे च विश्वस्य स्थितिरूपे १महेश्वरि ॥१७२॥ केवलं नादरूपेण उत्तरोत्तरयोजनम् । शबलाकारके देवि तृतीये द्वादशी कला ॥१७३॥ तेषु त्रिष्वपि बीजेषु । प्राणो हकारः, अग्नी रेफः, मायार्ण ईकारः, स एव कला । तदुक्तं कामकलाविलासे— बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः । कामः कमनीयतया कला च दहनेन्दुविग्रहो बिन्दू ॥ (श्लो० ७) इति । बिन्द्वादय उन्मन्यन्ताः पूर्वोक्त(१।२८-३४)लक्षणाः । एते प्राणादय उन्म- न्यन्ता २द्वादशान्ते स्थिताः । ३मूलकुण्डलिनीरूपे वाग्भवबीजे, या मात्रा त्रपुसोलतातनुलसत्तन्तूत्थितिस्र्पधिनी वाग्बीजे प्रथमे स्थिता तव सदा तां मन्महे ते वयम् । हे प्रिये ! द्वादशान्त में स्थित हैं। मूल कुण्डलिनी रूप सृष्ट्युन्मुख वाग्भव बीज में और विश्व के स्थिति रूप मध्यम कामराज बीज में हे महेश्वरि ! केवल नाद- रूपता का उत्तर उत्तर बीज में संयोजन किया जाता है । हे देवि ! पूर्ववर्ती दोनों बीजों के संयोजन से शबल आकार वाले तृतीय बीज में ही बारहवीं कला (उन्मना) पर्यन्त उच्चारण होता है ॥१७०-१७३॥ ऊपर बताये गये तीनों बीजों में प्राण (हकार), अग्नि (रेफ) और मायार्ण (ईकार) की स्थिति रहती है । ईकार को ही कला कहा जाता है, जैसा कि कामकलाविलास में बताया गया है— यह श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल अहंकारस्वरूप है । इसका नाम रवि है । इसमें दोनों बिन्दु समरसभाव से रहते हैं । यह समरसभाव सबके लिये कमनीय (स्पृहणीय) है । इसलिये इसे काम भी कहते हैं। अग्नि और चन्द्र (अग्नीषोम) नामक दो बिन्दु इस काम की कलाएँ कहलाती हैं ॥ बिन्दु से उन्मनी पर्यन्त कलाओं का स्वरूप पहले (१।२८-३४) बताया जा चुका है । प्राण से उन्मनी पर्यन्त सबकी स्थिति द्वादशान्त में है। मूलकुण्डलिनी रूप वाग्भव बीज विश्व की सृष्टि के लिये उन्मुख रहता है । लघुस्तोत्र में इसका वर्णन करते हुए कहा गया है— हे भगवति त्रिपुरे ! ककड़ी की लता से निकल रहे सूक्ष्म तन्तुओं के समान कुटिल आकृति वाली ईकार स्वरूपिणी जो मात्रा तुम्हारे प्रथम वाग्भव बीज में स्थित है, उसी- १. परे-ख., तथे-ने. च. छ. ज. झ. उ. । २. द्वादश-क. ने. उ. । ३. कुल-ने. ।