भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३६६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः स्वप्नभावनामाह— आन्तरैः करणैरेव १स्वप्नो मायावबोधनः ॥१७७॥ गलदेशे बाह्येन्द्रिय२रहितैरान्तरैः करणैर्मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्ताख्यैरेव व्यवहारः प्रमातुः स्वप्नः। स मायया तार्तीय३बोजस्थेन चतुर्थस्वरेण, अवगतबोधनः, तद्वाच्य इत्यर्थः। गलदेशे स्वप्नस्य स्थानम् ॥१७७-१७८॥ सुषुप्तिभावनामाह— सुषुप्तिस्तु लीनपूर्वस्य वेदनम्। अन्तःकरणवृत्तीनां लयतो विषयस्य तु ॥१७८॥ पूर्ववर्णानां विलोमेन भ्रूमध्ये बिन्दुसंस्थिता। स्वप्ने विद्यमानानामन्तःकरणवृत्तीनां लयतः सर्वेन्द्रियोपरतिः सुषुप्तिरिति हि लक्षणम्। अतो लीनपूर्वस्य देहाक्षादिषु४ क्रोडीकृतस्य ५लीनस्थितस्यैव स्वात्मनो वेदनं प्रकाशनं भवति। 'सुखमहमस्वाप्सम्' इति हि पश्चात् सुखमयं स्वात्मरूपं स्वप्न की भावना बताते हैं— केवल आन्तर इन्द्रियों से स्वप्न का व्यवहार चलता है। माया बीज इसका बोधक है। गल देश में इसकी स्थिति है ॥१७७॥ बाह्य इन्द्रियों से रहित केवल आन्तर करणों से, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त से जो प्रमाता का व्यवहार चलता है, उसे स्वप्न कहते हैं। तृतीय बीज में स्थित चतुर्थ स्वर मायाक्षर ईकार से इसका बोध होता है। इसकी भावना कण्ठ स्थान में की जाती है ॥१७७॥ सुषुप्ति की भावना बताते हैं— सुषुप्ति दशा में अपने विलीन स्वरूप का बोध होता है। यहाँ अन्तःकरण की सभी वृत्तियाँ विलीन हो जाती हैं। तृतीय बीज के पूर्व वर्णों को विलोम क्रम से रखकर भ्रूमध्य में इसकी भावना की जाती है ॥१७८-१७९॥ स्वप्नदशा में अन्तःकरण की वृत्तियाँ काम करती रहती हैं। जब इन वृत्तियों का भी लोप हो जाता है, तो सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने व्यापार से उपरत हो जाती हैं। इसी स्थिति को सुषुप्ति दशा कहते हैं। इस दशा में देह, इन्द्रिय आदि में विलीन केवल स्वात्मस्वरूप का भान होता है। सोकर उठने के बाद 'मैं आराम से सोया' इस तरह १. स्वप्नमायावबोधकः-क. ग.। २. विरहितैः-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. यस्थाने ४. बोजे-घ.। ५. देहादिषु-ख. ने. ज. झ.। ६. लीनस्यैव-क. ग.।