योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६७ परामृश्यते । १सेयं सुषुप्तिः । विषयस्य तु । विषयं तार्तीयं बीजम्, विश्वव्याप्ति२- स्थानत्वात् । तस्य पूर्वार्णानां बिन्दुपूर्वस्थितानां वर्णानाम्, विलोमेन—"मायाबीजं महेशानि मादनं शक्रसंयुक्तम् । ३चन्द्रबीजं केवलं तु" (१।११६-११७) इत्यादि, "संहारक्रमयोगेन शक्तिबीजं समुद्धरेत्" (१।११८) इत्यन्तेन चतुःशतीशास्त्रे४ संहारक्रमोद्धृतानां शक्तिबीजवर्णानां विलोमक्रमेण परिपाट्या, भ्रूमध्ये बिन्दुसं- स्थिता भ्रूमध्यस्थानस्थितहृल्ले खोर्ध्वबिन्दौ स्थिता, भावनीयेत्यर्थः ।।१७८-१७९।। तुरीय५भावनामाह— तुर्यरूपं ६तस्य चात्र वृत्ताधार्दिस्तु संग्रहः ।।१७९।। चैतन्यव्यक्तिहेतोस्तु नादरूपस्य वेदनम् । चैतन्यस्य संविदो व्यक्तेः परामर्शस्य हेतोः, नादरूपस्य पूर्वोक्त(१।३३)लक्षण- नादस्य, वेदनम् अभिव्यक्तिः, ७तुर्यरूपम् । तस्य ७तुर्यरूपस्य । अत्र तार्तीय- बीजे, वृत्ताधार्दिः, वृत्ताधंम् अर्धचन्द्रः, आदिशब्देन८रोधिनीनादौ गृह्येते, तेषां से सुखमय स्वात्मस्वरूप का सभी कोई अनुभव करते हैं। इसी को सुषुप्ति कहते हैं। विषय का अर्थ यहाँ तृतीय (शक्ति) बीज किया जाता है, क्योंकि सारे विश्व में यह व्याप्त है। उसके पूर्व वर्षों का, अर्थात् बिन्दु के पहले विद्यमान वर्णों का उद्धार चतुः- शती शास्त्र (१।११६-११८) में विलोम क्रम से बताया गया है। संहार क्रम से उद्धृत इस शक्ति बीज के अक्षरों की विलोम क्रम से भ्रूमध्य में, अर्थात् भ्रूमध्य स्थान में विद्यमान हृल्लेखा के ऊपर स्थित बिन्दु में जो भावना की जाती है, यही सुषुप्ति दशा की भावना कही गई है ।।१७८-१७९।। तुरीयावस्था की भावना बताते हैं— चैतन्य की व्यक्ति के कारणभूत नादस्वरूप की अभिव्यक्ति को ही तुर्या- वस्था कहते हैं। इसकी स्थिति तृतीय बीज के अर्धचन्द्र, रोधिनी और नाद में रहती है ।।१७९-१८०।। चैतन्य, अर्थात् संवित् की अभिव्यक्ति नाद के कारण होती है। नाद का स्वरूप पहले (१।३३) बताया जा चुका है। नाद के कारण ही हम संवित् के स्वरूप को जान पाते हैं। स्वरूप की यह अभिव्यक्ति ही तुरीय दशा है। इस तुरीय दशा की भावना यहाँ तृतीय बीज के वृत्तार्ध (अर्धचन्द्र) में और आदि शब्द से रोधिनी तथा नाद में की जाती है। इन सबका संग्रह कर समष्टि रूप में इन तीन स्थानों में यह भावना की जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि तृतीय बीज के शिखर पर वर्तमान अर्धचन्द्र, १. 'सेयं सुषुप्तिः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । २. व्यापि-क. ग. झ. उ. । ३. इन्दु- ख. ने. । ४. शास्त्रोक्तरीत्या-ख., शास्त्रोक्त्या-ने. झ. । ५. तुर्य-उ. । ६. तथा-क. ग., च तस्यात्र-ख., तूर्यस्य-क., ७. तूर्य-क. ग., ८. शब्दात्-ख. ने. झ.।