भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 420

३७० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः मन्त्राणां वाग्भवकामराजशक्तिबीजानाम्, वियोगेन ¹व्यासरूपेण, संयोगेन समष्टिरूपेण ²तुरीयबीजेन, अनाहताद्याधारान्तम्, अनाहतं हृदयस्थानम्, आधा- राणां सर्वेषामन्तस्थानं ब्रह्मरन्ध्रम्, तत्पर्यन्तम् । अत्रान्तशब्दस्तन्त्रेणोच्चारितः । अनाहताद्याधारान्तमिति यावत् । नादात्मत्वविचिन्तनं नादस्य यष्टृरूपत्वविभावनं विषुवम्, मन्त्र³संज्ञकमिति शेषः । कोऽर्थः ? मूलाधारस्थितवाग्भवशिखरवर्तिनं नादं हृदयपर्यन्तमुच्चार्य तत्र स्वयं लीनो भूत्वा स्वात्मनस्तन्मयतानुसन्धानं मन्त्र- विषुवमित्यर्थः । तदुक्तं शैवतन्त्रे— आत्मनो⁴ नादमध्ये तु लयं संचार्य⁵ तत्त्वतः । अकारोकारवर्णादिसंयोगेन वियोगतः ॥ हृदया⁶दिबिलान्तं च विषुवं मन्त्रसंज्ञकम् । इति ॥१८२-१८३॥ नाडीविषुवभावनामाह— ⁷नादसंस्पर्शान्नाडीविषुवमुच्यते ॥१८४॥ चाहिये । इसके बाद श्रीविद्या नामक मन्त्र के वाग्भव, कामराज और शक्ति बीजगत वर्णों की अलग-अलग तथा तुरीय बीज को समष्टिरूप में अनाहत (हृदय) से लेकर समस्त आधारों के अन्त में स्थित ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त भावना करनी चाहिये । यहाँ अन्त शब्द की दो बार आवृत्ति की जाती है । एक अन्त शब्द का अर्थ आधारान्त (ब्रह्मरन्ध्र) और दूसरे अन्त शब्द का अर्थ पर्यन्त होगा, अर्थात् हृदय से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त यह भावना की जाती है । यहाँ नाद की आत्मरूपता का चिन्तन किया जाता है, नाद ही यष्टा (साधक) है, ऐसी भावना की जाती है । इसी को मन्त्रविषुव कहा जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि मूलाधार स्थित वाग्भव बीज के शिखर में वर्तमान नाद का हृदय पर्यन्त उच्चारण कर साधक उसी में लीन हो जाय और तब अपने में नादमयता का ही अनुसन्धान करे, नादमय मन्त्र में अपने को लीन समझे । इसी को मन्त्रविषुव की भावना कहते हैं । शैव- तन्त्र में मन्त्रविषुव का वर्णन इस तरह से किया गया है— वास्तव में नाद के मध्य में अपना विलय करके अकार, उकार आदि वर्णों का अलग अलग तथा समष्टि रूप में हृदय से ब्रह्मबिल (रन्ध्र) पर्यन्त उच्चारण ही मन्त्रविषुव कहलाता है ॥१८२-१८३॥ नाडीविषुव की भावना बताते हैं— हे प्रिये ! कामकलाक्षर से उठा नाद बारह ग्रन्थियों का भेदन करता हुआ जब सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचता है, तब उसका जो नाड़ियों १. ध्यान-क. ग., न्यास-झ. । २. तुर्य-ख. ने. उ. । ३. संज्ञित-क. ग. ज. झ. । ४. आत्मना-क. ग. ज. । ५. संचित्य पञ्चमः-ख. ने. झ. उ. । ६. याद्याधा- रान्तं-झ. । ७. नादसंस्पर्शात्तच्च स्यान्नाडी-क. ग.