योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः संग्रहः । तार्तीयबीजशिखरवर्त्यर्धचन्द्ररोधिनीनादेषु स्वात्मचैतन्याभिव्यक्तिकारण- १नादकलनात्मकं तुर्यं तुरीयं भावनीयमित्यर्थः ॥१७९-१८०॥ २तुर्यातीतभावनामाह— तुर्यातीतं सुखस्थानं नादान्तादिस्थितं प्रिये ॥१८०॥ अत्रैव जपकाले तु पञ्चावस्थाः स्मरेद् बुधः । ३तुर्यातीतम्—“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्” (तै० उ० २।४) इत्युपनिषदुक्तरीत्या३ ४मनोवागतीतपरमा५नन्दस्वरूपं सुखस्थानं नादान्तादिस्थितं६ नादान्तशक्तिव्यापिकासमनोन्मनासु स्थितं ७तुर्यातीतं भावनीयमित्यर्थः । अत्रैव शक्तिबीज एव, पञ्चावस्था जागरिताद्याः पूर्वोक्ताः, जपकाले स्मरेद् बुधः पञ्चावस्थानुसन्धानपुरःसरं विद्याजपकरणावधाननिपुणः ॥१८०-१८१॥ रोधिनी और नाद स्थानों में अपने चैतन्य को अभिव्यक्ति देनेवाली नाद की स्थिति में साधक के कलनात्मक व्यापार का स्फुरण ही वस्तुतः तुरीय दशा की भावना कही जाती है ॥१७९-१८०॥ अब तुर्यातीत अवस्था की भावना बताते हैं— हे प्रिये ! तुर्यातीत वह सुखमय स्थान है, जिसकी भावना नादान्त आदि में की जाती है । विद्वान् साधक को चाहिये कि जप करते समय शक्ति बीज में ही इन पाँच अवस्थाओं की भावना करे ॥१८०-१८१॥ “जिस ब्रह्म तक बिना पहुँचे मन सहित इन्द्रियां वापस लौट पड़ती हैं, उस ब्रह्म की आनन्द स्वरूपता को जानने वाला (किसी से डरता नहीं)” इस तैत्तिरीय श्रुति के प्रमाण पर मन और वाणी से अतीत परमानन्द स्वरूप सुखमय स्थान ही तुर्यातीत अवस्था है । नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना स्थान में इस तुर्यातीत अवस्था की भावना करनी चाहिये । इस १शक्तिबीज में ही यहाँ बताई गई जागरित आदि पाँचों अवस्थाओं का जप के समय विद्वान् साधक को स्मरण करना चाहिये, श्रीविद्या का जप करते समय पूरी सावधानी से इन पाँचों अवस्थाओं का अनुसन्धान करते रहना चाहिये ॥१८०-१८१॥ १. णक्वणन्नादात्मकतुरीयरूपं भाव-क. । २. तुरीया-क ग. । ३. क्रमेण-ख. ने. उ. । ४. 'मनो' नास्ति-ख. ने. उ. । ५. परानन्द-ख. ने. झ. उ. । ६. इतः परम्— 'विलोमसुखस्थाने स्थितम्' इत्यधिकः पाठः-क. ग., 'विलोमक्रमेणैव सुखस्थानस्थितम्' इति तु-झ. । ७. तुरीया-क. ग. । १. केवल तृतीय शक्ति बीज में ही बारह कलाओं की भावना की जाती है । इस विषय की चर्चा पहले (३।१७०-१७३) आ चुकी है, अतः इन पाँच अवस्थाओं की भावना भी वहीं की जायेगी ।