भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३६९ इदानीं सप्तविषुवभावनां विवक्षन्नादौ१ प्राणविषुवभावनामाह— योगः प्राणात्ममनसां विषुवं प्राणसंज्ञकम्२ ॥१८१॥ प्राणस्य ३हकारात्मनो वायोः, आत्मनो यष्टुः, मनसश्च संयोगः प्राणविषुव४- मित्य॒च्यते। तदुक्तं ५शैवतन्त्रे—"शिष्यात्मप्राणमनसां संयोगं प्राणकं विदुः" इति ॥१८१॥ मन्त्रविषुवभावनामाह— आधारोत्थितनादे तु लीनं बुद्ध्वात्मरूपकम् । संयोगेन वियोगेन मन्त्राणां महेश्वरि ॥१८२॥ अनाहताद्याधारान्तं नादात्मत्वविचिन्तनम् । विषुवं६ आधाराद् मूलाधारात्, उत्थितेन वायुना, ७संभूते नादे ८विद्याशिखर- वर्तिनि, आत्मरूपकम् आत्मनो यद् रूपं संविदात्मकमानन्दैकरसीभूतम्, विद्या- अब सात विषुवों की भावना को कहने की इच्छा से पहले प्राण विषुव की भावना बताते हैं— प्राण, आत्मा और मन के संयोग को प्राणविषुव कहते हैं ॥ हकारात्मक वायु को यहाँ प्राण कहा गया है, आत्मा का अर्थ यहाँ यष्टा (यजन करने वाला) साधक है। प्राण वायु, साधक और मन का संयोग प्राणविषुव कहलाता है। किसी शैवतन्त्र में कहा गया है—'शिष्य की आत्मा, प्राण और मन के संयोग को प्राण- विषुव जानते हैं ॥१८१॥ मन्त्रविषुव की भावना बताते हैं— हे महेश्वरि ! मूलाधार से उठे नाद में आत्मस्वरूप को लीन जान कर श्रीविद्या के वर्णों के संयोग और वियोग से अनाहत से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त सर्वत्र नादात्मकता का चिन्तन ही मन्त्रविषुव है ॥१८२-१८३॥ आधार (मूलाधार) से उठे वायु से पैदा हुए विद्याशिखरवर्ती नाद में संविदात्मक आनन्द से समरस हुआ अपना जो स्वरूप है, साधक को पहले उसे भलीभाँति समझ लेना १. वक्ष्यन्नादौ-क.। २. ज्ञितम्-क. ग.। ३. ककारा-ख. ने. झ. उ.। ४. वदित्यु-ख. ने. ज. झ. उ.। ५. स्वैरतन्त्रे-ख. ग. ने. झ. उ.। ६. 'विषुवं' नास्ति-क. ग.। ७. 'संभूते' नास्ति-क. झ. उ.। ८. 'विद्या....मन्त्राणां' इत्यस्य स्थाने 'बिन्द्वादिषु वर्तिन्यात्मनो यष्टुः रूपं संविदात्मकं लीनं नादेनैकरसीभूतं बुद्ध्वा मन्त्राणां' इति पाठः-ख. ने. झ. उ.। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012) २४