भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७१ द्वादशग्रन्थिभेदेन वर्णाद् ¹नाड्यन्तरे प्रिये । वर्णाद् बीजत्रयंशिखरवर्ति²कामकलाक्षरात्, द्वादशग्रन्थिभेदेन मूलादिषट्- चक्रद्वादशग्रन्थीन् भित्त्वा तेन, नाड्यन्तरे सुषुम्नामध्यमार्गे³, नादसंस्पर्शात् त्रिबीज- शिखरवर्तिनो नादस्य मूलादि⁴ब्रह्मरन्ध्रान्तमुच्चारतः संस्पर्शात्, नाडीविषुव- मुच्यते । तदुक्तं शैवतन्त्रे— “मूलमन्त्रत्रिशूलेन भित्त्वा ग्रन्थीननुक्रमात् । नादनाडीसमायोगान्नाडीविषुवभावनम् ॥ इति ॥ १८३-१८४ ॥ प्रशान्तविषुवभावनामाह— नादयोगः प्रशान्तं⁵ तु प्रशान्तेन्द्रियगोचरम् ॥१८४॥ वह्निं मायां⁶ कलां चैव चेतनामर्धचन्द्रकम् । रोधिनीनादनादान्तान् शक्तौ लीनान् विभावयेत् ॥१८५॥ से स्पर्श होता है, उसी को नाडीविषुव कहते हैं ॥१८३-१८४॥ वर्ण का अर्थ है तीनों बीजों के शीर्ष भाग में स्थित कामकला नामक अक्षर । यह मूलाधार आदि षट्चक्र और बारह ग्रन्थियों को भेदकर सुषुम्ना नाडी के मार्ग से ब्रह्म- रन्ध्र तक पहुँचता है । तब तीनों बीजों के शिखरवर्ती नादात्मक अक्षर की मूलाधार से उठ कर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त उच्चरित होने की स्थिति में पूरी सुषुम्ना नाडी इसके स्पर्श से भर जाती है । इसी को नाडीविषुव कहते हैं । शैवतन्त्र में नाडीविषुव का वर्णन इस तरह से किया गया है— मूलमन्त्र रूपी त्रिशूल से एक एक कर सभी ग्रन्थियों का भेदन कर देने के उपरान्त नाद और नाडी का संयोग परिपूर्ण हो जाता है । इसी को नाडीविषुव की भावना कहते हैं ॥१८३-१८४॥ प्रशान्तविषुव की भावना बताते हैं— वह्नि, माया, कला, चेतना, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद और नादान्त का लय शक्ति में हो गया है, ऐसी भावना करे । नाड़ी से संबद्ध नाद यहाँ शक्ति में लीन हो जाता है । प्रशान्त इन्द्रिय वाला साधक ही इसको समझ पाता है, अतः इसे प्रशान्तविषुव कहते हैं ॥१८४-८५॥ १. नामन्तरे-क. ग. । २. र्तिनो नादस्य-क. ग ज. । ३. मार्गेण-ख. ने. झ. उ. । ४. लाद् ब्रह्म-ख ने. झ. उ. । ५. स्थूल-ख. ने. झ. । ६. न्तस्तत्प्र-ख. ने. च. ७. न्द्रं विभावयेत्-ख. ने. झ. । ८. वै-ख. ने. झ. ।