भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

३६४ योगिनोहृदयम् [ पूजासंकेतः एकश्च एकश्च द्वयोर्द्वयोरन्तरत¹ इत्यर्थः । अग्न्यादि अग्निः रेफः, तदादीन् त्रीन् त्रीन् षट् त्यक्त्वा, शून्यत्रयं षट् शून्यानि, विजानीयात् । कोऽर्थः ? हकार- मायाक्षरयोर्मध्ये रेफम्², मायार्धचन्द्रयोर्मध्ये बिन्दुम्², अर्धचन्द्रनादयोर्मध्ये रोधि- नीम्², नादशक्त्योर्मध्ये नादान्तम्², शक्तिसमनयोर्मध्ये व्यापिकाम्², समनोर्ध्वे चोन्मना²मिति षट् त्यक्त्वा । तत्र रेफबिन्दुरोधिनीनादान्तव्यापिकास्थानेषु पञ्चसु "शिखिपक्षचित्ररूपैः" (श्लो० ३२) इत्यादिपूर्वोक्तरीत्या बर्हिबर्हगतचन्द्रक³- सदृशरूपाणि पञ्च शून्यानि ⁴भावनीयानीत्यर्थः । षष्ठोन्मनास्थाने तु "पञ्च- व्योमतनुर्भवेत्" (श्लो० ३२) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्यैव व्योमतनु शून्यं ज्ञेयमित्यन्यश्च⁶ विशेषः । शून्यत्रयात् परे स्थाने महाशून्यं निराकारं विभावयेदित्यर्थः ॥१७५-१७६॥ में भी तीन शून्यों की स्थिति है। (प्रथम) शून्यत्रय से आगे के स्थान में, अर्थात् उन्मना स्थित तृतीय शून्य में महाशून्य की भावना करे ॥१७५-१७६॥ 'एकैकान्तरतः' इस पद में एक और एक मिलकर दो होता है। इसका अर्थ होगा दो दो के अन्तराल से । अग्नि रेफ को कहते हैं। ¹रेफ का आदि हकार है। हकार से तीन तीन को छोड़कर छः शून्यों की भावना करे। इसका अभिप्राय यह है कि हकार और मायाक्षर के बीच में रेफ को, माया और अर्धचन्द्र के बीच में बिन्दु को, अर्धचन्द्र और नाद के बीच में रोधिनी को, नाद और शक्ति के बीच में नादान्त को, शक्ति और समना के बीच में व्यापिका को और समना के ऊपर उन्मना को—इस तरह से छः स्थानों को भली भाँति जानकर उनमें छः शून्यों की भावना करनी चाहिये । इनमें से रेफ, बिन्दु, रोधिनी, नादान्त और व्यापिका नामक पाँच स्थानों में विज्ञानभैरव भट्टारक के अभी अभी उद्धृत वचन के अनुसार मोर के पंख में विद्यमान चंदवों के समान आकार वाले पाँच शून्यों की भावना करनी चाहिये । षष्ठ उन्मना स्थान में विज्ञानभैरव भट्टारक की ही पद्धति पर परमाकाश रूप षष्ठ शून्य की भावना करे । अन्य पाँच शून्यों से इस षष्ठ शून्य की यही विशेषता है कि शून्यत्रय से पर स्थान में, अर्थात् उन्मना स्थित षष्ठ शून्य में निराकार महाशून्य के रूप में इसकी भावना करनी चाहिये ॥१७५-१७६ ॥ १. रन्तर इ-क. ग. ज. झ. । २. रेफः, बिन्दुः, रोधिनी, नादान्तः, व्यापिका, उन्मना-इत्येवं सर्वत्र प्रथमान्तः पाठः-क. ग. ज. । ३. चन्द्रिका-क., चन्द्रकला-उ. । ४. भाव्यानी-ख. ने. उ. । ५. पञ्च ˙˙˙˙'परे स्थाने' नास्ति-क. ग. ने. । ६. मित्यन्य- शेषः-ख., मित्यस्य शेषः-ज. ।

  1. हकार का ग्रहण करने पर ही पहली आवृत्ति में तीन तीन को छोड़ कर तीन शून्य बनेंगे तथा दूसरी आवृत्ति में एक एक को छोड़ कर तीन शून्य बनेंगे । इस तरह से छः शून्य बन जायंगे । इनमें से पाँच शून्य सामान्य हैं और अन्तिम को महाशून्य कहा गया है । यह महाशून्य प्रथम आवृत्ति के तीन शून्यों में से अन्तिम है । दीपिका की पद-
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