योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६३ जपकाले¹ भाव्यानाह— शून्यषट्कं ²तथा देवि ह्यवस्थापञ्चकं पुनः। विषुवं³ सप्तरूपं च भावयन् मनसा जपेत् ॥१७४॥ ⁴जपकाले एतानि विद्यावयवेषु भाव्यानि। शिखि⁵पक्षचित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम्। ध्यायतोऽनुत्तरे ⁶शून्ये ⁷परं व्योमतनुर्भवेत् ॥ (श्लो० ३२) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोकरीत्या शून्यषट्कस्य रूपं ज्ञेयम्। अवस्थापञ्चकं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुर्यतुर्यातीतात्मकम्। एषां जाग्रदादीनां स्वरूपं वक्ष्यति (३।१७६- १८१), ⁸विषुवं सप्तरूपं च वक्ष्यति (३।१८१-१८७) ॥१७४॥ ⁹शून्यादीनां स्थानानि स्वरूपाणि च क्रमेणाह— अग्न्यादिद्वादशान्तेषु¹⁰ त्रींस्त्रीन् त्यक्त्वा वरानने। शून्यत्रयं विजानीयादेकैकान्तरतः¹¹ प्रिये ॥१७५॥ शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं विभावयेत्। जप के समय इनकी भावना करनी चाहिये— हे देवि ! शून्यषट्क की तथा अवस्थापंचक को एवं सप्तविध विषुव की जप करते समय मन से भावना करनी चाहिये ॥१७४॥ जप करते समय विद्या के अवयवों में इनकी भावना करनी चाहिये। शून्यषट्क का स्वरूप विज्ञानभैरव भट्टारक ने इस तरह से बताया है— मयूर के पंख के चित्र-विचित्र चन्द्रकों में जैसे पाँच शून्य दिखाई पड़ते हैं, उसी तरह से पंचेन्द्रिय मण्डल से चित्र-विचित्र भासमान शून्यपंचक रूप जगत् को अनुत्तर शून्य में विलीन कर देने वाला योगी परभैरव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है ॥ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्य और तुर्यातीत ये पाँच अवस्थाएँ हैं। इनका स्वरूप अभी आगे बताया जायगा। सात विषुवों का स्वरूप भी यहीं आगे बताया जा रहा है ॥१७४॥ पहले छः शून्यों के स्थान और स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं— हे वरानने ! अग्न्यादि (हकार) से द्वादशान्त (उन्मना) पर्यन्त स्थानों में तीन तीन को छोड़कर तीन शून्य जाने। हे प्रिये ! इसी तरह से एक एक के अन्तराल १. कालां भावनामाह-ख. ज. झ. ड. । २. सुरेशानि-ख. च. छ. ज. झ. । ३. विषुवत्-ख. ने. च. छ. ज. झ. ड. । ४. जपकाल इति केवलं जमातृकायाम् । ५. पिच्छ- क. ग. । ६. शून्यं-ख. ने. ज. झ. ड. । ७. रूपं-क. ग. । ८. विषुवत्-ख. ने. झ. ड. । ९. शून्यानां-ख. ने. झ. ड. । १०. शांतेषु-ख. ने. च. ड. । ११. रितं-क. ग. ज. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)