भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३६२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः शक्तिः कुण्डलिनीति विश्वजननव्यापारबद्धोद्यमा ज्ञात्वेत्थं न पुनः स्पृशन्ति जननीगर्भेऽर्भकत्वं नराः ॥ (श्लो० २) इति लघुस्तोत्रोक्तरीत्या विश्वस्य सृष्ट्युन्मुखे, मध्यमे कामराजबीजे विश्वस्य स्थितिरूपे, संहारसृष्ट्योर्मध्यस्थितत्वात् । केवलं नादरूपेण नादाद्युन्मन्यन्तावय- वोच्चारवर्जं नादमात्ररूपेण । उत्तरोत्तरयोजनम्, उच्चारक्रियाविशेषणम् । वाग्भव- बीजशिखरवत्तिनं नादं हृद्गतकामराजबीजपर्यन्तमुच्चरेत्, कामराजबीजशिखर- वर्तिनं नादं बिन्दुस्थानगतशक्तिबीजपर्यन्तमुच्चरेदित्यर्थः । शबलाकारके एत- द्वीजद्वयनादद्वययोगान्मिश्ररूपे तृतीये शक्तिबीजे द्वादशी कला ^१उन्मना, स्थिते- त्यनुषङ्गः । तेन प्राणादयो द्वादशकला अपि तृतीयबीजशिखरे स्थिता उच्चार्या इति लभ्यते । कोऽर्थः ? यद्यपि ^२वाग्भवकामराजशक्तिबीजत्रयाणामप्यन्ते प्राणाग्निमायाबिन्द्वर्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनाख्या द्वादश- कला वक्तुं शक्यन्ते, तथापि वाग्भवकामराजबीजयोः^३ सृष्टिस्थितिरूपत्वान्न विश्वातीतोन्मनापर्यन्तमुच्चारः । अतो न विरोध इत्यर्थः ॥ १७०-१७३ ॥ को हम तुम्हारे भक्तगण वास्तविक मात्रा मानते हैं। यही कुण्डलिनी शक्ति है। विश्व की उत्पत्ति के व्यापार में यह सचेष्ट रहती है। ऐसा जान लेने पर मनुष्य फिर जननी के गर्भ में बच्चे के रूप में जन्म नहीं लेता ॥ मध्यम कामराज बीज स्थितिरूप है, क्योंकि संहार और सृष्टि के मध्य में इसकी स्थिति है। इन दोनों बीजों में नाद से उन्मनी पर्यन्त कलाओं का उच्चारण किये बिना प्रथम से उत्तर बीज में केवल सामान्य नाद का संयोजन किया जाता है। अर्थात् वाग्भव बीज के शिखरवर्ती नाद को हृदयगत कामराज बीज पर्यन्त पहुँचा दिया जाता है और कामराज बीज के शिखरवर्ती नाद को बिन्दुस्थान गत शक्तिबीज पर्यन्त उच्चारित किया जाता है। इन दोनों बीजों के दोनों नादों के मिलन से तृतीय शक्तिबीज का स्वरूप शबल (मिश्रित) आकार का हो जाता है। नाद की बारहवीं कला वस्तुतः यहीं रहती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्राण आदि बारह कलाओं का उच्चारण तृतीय बीज के शिखर स्थान में ही करना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि वाग्भव, कामराज और शक्ति, तीनों बीजों के अन्त में प्राण, अग्नि, माया, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और उन्मना नामक बारह कलाओं का उच्चारण किया जा सकता है, तो भी वाग्भव और कामराज बीज सृष्टि और स्थिति रूप हैं, अतः इनका विश्वातीत्त उन्मना पर्यन्त उच्चारण नहीं किया जाता। इस तरह से पूर्वापर ग्रन्थ में यहाँ किसी प्रकार के विरोध की आशंका नहीं करनी चाहिये ॥१७०-१७३॥ १. उन्मनी-ख. ने. ज. झ. । २. 'वाग्भव''''तथापि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ३. योः प्राणादय उन्मन्यन्तास्तथापि तयोः सृष्टि-ख. ने. ज. झ. ।