योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
३७० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः मन्त्राणां वाग्भवकामराजशक्तिबीजानाम्, वियोगेन ¹व्यासरूपेण, संयोगेन समष्टिरूपेण ²तुरीयबीजेन, अनाहताद्याधारान्तम्, अनाहतं हृदयस्थानम्, आधा- राणां सर्वेषामन्तस्थानं ब्रह्मरन्ध्रम्, तत्पर्यन्तम् । अत्रान्तशब्दस्तन्त्रेणोच्चारितः । अनाहताद्याधारान्तमिति यावत् । नादात्मत्वविचिन्तनं नादस्य यष्टृरूपत्वविभावनं विषुवम्, मन्त्र³संज्ञकमिति शेषः । कोऽर्थः ? मूलाधारस्थितवाग्भवशिखरवर्तिनं नादं हृदयपर्यन्तमुच्चार्य तत्र स्वयं लीनो भूत्वा स्वात्मनस्तन्मयतानुसन्धानं मन्त्र- विषुवमित्यर्थः । तदुक्तं शैवतन्त्रे— आत्मनो⁴ नादमध्ये तु लयं संचार्य⁵ तत्त्वतः । अकारोकारवर्णादिसंयोगेन वियोगतः ॥ हृदया⁶दिबिलान्तं च विषुवं मन्त्रसंज्ञकम् । इति ॥१८२-१८३॥ नाडीविषुवभावनामाह— ⁷नादसंस्पर्शान्नाडीविषुवमुच्यते ॥१८४॥ चाहिये । इसके बाद श्रीविद्या नामक मन्त्र के वाग्भव, कामराज और शक्ति बीजगत वर्णों की अलग-अलग तथा तुरीय बीज को समष्टिरूप में अनाहत (हृदय) से लेकर समस्त आधारों के अन्त में स्थित ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त भावना करनी चाहिये । यहाँ अन्त शब्द की दो बार आवृत्ति की जाती है । एक अन्त शब्द का अर्थ आधारान्त (ब्रह्मरन्ध्र) और दूसरे अन्त शब्द का अर्थ पर्यन्त होगा, अर्थात् हृदय से लेकर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त यह भावना की जाती है । यहाँ नाद की आत्मरूपता का चिन्तन किया जाता है, नाद ही यष्टा (साधक) है, ऐसी भावना की जाती है । इसी को मन्त्रविषुव कहा जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि मूलाधार स्थित वाग्भव बीज के शिखर में वर्तमान नाद का हृदय पर्यन्त उच्चारण कर साधक उसी में लीन हो जाय और तब अपने में नादमयता का ही अनुसन्धान करे, नादमय मन्त्र में अपने को लीन समझे । इसी को मन्त्रविषुव की भावना कहते हैं । शैव- तन्त्र में मन्त्रविषुव का वर्णन इस तरह से किया गया है— वास्तव में नाद के मध्य में अपना विलय करके अकार, उकार आदि वर्णों का अलग अलग तथा समष्टि रूप में हृदय से ब्रह्मबिल (रन्ध्र) पर्यन्त उच्चारण ही मन्त्रविषुव कहलाता है ॥१८२-१८३॥ नाडीविषुव की भावना बताते हैं— हे प्रिये ! कामकलाक्षर से उठा नाद बारह ग्रन्थियों का भेदन करता हुआ जब सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचता है, तब उसका जो नाड़ियों १. ध्यान-क. ग., न्यास-झ. । २. तुर्य-ख. ने. उ. । ३. संज्ञित-क. ग. ज. झ. । ४. आत्मना-क. ग. ज. । ५. संचित्य पञ्चमः-ख. ने. झ. उ. । ६. याद्याधा- रान्तं-झ. । ७. नादसंस्पर्शात्तच्च स्यान्नाडी-क. ग.
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७१ द्वादशग्रन्थिभेदेन वर्णाद् ¹नाड्यन्तरे प्रिये । वर्णाद् बीजत्रयंशिखरवर्ति²कामकलाक्षरात्, द्वादशग्रन्थिभेदेन मूलादिषट्- चक्रद्वादशग्रन्थीन् भित्त्वा तेन, नाड्यन्तरे सुषुम्नामध्यमार्गे³, नादसंस्पर्शात् त्रिबीज- शिखरवर्तिनो नादस्य मूलादि⁴ब्रह्मरन्ध्रान्तमुच्चारतः संस्पर्शात्, नाडीविषुव- मुच्यते । तदुक्तं शैवतन्त्रे— “मूलमन्त्रत्रिशूलेन भित्त्वा ग्रन्थीननुक्रमात् । नादनाडीसमायोगान्नाडीविषुवभावनम् ॥ इति ॥ १८३-१८४ ॥ प्रशान्तविषुवभावनामाह— नादयोगः प्रशान्तं⁵ तु प्रशान्तेन्द्रियगोचरम् ॥१८४॥ वह्निं मायां⁶ कलां चैव चेतनामर्धचन्द्रकम् । रोधिनीनादनादान्तान् शक्तौ लीनान् विभावयेत् ॥१८५॥ से स्पर्श होता है, उसी को नाडीविषुव कहते हैं ॥१८३-१८४॥ वर्ण का अर्थ है तीनों बीजों के शीर्ष भाग में स्थित कामकला नामक अक्षर । यह मूलाधार आदि षट्चक्र और बारह ग्रन्थियों को भेदकर सुषुम्ना नाडी के मार्ग से ब्रह्म- रन्ध्र तक पहुँचता है । तब तीनों बीजों के शिखरवर्ती नादात्मक अक्षर की मूलाधार से उठ कर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त उच्चरित होने की स्थिति में पूरी सुषुम्ना नाडी इसके स्पर्श से भर जाती है । इसी को नाडीविषुव कहते हैं । शैवतन्त्र में नाडीविषुव का वर्णन इस तरह से किया गया है— मूलमन्त्र रूपी त्रिशूल से एक एक कर सभी ग्रन्थियों का भेदन कर देने के उपरान्त नाद और नाडी का संयोग परिपूर्ण हो जाता है । इसी को नाडीविषुव की भावना कहते हैं ॥१८३-१८४॥ प्रशान्तविषुव की भावना बताते हैं— वह्नि, माया, कला, चेतना, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद और नादान्त का लय शक्ति में हो गया है, ऐसी भावना करे । नाड़ी से संबद्ध नाद यहाँ शक्ति में लीन हो जाता है । प्रशान्त इन्द्रिय वाला साधक ही इसको समझ पाता है, अतः इसे प्रशान्तविषुव कहते हैं ॥१८४-८५॥ १. नामन्तरे-क. ग. । २. र्तिनो नादस्य-क. ग ज. । ३. मार्गेण-ख. ने. झ. उ. । ४. लाद् ब्रह्म-ख ने. झ. उ. । ५. स्थूल-ख. ने. झ. । ६. न्तस्तत्प्र-ख. ने. च. ७. न्द्रं विभावयेत्-ख. ने. झ. । ८. वै-ख. ने. झ. ।
३७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वह्निं रेफम्, मायाम् ईकारम्, १कलां तन्मध्यवर्तिसपरार्धकलां२ रेखा- रूपाम्, चेतनां३ [बिन्दुम्], बिन्दुश्चैतन्यस्य संस्कारः, वेदनरूपत्वात्। तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्—"बिन्दुर्वेद्यस्य संस्कारो विसर्गः४ सर्ग इत्यसौ" (श्लो० ३७) इति। अर्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तांश्च५ पूर्वोक्त(१।३१)लक्षणायां६ ७शक्तौ लीनान् विभावयेत्। यतोऽयं ८नादो यष्टुस्तदतीतशक्तिलक्षणः, अतः प्रशान्ते- न्द्रियगोचरं सकलेन्द्रियातीतविषयं तत् प्रशान्तविषुवमित्यनुषङ्गः। तदुक्तं शैवतन्त्रे— अकारोकारवर्णौ च ९मकारं बिन्दुमेव च। नादनादान्तसंज्ञे१० च त्यक्त्वा ब्रह्मादिभिः क्रमात्॥ सप्तमे शक्तिमध्ये तु शिष्यात्मानं विचिन्तयेत्। प्रशान्तं तद्विजानीयात् प्रशान्तेन्द्रियगोचरम्॥इति॥१८४-१८५॥ वह्नि रेफ को, माया ईकार को, कला ईकार के मध्य में विराजमान रेखा रूप सपरार्ध कला को और चेतना बिन्दु को कहते हैं। यह बिन्दु चैतन्य का संस्कार करने वाला है, वेदनरूप है। अतः इसे यहाँ चेतना शब्द से कहा गया है। परापंचाशिका के अनुसार—"बिन्दु वेद्य जगत् का संस्कार तथा विसर्ग सर्गात्मक (सृष्टिस्वरूप) है"। वह्नि आदि के साथ अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद और नादान्त का पूर्व (१।३१) प्रद- र्शित लक्षण वाली शक्ति में लय हो गया है, ऐसी भावना करे। चूँकि यह नाद साधक की लोकातीत शक्ति का द्योतक है, अतः इसका साक्षात्कार समस्त इन्द्रियों के प्रशान्त होने पर ही हो सकता है। इस तरह से समस्त इन्द्रियों से अतीत शक्ति कला में लीन करा देने वाली यह स्थिति प्रशान्तविषुव नाम से जानी जाती है। जैसा कि शैवतन्त्र में कहा गया है— अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद और नादान्त का ब्रह्म प्रभृति १कारणषट्क के साथ परित्याग कर सप्तम शक्तितत्त्व में शिष्य की आत्मा लीन हो गई है, ऐसी भावना करे। प्रशान्त इन्द्रियों के द्वारा गृहीत होने वाली यह स्थिति प्रशान्तविषुव कही जाती है॥१८४-८५॥ १. कालं-ख. ने. झ. उ. । २. कलासंबन्धिरखारूपं-ख. ने. झ. उ. । ३. चेतना बिन्दुर्वेद्यस्य-ख. ने. झ. । ४. विमर्शः-क. ग. झ. । ५. नादान्ताः-ख. ने. झ. उ. । ६. लक्षणाः-ख. ने. झ. उ. । ७. 'शक्तौ लीनान् विभावयेत्' नास्ति-ख. ने. उ. । ८. प्रशान्तो नादयोगो-ख. ने. झ. उ. । ९. मकारो बिन्दुरेव-क. ग. ज. । १०. शक्ती च-ख. ने. झ. उ. ।
- नेत्रतन्त्र (२२।१९-२०) में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव और शिव का कारणषट्क के रूप में वर्णन किया गया है और कहा गया है कि इन छहों कारणों को छोड़ कर सप्तम निरामय, निरामय पद में साधक को प्रवेश करना चाहिये। यहाँ समस्त
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७३ शक्तिकालविषुव¹योर्भावनामाह— विषुवं शक्तिसंज्ञं तु तदूर्ध्वं नादचिन्तनम् । तदूर्ध्वं कालविषुवमुन्मनान्तं महेश्वरि ॥१८६॥ तदूर्ध्वं शक्तेरूर्ध्वं समनान्तम्, नादस्य चिन्तनं शक्तिविषुवम् । तदूर्ध्वं सम- नाया अप्यूर्ध्वम्, “नात्र कालकलामानम्” इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या काला- तीतोन्मनान्तं नादस्य चिन्तनं कालविषुवम् । तदुक्तं शैवतन्त्रे— शक्तिमध्यगतो नादः समनान्तं प्रसर्पति । तच्छक्तिविषुवं प्रोक्तमुन्मन्यां कालसंज्ञितम् ॥ इति ॥१८६॥ ननु कियता कालेन ³नादस्तत्त्वं वेद⁴यतीत्याह— मुनिचन्द्राष्टदशभिस्तु⁵टिभिर्नादवेदनम् । स्वस्थे नरे ⁶समासीने यावत् स्पन्दति लोचनम् । तस्य त्रिंशत्तमो भागस्तत्परः परिकीर्तितः ॥ शक्ति और कालविषुव की भावना बताते हैं— हे महेश्वरि ! शक्ति से ऊपर समना पर्यन्त नाद का चिन्तन शक्तिविषुव और समना से भी ऊपर उन्मना पर्यन्त नाद का चिन्तन कालविषुव कहलाता है ॥१८६॥ शक्ति से ऊपर समना पर्यन्त नाद का चिन्तन शक्तिविषुव कहलाता है । समना से भी ऊपर काल की कला से अतीत उन्मना कला में नाद का चिन्तन कालविषुव कहलाता है । स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—‘‘उन्मना कला में काल की कला की प्रतीति नहीं होती’’ । शैवतन्त्र में भी इन दोनों विषुवों का वर्णन मिलता है— शक्ति कला तक पहुँचा हुआ नाद जब समना पर्यन्त फैल जाता है, तो इसे शक्ति- विषुव कहते हैं । नाद के उन्मनी पर्यन्त फैल जाने पर उसको कालविषुव कहा जाता है ॥१८६॥ अब प्रश्न होता है कि यह नाद कितने समय में अपने वास्तविक स्वरूप को बताने में समर्थ होता है, उसी का उत्तर यह है— मुनि (सात), चन्द्र (एक), आठ और दस (१०८१७) त्रुटियों में उच्चरित नाद के अन्त में तत्त्व का ज्ञान होता है ॥ ‘‘स्वस्थ बैठे हुए मनुष्य की जितने समय में आँख झपकती है, उसका तीसवां भाग तत्पर कहलाता है । तत्पर का शतांश त्रुटि कहलाता है’’ । किसी तन्त्रान्तर के इस वचन १. षुवभा—ख. ने. ज. । २. न्मन्थन्तं—छ. ज. उ. । ३. नादत-झ. । ४. यन्ती-झ. । ५. त्रुटि-क. ग. । ६. सुखा-क. ग. । पद के रूप में शक्तितत्त्व का ग्रहण किया गया है । कारणषट्क विषयक अन्य विवरण के लिये लुप्ता० उपो० पृ० १९९ की दूसरी टिप्पणी देखिये ।
३७४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तत्परस्य शतांशस्तु १त्रुटिरित्यभिधीयते । इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या निमेषस्य त्रिसहस्रतमो भागस्तुटिः१। मुनयः सप्त, चन्द्र एकः, अष्ट दश संख्ये प्रसिद्धे । तेन हकाराद्युन्मन्यन्तानां विद्यावयवानां सप्त- दशाधि२काष्टशतोत्तरदशसहस्र३त्रुटिभिरुच्चारे "अकुले विषुसंज्ञे च" (१।२५) इत्युक्तरीत्या कृते सति नादस्यान्ते तत्त्वस्य वेदनमित्यर्थः । तत्त्वविषुवभावनामाह— चैतन्यव्यक्तिहेतुश्च विषुवं तत्त्वसंज्ञकम्३ ॥१८७॥ ४चैतन्यस्य स्वात्मतत्त्वस्य, व्यक्तिः प्रकाशस्य,५ हेतुस्तत्त्वविषुवम् । कोऽर्थः ? उन्मनोध्वेऽनन्तरोक्तसंख्यात६त्रुटिभिर्नादिलयात् स्वात्मानुसन्धानं तत्त्वविषुव- मित्यर्थः । तदुक्तं शैवतन्त्रे—"स्वाधिकारे परे धाम्नि विषुवं तत्त्वसंज्ञकम्" इति ॥१८७॥ परं स्थानं महादेवि निसर्गानन्दसुन्दरम् । के अनुसार निमेष का तीन हजारवाँ हिस्सा त्रुटि कहलाता है । मुनि से सात और चन्द्र से एक संख्या ली जाती है । आठ और दस संख्यायें प्रसिद्ध हैं । इस तरह से हकार से उन्मनी पर्यन्त विद्या के अवयवों के उच्चारण में पहले (१।२५) बताई गई विधि के अनु- सार १०८१७ त्रुटि काल लगेगा । इसके साथ ही नाद की समाप्ति पर तत्त्वविषुव की प्रतीति होगी ॥ अब तत्त्वविषुव की भावना बताते हैं— चैतन्य की व्यक्ति जिससे होती है, उसको तत्त्वविषुव कहते हैं ॥१८७॥ चैतन्य स्वात्मतत्त्व को कहते हैं । उसकी व्यक्ति, अर्थात् प्रकाश का कारण तत्त्व- विषुव है । इसका अभिप्राय यह है कि उन्मना के ऊपर अभी बताई गई संख्या की त्रुटियों के बीत जाने पर जब नाद का लय हो जाता हैं, तब साधक भी स्वात्मानुसन्धान में लीन हो जाता है । उसी स्थिति को तत्त्वविषुव की भावना कहते हैं । शैवतन्त्र में भी बताया गया है—"पर धाम स्वरूप स्वात्मतत्त्व जब अपने अधिकार में आ जाय, तो यही स्थिति तत्त्वविषुव कहलाती है" ॥१८७॥ हे महादेवि ! पर स्थान स्वाभाविक आनन्द से परिपूर्ण, अत एव परम सुन्दर है ॥ १. त्रुटि-क. ग. । २. काष्टोत्तर-क. ग., काष्टदशोत्तर-झ. । ३. ज्ञितम्-क. ख. ग. ने. । ४. अनन्तरोक्तरीत्या चैत-क. ग. । ५. शसाम्यहे-ने. । ६. संख्यावत् त्रु- क. ग. ने. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७५ परं शून्यषट्कावस्थापञ्चकसप्तविषुवकोलाहलातीतं स्थानम्, विश्वविश्रान्ति- भूमित्वाद् निसर्गानन्दसुन्दरम् । सर्वविषयानन्दसमष्टिभूतः परमानन्दो निसर्गा- नन्दः । अत एवानित्याशुचिक्लेशैर्दुर्भगभेद२प्रपञ्चपरिपन्थी पराकारण३रूपत्वात् परमानन्दलक्षणपरमप्रेमास्पदपरमसुन्दरपरशिवरूपं निसर्गानन्दसुन्दरमित्यर्थः४ ॥१८८॥ पूर्वोक्तभावनायाः फलमाह— एवं चिन्तयमानस्य जपकालेषु पार्वति ॥१८८॥ सिद्धयः सकलास्तूर्णं सिद्ध्यन्ति त्वत्प्रसादतः । एवं पूर्वोक्तप्रकारेण, जपकालेषु५ । जपाः “आज्ञान्तं सकलं प्रोक्तम्” (१।२७- २८) इत्यादिपूर्वोक्तरीत्या सकल-सकलनिष्कल-केवलनिष्कलरूपास्त्रिविधाः, तेषां कालाः “दीपाकारोऽर्धमात्रश्च” (१।२८-३४) इत्यादिना पूर्वोक्तविद्यावयवाना- मुच्चारणकालाः, तेषु शून्यषट्कादिकं चिन्तयमानस्य, सकलाः सिद्धयोऽणिमाद्याः ऊपर बताये गये शून्यषट्क, अवस्थापंचक और सप्तविषुव रूपी कोलाहल से दूर यह परम स्थान है, जहाँ कि यह सारा जगत् विश्राम की अनुभूति करता है । यह स्थान निसर्गानन्दसुन्दर है । सभी प्रकार के विषयों के आनन्द का समष्टिभूत आनन्द, जिसकी एक मात्रा के रूप में विषयानन्द स्फुरित होता है, परमानन्द अथवा निसर्गानन्द कहलाता है । इसीलिये यह अनित्य, अशुचि, क्लेश आदि दुर्भाग्य से भरे भेदरूपी प्रपंच का विरोधी है। परा भगवती का भी कारण रूप होने से यह परमानन्दमय परम प्रेमास्पद परमसुन्दर परमशिव का स्वरूप निसर्गानन्द से परिपूर्ण अत एव सुन्दर है ॥ १८८॥ पूर्वोक्त भावना का फल बताते हैं— हे पार्वति ! जप करते समय इन सबकी भावना करने वाले साधक को सभी सिद्धियाँ तुम्हारे प्रसाद से शीघ्र ही प्राप्त हो जाती हैं ॥१८८-१८९॥ जप करते समय पूर्वोक्त प्रकार से शून्यषट्क आदि की भावना करने वाले साधक को सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। सकल, सकलनिष्कल और केवल निष्कल नामक तीन प्रकार के जपों का वर्णन पहले (१।२७-२८) आ चुका है। इनके उच्चारण का काल पहले (१।२८-३४) बताया जा चुका है। श्रीविद्या का इस विधि से जप करते समय, उसके अवयवों का उच्चारण करते समय, शून्यषट्क आदि की भावना करने वाला साधक भगवती के प्रसाद से शीघ्र ही समस्त अणिमा आदि पूर्वोक्त (३।४४) सिद्धियों को १. ‘क्लेश’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. भेदप्रदेशपञ्चकपरि-क. ग. । ३. पर- त्वात्-क. ग. । ४. ‘इत्यर्थः’ नास्ति-क. ग. उ. । ५. काले तु-क. ग. उ. ।
३७६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पूर्वोक्ताः (३।४४), त्वत्प्रसादतः सिद्धयन्ति । प्रकाशात्मनो मम विमर्शशक्तौ त्वयि प्रसन्नायाम्—"१तत्र तत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते प्रभोः” (श्लो० ११४) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या सर्वप्रत्ययमय२ता[या]मुपगतायां तव प्रसादात् स्वायत्ता भवन्तीत्यर्थः ॥१८६-१८९॥ एवं कृत्वा जपं देव्या वामहस्ते निवेदयेत् ॥१८९॥ एवम् उक्तभावनापुरःसरम्, जपम् उक्तलक्षणं कृत्वा प्रकाशविमर्शसाम- रस्यरूपाया वामहस्ते विश्वकवलीकारपरे विमर्शमये निवेदयेत् ॥१८९॥ पूजाविधिमुक्त्वा तर्पणविधिमाह— अनामाङ्गुष्ठयोगेन तर्पयेच्चक्रदेवताः । अनामा शक्तिः, अङ्गुष्ठः शिवः, तयोर्योगेन मेलनेन, शिवशक्ति३मेलापनमुद्र- येत्यर्थः। चक्रदेवताः चतुरस्रादिबैन्दवान्तनवचक्रनिवासिनोः४ प्रकाशविमर्शसमरसी- भूताः, ५तर्पयेत्, (इत्यर्थः)६ । प्राप्त कर लेता है। प्रकाशात्मक मुझ शिव का तुम विमर्शारूप शक्ति हो। तुम्हारी प्रसन्नता के मिल जाने पर विज्ञानभैरव भट्टारक की बताई विधि से इन्द्रियों के द्वार से आत्मा के बाहर निकलने पर भी सर्वत्र भगवान् का ही स्वरूप भासित होता है। इस तरह से सभी प्रकार की अनुभूतियों में भगवान् के ही भासित होने पर भगवती के प्रसाद से सभी प्रकार की सिद्धियाँ साधक को स्वायत्त हो जाती हैं ॥१८६-१८९॥ इस तरह जप करके देवी के वामहस्त में उस जप को समर्पित कर दे ॥१८९॥ ऊपर बताई गई भावनाविधि के साथ ऊपर बताये गये जप को पूरा करके प्रकाश- विमर्श-सामरस्यस्वरूपिणी देवी के उस विमर्शमय बायें हाथ में, जिससे पकड़ कर वह देवी सारे विश्व को खा जाती है, समर्पित कर दे ॥१८९॥ पूजाविधि के उपरान्त तर्पण की विधि बताते हैं— अनामा और अंगुष्ठ के योग से श्रीचक्र में निवास करने वाले देवताओं को तृप्त करे ॥ अनामिका अंगुली शक्ति की और अंगुष्ठ शिव का प्रतीक है। इनके योग से, इनको मिलाकर, अर्थात् शिवशक्ति की मेलापन मुद्रा से चतुरस्र से बैन्दव पर्यन्त नौ चक्रों में निवास करने वाले प्रकाशविमर्श-सामरस्यरूप समस्त आवरण१ देवताओं (शक्तियों) को १. यत्र यत्रा-मु० । २. मध्यता-क. झ. उ. । ३. मेलन-क. ख. ग. । ४. सिन्यः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'तर्पयेदित्यर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'इत्यर्थः' इत्यनावश्यकः।
- एक सौ ग्यारह आवरण देवताओं की चर्चा पहले (२।१७) आ चुकी है।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७७ १प्रदानैस्तर्पणैः सम्यग् विशुद्धैरमृतात्मभिः । महाहन्ती २करोमोदं विश्वं हव्यपु३र्धरम् ॥ (सु० वा० ३९) इत्यभियुक्त ४वचनोक्तरीत्या परस्मिन् लयं भावयेदित्यर्थः ॥१९०॥ तर्पणसाधनानि वस्तून्याह— मद्यं मांसं तथा मत्स्यं देव्यै५ तु विनिवेदयेत् ॥१९०॥ शिवशक्तिमेलनमुद्रया समस्तमद्यस्य मांसस्य मत्स्यस्य च निवेदनमेव तर्पण- मिति भावः ॥१९०॥ समयस्थैरेव ६ सह पूजयेदित्याह— ७कौलाचारसमायुक्तैर्वीरैस्तु सह पूजयेत् । कुलमुक्त (१।५०,३।१३१)लक्षणं हेयतया ज्ञेयं येषां८ ते कौला दक्षिणादि- स्रोतःसु दीक्षिताः, तेषामाचारः "गुरुभक्तिश्च शान्तिश्च पूजा श्रद्धा क्षमा तृप्त करे । आन्तर तर्पण की विधि शुभगोदयवासना में शिवानन्द मुनि ने इस तरह से बताई है— शास्त्रप्रदर्शित विधि से परिशुद्ध, अमृतात्मक वस्तुओं के अर्पण और तर्पण के द्वारा मैं इस सारे विश्व को हवि का स्वरूप मानकर आत्माहन्ता में विलीन कर दे रहा हूँ ॥ इसका अभिप्राय यह है कि इस समस्त विश्व को परम तत्त्व में विलीन कर देना ही, इदन्ता का अहन्ता में लय कर देना ही, आन्तर तर्पण है । प्रधानतः साधक को इसी की भावना करनी चाहिये कि यह सारा जगत् मेरे ही स्वरूप में विलीन हो गया है ॥१९०॥ इस तर्पण के साधन द्रव्य ये हैं— देवी को मद्य, मांस और मत्स्य समर्पित करे ॥१९०॥ शिवशक्ति-मेलनमुद्रा द्वारा समस्त मद्य, मांस और मत्स्य का निवेदन ही तर्पण कहलाता है ॥१९०॥ समय में स्थित व्यक्तियों के साथ ही पूजा करनी चाहिये— कौलाचार से समायुक्त वीरों के साथ पूजन करे ॥ माता, मान और मेय लक्षण यह जगत् ही कुल है । इसका परित्याग करने के अभिप्राय से जो इस कुल को जानना चाहते हैं, उनको कौल कहते हैं । ये कौल दक्षिणा- म्नाय आदि में दीक्षित होते हैं । इनका आचार कौलाचार कहलाता है । स्वच्छन्दसंग्रह १. नैदानैः-ख. ज. झ. । २. हन्तां-दी. । ३. पुरःसरम्-ज. ग. । ४. क्तोक्त-ख. ने. ज. झ. । ५. देव्यास्तु-क. ग. । ६. स्थेनैव-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. कौलिकाचारसं- ख. ने. च. छ. झ. उ. । ८. यैस्ते कौलिकाः-ख. ने. ज. झ. उ. ।
३७८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः धृतिः" इत्यादिस्रवच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रेषु¹ विहितः, तद्युक्तैः । वीरैः, अहमि प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः । पराक्रमपरो भुङ्क्ते स्वभावमशिवापहम् ॥ (श्लो० ५०) इति परापञ्चाशिकोक्तरीत्या भेदप्रतीति²साधनस्य इदन्तारिपोरहमि ³सम- राङ्गणे प्रलयप्रतिपादनपरा⁴ वीराः, तैः सह पूजयेत्⁵ । तन्त्राचारपरिभ्रष्टैः प्रपञ्चव्रतशालिभिः । पशुभिः क्षुद्रकर्मस्थैर्न कुर्याद् द्रव्यमेलनम्⁶ ॥ इत्यादिवचनसिद्धैः सह न पूजयेदित्यर्थः ॥१९१॥ ननु कस्मिन्नक्षत्रे कस्मिन् वारे कस्मिन् वा दिने पूजेयं कार्येत्यत आह— ⁷पुष्यभेन तु वारे च सौरे च परमेश्वरि ॥१९१॥ गुरोर्दिने स्वनक्षत्रे चतुर्दश्यष्टमीषु च । में—'गुरुभक्ति, शान्ति, पूजा, श्रद्धा, क्षमा, धृति' इत्यादि का कौलाचार में परिगणन किया गया है। इन आचारों का पालन करने वाले वीर कहलाते हैं। परापञ्चाशिका में वीरों का स्वरूप इस तरह से वर्णित है— इदन्ता रूपी शत्रु का अहन्ता में विलय करने के प्रयास में लगा साधक सभी प्रकार के अमंगल का नाश कर देने वाले स्व-स्वरूप को प्राप्त कर लेता है ॥ इसके अनुसार भेदप्रतीति का जो साधन है, उस इदन्ता रूपी शत्रु का सामना करते हुए जो व्यक्ति उसको अभेद प्रतीति के सहारे अपनी अहन्ता में एकरस कर देता है, वही वस्तुतः वीर है। ऐसे वीरों के साथ भगवती की पूजा करनी चाहिये। कहीं कहा गया है— तन्त्राचार से परिच्युत, प्रपंच भरे व्रतों का पालन करने वाले, क्षुद्र कर्मों के अनुष्ठान में लगे हुए पशुओं के साथ द्रव्यमेलन न करे ॥ इस वचन में जिन अज्ञ जनों का उल्लेख किया गया है, उनके साथ उक्त पूजाविधि का अनुष्ठान नहीं करना चाहिये ॥१९१॥ अब प्रश्न होता है कि किस नक्षत्र, वार और दिन में इस पूजा का अनुष्ठान करना चाहिये, इसका उत्तर देते हैं— हे परमेश्वरि ! पुष्य नक्षत्र से युक्त रविवार के दिन, गुरु के जन्म और मृत्यु के दिन, अपने जन्म नक्षत्र में, चतुर्दशी और अष्टमी के दिन चक्रगत योगि- १. शास्त्रे-ख. ज. झ. उ. । २. सारस्य-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. रणाङ्गणे-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. परैः सह-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. इतः परम्-'न तु कातरैः सह पुत्रदारपरिभ्रष्टैः' इत्यधिकं-उ. । ६. भोजनम्-ख. ने. झ. । ७. नित्यं पुष्यदिने वारे- ख. ने. च. छ. ज. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७९ चक्रपूजां विशेषेण योगिनीनां समाचरेत् ॥१९२॥ "नित्यं सम्पूजयेद् देवीं सासनां सावृतिं क्रमात्" इति स्वच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रेषु १यद्यपि प्रतिदिनं पूजा विहिता, तथापि पुष्यभेन पुष्यनक्षत्रेण सह सौरे वारे, गुरो२रुदयव्याप्त्योर्दिने, स्वनक्षत्रे च, चतुर्दश्यष्टमीषु तिथिषु च, चक्रपूजां चतु- रस्रादिबैन्दवान्तचक्रगतानां देवतानां पूजां विशेषेण समाचरेत्। नित्यपूजा३वन्न भवति, किन्तु नैमित्तिकतया ४अष्टाष्टकादियोगिनीगणप्रीणनपुरःसरं पूजये- दित्यर्थः ॥१९१-१९२॥ ननु५ चक्रेऽष्टाष्टकपूजनं कथं संगच्छत इति शङ्कामपनुदन् विशेषपूजामेव विवृणोति— चतुःषष्टिर्यतः कोट्यो योगिनीनां महौजसाम् । चक्रमेतत् समाश्रित्य संस्थिता वीरवन्दिते ॥१९३॥ अष्टाष्टकं तु कर्तव्यं वित्तशाठ्यविवर्जितम् । ७त्रैलोक्यमोहनचक्रनिवासिनीनां ब्राह्म्यादीनामंशभूता अक्षोभ्याद्याश्चतुःषष्टि- नियों (शक्तियों) की पूजा विशेष रूप से करे ॥१९१-१९२॥ स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"आसन और आवरण देवताओं के साथ देवी की नित्य पूजा करे"। इस तरह से यद्यपि प्रतिदिन पूजा का विधान है, तो भी पुष्य नक्षत्र से संयुक्त रविवार के दिन, अपने गुरु के उदय (जन्म) और व्याप्ति (मरण) की तिथि में, अपने जन्म नक्षत्र के दिन और चतुर्दशी तथा अष्टमी तिथियों के आने पर चतु- रस्र से बैन्दव पर्यन्त चक्रों में विराजमान देवताओं की पूजा विशेष रूप से करनी चाहिये । नित्य पूजा की तरह इसका सामान्य अनुष्ठान न कर इन नैमित्तिक अवसरों पर विशेष पूजा का आयोजन करे । इसका अभिप्राय यह है कि अष्टाष्टक विधान द्वारा योगिनियों की पूर्ण तृप्ति के लिये विशेष पूजा का अनुष्ठान करे ॥१९१-१९२॥ श्रीचक्र में अष्टाष्टक पूजा की विधि कैसे संभव हो सकती है ? इस शंका का परि- हार करते हुए विशेष पूजा का विधान बताते हैं— हे वीरवन्दिते ! महाप्रभावशालिनी ६४ करोड़ योगिनियां इस चक्र में निवास करती हैं । अतः धन के लोभ को छोड़कर इस चक्र में अष्टाष्टक पूजा का अनु- ष्ठान करना चाहिये ॥१९३-१९४॥ १. 'यद्यपि' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । २. गुरुदय—ख. ने. ज. झ. ड. । ३. तु न—ख. ने. ज. झ. ड. । ४. 'अष्टाष्टकादियोगिनीनाम्' इत्येव—ख. ने. ज. ड. । ५. 'ननु'''' विवृणोति' नास्ति—ख. ने. ज. । ६. षष्टियुताः—क. ग. ड. । श्लोक एव नि० षो० (४।१७) इत्यत्रापि वर्तते । तत्रापि यत इत्येव पाठः । ७. 'त्रैलोक्यमोहन' नास्ति—ज. झ. ।
३८० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः योगिन्यः, तासां प्रत्येकमंशभूतानां कोटि१संख्याकानाम्, महौजसां महाप्रभाव- शालिनीनाम्, योगिनीनामुक्त(१।२, २।१७, २।७९) लक्षणानां मिलित्वा२ चतुः- षष्टिकोटयो यतश्चक्रमेतत् समाश्रित्य संस्थिताः । ३मध्यमभूगृहान्तश्चतुःषष्टि- कोटियोगिनीसमष्टिभूतानामक्षोभ्यादीनाम्, अष्टाष्टकम् अष्टकानामष्टकम्, वित्त- शाठ्यविवर्जितं स्वस्व४विभववञ्चनाहीनं यथा भवति तथा कर्तव्यम् । ५अत्र कृतिर्नाम ६पूजनक्रियायोगोऽभिप्रेतः ॥१९३-१९४॥ ननु तासां पूजने किमायातं ममेत्यत आह— त्वमेव तासां रूपेण क्रीडसे विश्वमोहिनि ॥१९४॥ त्रैलोक्यमोहन चक्र में निवास करने वाली ब्राह्मी आदि आठ योगिनियों की अंशभूत १अक्षोभ्या आदि चौसठ योगिनियाँ हैं । इनमें से भी प्रत्येक योगिनी के अंश से एक एक करोड़ योगिनियाँ निकलती हैं और इनकी संख्या ६४ करोड़ हो जाती है । ये योगिनियाँ महाप्रभावशालिनी हैं । योगिनियों का स्वरूप पहले (१।२, २।१७, २।७९) बताया जा चुका है । ये सब चौसठ करोड़ योगिनियाँ इसी श्रीचक्र में निवास करती हैं । यहाँ मध्य भूगृह में ६४ करोड़ योगिनियों का प्रतिनिधित्व करने वाली अक्षोभ्या प्रभृति ६४ योगिनियों की २अष्टाष्टक (आठ अष्टक) क्रम से पूजा करनी चाहिये । ऐसा करते समय अपने वैभव के अनुसार दिल खोल कर धन खर्च करना चाहिये, इसमें कंजूसी नहीं दिखानी चाहिये । यहाँ कृति (कर्तव्य) पद का संबन्ध पूजन क्रिया से जोड़ना अभिप्रेत है, अर्थात् अष्टाष्टक पूजा करते समय धन का संकोच नहीं करना चाहिये ॥१९३-१९४॥ प्रश्न उठता है कि ऐसा करने से मुझे क्या मिलेगा ? इसी का उत्तर देते हैं— सारे विश्व को मोहित करने वाली तुम ही इन योगिनियों के रूप में क्रीडा करती हो ॥१९४॥ १. कोटिकोटि—ख. ने. झ. । २. इत्युक्तत्वात्—ख. ने. ज. झ. ड. । ३. मध्यभू- गृहोदित—क. ग. उ. । ४. वित्त—क. ग. उ. । ५. 'अत्र कृतिर्नाम' नास्ति—ख. ज. । ६. यागपूजित—ख. ज. झ. । १. अक्षोभ्या आदि चौसठ योगिनियों के नाम प्रतिष्ठा लक्षणसारसमुच्चय (६।३२७- ३३५) में ब्रह्मयामल के प्रमाण से दिये गये हैं । २. अष्टाष्टक शब्द का अर्थ पृ०२११ की दूसरी टिप्पणी में दिया जा चुका है । ब्राह्मी आदि आठ योगिनियों तथा स्वच्छन्द आदि आठ भैरवों में से प्रत्येक के आठ आठ स्वरूप मिलकर इस अष्टाष्टक पद को सार्थक करते हैं । इन चौसठ युगल स्वरूपों की अर्चाविधि ही अष्टाष्टक पूजा कहलाती है ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८१ प्रकाशात्मनो विश्वबोधकस्य ममांशभूता विमर्शरूपिणी त्वमेव बैन्दवचक्रगता, विश्वमोहिनी संसारित्वोपपादनकारिणी, तासां ब्राह्माद्यादीनामक्षोभ्यादीनां च रूपेण क्रीडसे, एका सती भगवतो परमार्थतोऽपि संदृश्यसे बहुविधा ननु नर्तकीव । (अ० स्त० १८) इत्यभियुक्तोक्तरीत्या तत्तद्रूपेण परिणमसे । अतस्त्वदंशभूतयोगिनीयजनेन त्वमेव प्रीणासीत्यर्थः ॥१९४॥ ननु व्युत्पत्तिबलादेवागमार्थमवगम्य तत्तत्तन्त्रोदितपूजादिषु प्रवृत्तिः स्यात् किं गुरूपदेशेनेत्याशङ्क्याह— अज्ञात्वा तु कुलाचारमयष्ट्वा गुरुपादुकाम् । योऽस्मिन् शास्त्रे प्रवर्तेत तं त्वं पीडयसि ध्रुवम् ॥१९५॥ स्वप्रकाशशिवमूर्तिरेकिका तद्विमर्शत नुरेकिका तयोः । सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः ॥ (चि०१) अपनी प्रकाशात्मकता के कारण सारे विश्व का बोध कराने वाले मुझ शिव की अंशभूत तुम विमर्शरूपिणी शक्ति हो । तुम ही बैन्दव चक्र में निवास करने वाली और सारे विश्व को मोह में डालकर इस संसार-चक्र को चलाने वाली हो । तुम ही ब्राह्मी प्रभृति और अक्षोभ्या प्रभृति योगिनियों के आठ और चौसठ स्वरूपों को धारण कर इस विश्व में क्रीडा करती हो । अम्बास्तवकार ने ठीक ही कहा है— भगवती परमार्थतः (वास्तव में) एक ही है । ऐसा होने पर भी नर्तकी (नटी) जैसे अभिनय करते समय अनेक रूप धारण करती है, उसी तरह से यह देवी भी हमारे सामने अनेक रूपों में प्रकट होती है ॥ इस प्रकार बैन्दव चक्रनिवासिनी भगवती त्रिपुरसुन्दरी ही इन योगिनियों के रूप में परिणत होती है । अतः तुम्हारी अंशभूत इन योगिनियों की पूजा करने पर यह तुम्हारी ही पूजा होती है, तुम ही इस पूजा से प्रसन्न होकर अपने भक्तों पर अनुग्रह करती हो, उनकी मनोकामना पूरी करती हो ॥१९४॥ यहाँ शंका उठती है कि शास्त्रीय व्युत्पत्ति के आधार पर आगमशास्त्र के अर्थ को जानकर उन उन तन्त्रों में बताई गई पूजाविधि का ज्ञान हो जायगा । ऐसी स्थिति में गुरु की क्या आवश्यकता है ? इसका समाधान करते हैं— कुलाचार को बिना जाने, गुरुपादुका की बिना पूजा किये, जो व्यक्ति इस शास्त्र में प्रवृत्त होता है, उसको तुम निश्चय ही पीडा पहुँचाती हो ॥१९५॥ १. श्यते—ख. ने. ज. झ. उ. । २. यसे—क. ज. ड. ।
३८२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः १इत्यस्मदुक्तरीत्या २त्रिधामगुरोः । “अविदित्वा कुलाचारं कुलं कौलिक- दर्शनम्” । तत्राचारः स्वच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रे विहितः, तं गुरुमुखाद्विज्ञाय योऽ- स्मिन् शास्त्रे प्रवर्तेत ३योऽस्मिन् ४साधने प्रवर्तेत, तदुक्तार्थचरणपरो भवेत्, तं चुम्बकं५ साधकाधमम्, त्वं६ डाकिनीक्रूरयोगिनीरूपेण साधकमांसमज्जादिशोष- णादिरूपेण पीडयसि गृह्णासि, ध्रुवं नात्र शङ्का। अतो गुरुमुखादेवा७खिलागमा- र्थानवगम्यास्मिन् शास्त्रे प्रवर्तितव्यम्, अन्यथा निष्फलं स्यादित्यर्थः ॥१९५॥ एवं ज्ञात्वा वरारोहे कौलाचारपरः सदा । आवयोः शबलाकारं ८मद्यं मांसं निवेद्य च ॥१९६॥ त्वत्प्रथाप्रसराकारैस्त्वामेव ९परिभावयेत् । स्वयं प्रकाशस्वरूप शिव की एक मूर्ति है और उसका विमर्शशक्तिमय दूसरा शरीर है। इन दोनों के सामरस्यमय शरीर से परा पादुका बनती है, जो कि परमशिव स्वरूप गुरु का देह है ॥ इस तरह से स्वयं व्याख्याकार ने अपने १चिद्विलास स्तव में गुरु के प्रकाश, विमर्श और सामरस्यमय तीन तेजस्वी स्वरूपों का वर्णन किया है। इस गुरु से कुलाचार, कुल और कौलिक दर्शन को बिना जानकारी प्राप्त किये किया गया सारा अनुष्ठान निष्फल हो जाता है। स्वच्छन्दसंग्रह प्रभृति शास्त्रों में कुलाचार का उपदेश किया गया है, किन्तु उसको गुरुमुख से जानकर ही इस शास्त्र में प्रवृत्त होना चाहिये। जो गुरुमुख से बिना जाने इस शास्त्र में विहित अनुष्ठान में प्रवृत्त होता है, वह चुम्बक है, अधम साधक है। ऐसे साधक को तुम डाकिनी, क्रूर योगिनी का स्वरूप धारण कर, उस साधक के मांस, मज्जा आदि धातुओं का शोषण कर, पीड़ा पहुँचाती हो, इसमें किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये। इसलिये गुरुमुख से ही समस्त आगमशास्त्र का अर्थ जानकर इस शास्त्र में प्रवृत्त होना चाहिये, अन्यथा सारे किये कराये पर पानी फिर जाता है ॥१९५॥ हे वरारोहे ! ऐसा जान कर कौलाचार का पालन करते हुए साधक को चाहिए कि वह शिव और शक्ति के शबलित आकार वाले मद्य और मांस को समर्पित कर विमर्श शक्ति के स्पन्दन से निकले सभी आकार एकमात्र तुम्हारे ही स्वरूप हैं, ऐसी भावना करे ॥१९६-१९७॥ १. इत्यभियुक्तोक्त-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. 'त्रिधाम' नास्ति-क. । ३. 'यः' नास्ति-क. ग. उ. । ४. शास्त्रे पूर्वोक्तपरमहितपरदेवतायजनपरमार्थसाधक- स्तुदु-क. ग. । ५. कसाधकं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. 'त्वं डाकिनीक्रूरयोगिनीरूपेण' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. । ७. खिलमप्यव-क. ग. । ८. मद्यं तत्र-क. ख. ग., देवि तच्च-च. छ. ज. झ., मद्यं तव-उ. । मद्यं मांसमिति दीपिकाव्याख्यातः पाठः । ९. स्त्वय्येव-ख. ने. छ. ज. झ. उ. । यह श्लोक पहले ही दो बार (पृ० ३४०, ३३६) उद्धृत हो चुका है ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८३ वरारोहे "वरारोहा मत्तकाशिन्युत्तमा वरवर्णिनी" (अ० को० २।६।४) इति निघण्टुः । एवम् उक्तप्रकारेण, ज्ञात्वा गुरुमुखादेव। कौलाचारपरः, कौलिकाः पूर्वोक्त(३।१४४,१९१)लक्षणाः, तेषां विहिताः स्वच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रेष्वाचाराः, सदा तदनुष्ठानपरः । आवयोः प्रकाशविमर्शात्मनोः, शबलाकारम् “सुरा शक्तिः शिवो मांसमानन्दो मोक्ष उच्यते” इत्यभियुक्त^१वचनोक्तरीत्या सामरस्या- पादनरूपं तत्पूर्वोक्त(३।९८-१०३)रीत्या शोधितममृतीकृतं ^२मद्यं मांसं निवेद्य । आवयो^३रित्थेव योज्यम् । त्वत्प्रथाप्रसराकाराः । तव विमर्शशक्तेः, प्रथा स्पन्दः, तत्प्रसराः तदुद्भूताः, आकारा यासामावरणदेवतानाम्, तास्तथाविधाः, ^४त्वामेव त्वदन्यतो न ^५प्रथायाताः परिभावयेत्, वरारोहा, मत्तकाशिनी, उत्तमा और वरवर्णिनी—इन चार शब्दों का प्रयोग अमर- कोश में उत्कृष्ट गुणों वाली स्त्री के लिये किया गया है। भगवान् शिव यहाँ देवी को 'वरारोहे' कहकर संबोधित कर रहे हैं। कौलिक पद की व्याख्या पहले (३।१४४,१९१) की जा चुकी है। इनके आचारों का वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह^१ आदि शास्त्रों में किया गया है। ऊपर बताई गई विधि को गुरुमुख से जानकर कौलाचारपरायण साधक को चाहिये कि इन आचारों का सदा पालन करते हुये प्रकाश और विमर्श स्वरूप शिव और शक्ति के शबल आकार को, शिव और शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप को, अभिव्यक्त करने वाले मद्य और मांस को पूर्व प्रदर्शित (३।९८-१०३) अर्घ्यशोधन विधि से पवित्र, अमृतस्वरूप बना कर हम दोनों को समर्पित करे। किसी प्रामाणिक व्यक्ति के वचन के अनुसार—“सुरा शक्ति का, शिव मांस का और आनन्द मोक्ष का वाचक है”। तद नुसार 'आवयोः' पद की आवृत्ति कर पहले इसका संबन्ध मद्य और मांस से तथा बाद में शिव और शक्ति से जोड़ा जाता है, अर्थात् शिवशक्तिमय इन द्रव्यों को शिवशक्ति को ही समर्पित कर देना चाहिये। 'तत्प्रथाप्रसराकाराः' इस समस्त पद का अर्थ है—तुम्हारे, विमर्श शक्ति के स्पन्दन से जिन आकारों, आवरण देवताओं की उत्पत्ति हुई है, वे सब आकार। ये सब आकार तुम ही हो, तुमसे ये आकार अलग नहीं हैं, ऐसी भावना करनी चाहिये। सुभागोदयकार शिवानन्द मुनि ने कहा है— १. क्तोक्त- ज. उ. । २. 'मद्यं मांसं' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ३. योनियो- क. ग. । ४. त्वमेव-ज. ने. झ. उ. । ५. पृथग्भूताः-क. ग., पृथग्याताः-ख. ने. उ. । १. पहले (३।१९१) उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में संक्षेप में इन आचारों का उल्लेख हो चुका है।
३८४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः मूलोद्भवं शक्तिचक्रं यतस्तन्मयतां गतम् । तस्मिन्नेवाव्यये धाम्नि विलीनं परिभावयेत् ॥(सु० ६७) इत्यभियुक्तोक्तवचनोक्तरीत्या विमर्शशक्तिविलासभूताद्याकारायास्ता आवरण- देवतास्तत्रैव विलीना विभावयेदित्यर्थः ॥१९६-१९७॥ त्वामिच्छाविग्रहां देवीं गुरुरूपां विभावयेत् ॥१९७॥ ²त्वन्मयस्य गुरोः शेषं निवेद्यात्मनि योजयेत् । देवीं ³विश्वरूपिणीं विश्वानुजिघृक्षया गृहीतलीलाविग्रहाम्, ⁴इच्छाविग्रहा- मित्यर्थः। त्वामेव गुरुरूपां विभावयेत् । त्वन्मयस्य त्वद्रूपस्य, गुरोस्तद्धेतुं निवेद्य, शेषं देवतागुरुनिवेदितशेषम्, आत्मनि योजयेत् । यावत् साधकस्ताभ्यां समरसी- भवति, तावच्छेषं स्वयमुपयुञ्जीतेत्यर्थः ॥१९७-१९८॥ बलिनिवेदनमाह— प्रकाश-विमर्श-सामरस्यात्मक मूल-स्वरूप (त्रिपुरा) से उत्पन्न हुआ यह आवरण देवताओं का शक्तिचक्र अब पुनः तन्मय हो गया है, उसी अव्यय तत्त्व में लीन हो गया है, ऐसी भावना करनी चाहिये ।। इस तरह से विमर्श शक्ति के विलासभूत आद्या भगवती त्रिपुरसुन्दरी के स्वरूप से निकला यह सारा आवरण देवताओं का समूह पुनः उसी मूलस्वरूप से विलीन हो गया है, ऐसी भावना करनी चाहिये ॥१९६-१९७॥ इच्छानुसार स्वरूप धारण करने वाली तुम देवी को ही अपना गुरु माने और तुमको ही नैवेद्य चढ़ाकर देवता और गुरु की पूजा के बाद बचे नैवेद्य को स्वयं ग्रहण करे ॥१९७-१९८॥ भगवती त्रिपुरसुन्दरी देवी ही विश्व का स्वरूप धारण करती है, विश्व पर अनुग्रह करने की इच्छा से वह लीलामय स्वरूपों को धारण करती रहती है। अतः साधक को चाहिये कि वह गुरु के रूप में तुम्हारा ही ध्यान करे । गुरु भगवतीमय है, ऐसी भावना करके वह गुरु को हेतु द्रव्य समर्पित करे और इसके बाद, देवता और गुरु को समर्पित करने के बाद, बचे हुए द्रव्य को स्वयं ग्रहण करे । जितने द्रव्य के ग्रहण से साधक देवता और गुरु के साथ सामरस्यमय स्थिति का अनुभव करता है, उतने ही द्रव्य को वह ग्रहण करे ॥१९७-१९८॥ इसके बाद बलि का निवेदन करे— १. युक्तोक्त्या—ख. ने. झ. उ. । २. शेषं गुरोर्निवेद्याऽपि पश्चादात्मनि-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ३. विमर्श—ख. ने. ज. झ. । ४. 'इच्छाविग्रहाम्' नास्ति-क. ज. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८५ योगिनीनां महादेवि बटुकायात्मरूपिणे ॥१९८॥ क्षेत्राणां पतये मह्यं बलिं कुर्वीत हेतुना । योगिनीनां पूर्वोक्त(२।३९)रीत्या मातृमानमेयमरोचीनाम्। आत्मरूपिणे परमानन्दस्पन्दरूपिणे बटुकाय। क्षेत्राणां पतये, क्षेत्राणि शरीराणि, तेषां पति- र्जीवात्मा, तस्मै। मह्यं मदहन्ताविष्टाय। हेतुना मद्येन सद्वितीयेन। बलिं कुर्वीत। श्वासद्वयनिरोधेन कुण्डलोत्रयमेलनात्। यज्जीवशिवयोरैक्यं तेनासावान्तरो बलिः॥ हे महादेवि ! योगिनियों के प्राणस्वरूप बटुकभैरव को और मुझ क्षेत्रपाल को इसके बाद हेतु द्रव्य से बलि देनी चाहिये ॥१९८-१९९॥ संवित्स्वरूपिणी भगवती की माता, मान और मेयमय किरणें ही पहले (२।७९) बताई गई पद्धति से योगिनियाँ¹ कहलाती हैं। इन योगिनियों के लिये परम आनन्द को स्पन्दित करते हैं भगवान् स्वात्मस्वरूप बटुकभैरव। क्षेत्र शरीर को कहते हैं। इनका पति है जीवात्मा। यह जीवात्मा मुझ शिव के साथ अहन्ता स्थापित किये हुए है, शिवाहन्ता से ओतप्रोत है। इस तरह से इन गुणों से अलंकृत बटुक और क्षेत्रपाल को द्वितीय द्रव्य १. मातृस्वरूपिणे-ख. ने. ज. झ. उ. ।
- अमृतानन्द ने यहाँ (पृ० ६-७, ११९, २११) योगिनी शब्द की चार तरह की व्याख्या की है। योगिनीहृदय शब्द की व्याख्या के प्रसंग (पृ० ६-७) में वे कहते हैं कि इस ग्रन्थ में योगिनी (स्वसंवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा) का हृदय (स्वरूप) उसी प्रकार प्रकट हुआ है, जैसे सामान्य जन के हृदय में अपना ज्ञान उन्मिषित होता है। यहाँ योग का अर्थ है जगत् की सारी वस्तुओं के साथ अपनी संवित् (ज्ञान) का समवाय (अविनाभाव) संबन्ध। इससे भासित होने वाली है योगिनी। दूसरी जगह (पृ० ११९) योगिनी और वीरशब्द की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं कि जिनका शिव के साथ योग, नित्य संपर्क बना रहता है, वे योगिनियाँ कहलाती हैं। ये हैं विमर्श शक्ति की अंशभूत इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों से अभिव्यक्त हुई भारती, पृथ्वी और रुद्राणी नामक शक्तियाँ। वीर पद का अर्थ पहले (१।६५) बता दिया गया है। प्रकाश की अंशभूत वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों से अभिव्यक्त सृष्टि-स्थिति-संहार कारक ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामक वीरों का उक्त भारती, पृथ्वी और रुद्राणी नामक योगिनियों से सदा संपर्क बना रहता है। तीसरी और चौथी व्याख्या वे इस तरह से करते हैं—माता, मान और मेय रूप संवित्तियाँ ही योगिनियाँ कहलाती हैं। उनके मेलन का अर्थ है उनको अन्तर्मुख बना कर परप्रमाता स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देना। अथवा ब्राह्मी प्रभृति के अष्टाष्टक स्वरूपों की उपासना के लिये सामयिक शक्तिचक्र को भी योगिनी नाम दिया जाता है। प्रस्तुत स्थल में योगिनी शब्द का तृतीय अर्थ गृहीत है।
३८६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यस्मदुक्तरीत्या सद्वितीयमद्य¹स्वीकारेणोल्लसिते मनसि, ²स्वतः प्राणा- पानयोः संचारे शान्ते, निरस्ते ³त्रित्वलक्षणे भेदे, शिवोऽहमस्मीति स्वान्तरो बलि- रित्यर्थः ॥ ॥१९८-१९९॥ ततः स्वैराचारपरो भूयादित्याह— ⁴नित्यं पिबन् वमन् खादन् स्वेच्छाचारपरः स्वयम् ॥१९९॥ अहन्तेदन्तयोरैक्यं भावयन् विहरेत् सुखम् । नित्यं प्रत्यहम्, पिबन् देवतागुरुनिवेदितशेषं हेतुम्, खादन् तच्छेषं खाद्यम्, वमन् द्वयमपीति सामर्थ्याल्लब्धम् । स्वेच्छाचारपरः यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् । तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं सम्प्रकाशते ॥ (श्लो० ७३) के साथ हेतु द्रव्य को बलि समर्पित करे । व्याख्याकार ने स्वयं अपने किसी ¹अन्य ग्रन्थ में कहा है— प्राण और अपान रूपी दोनों श्वासों का निरोध कर और ²तीनों कुण्डलिनियों का मेलन कर जो जीव और शिव में ऐक्यभाव स्थापित किया जाता है, इसी को आन्तर बलि कहा जाता है ॥ ऐसा करने से द्वितीय द्रव्य के साथ मद्य का प्रसाद ग्रहण करने के उपरान्त जब मन उल्लसित होता है, तो उस समय प्राण और अपान वायु का संचार स्वतः शान्त हो जाता है तथा माता, मान और मेय रूप त्रिपुटी का सारा प्रपंच भी समाप्त हो जाता है । उस समय मात्र 'मैं शिव हूँ' यह अनुभूति बची रहती है । इस अद्वयप्रतिष्ठात्मक अनुभूति का ही यहाँ आन्तर बलि के नाम से विवरण दिया गया है ॥१९८-१९९॥ इसके बाद साधक यथेच्छ आचरण कर सकता है— प्रतिदिन पीता हुआ, वमन करता हुआ, खाता हुआ साधक स्वयं स्वैराचारी हो जाय, अहन्ता और इदन्ता में एकता की भावना करता हुआ सुखपूर्वक विचरण करे ॥१९९-२००॥ प्रतिदिन देवता और गुरु को समर्पित हेतु द्रव्य के बचे भाग को पीता हुआ, बचे हुए खाद्य पदार्थ को खाता हुआ और दोनों को यथेच्छ वमन करता हुआ साधक स्वैरा- चार परायण हो जाय । विज्ञानभैरव भट्टारक ने बताया है— १. स्वीकारणोल्लासिते—ख. ने. झ. । २. अत एव—क. ग. ज. । ३. त्रितत्त्वल- ख. ने. । ४. पिवन्नित्यं—ने. च. छ. ज. झ. उ. । १. यह श्लोक भी व्याख्याकार के तत्त्वविमर्शिनी नामक ग्रन्थ का हो सकता है । २. तीनों कुण्डलिनी हैं—अधः कुण्डलिनी, मध्य कुण्डलिनी (श्लो० १३) और ऊर्ध्व कुण्डलिनी (श्लो० २७) ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८७ इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या स्वस्य यत्र यत्रेच्छा जायते तत् तदेव शास्त्र- विहितम्, यत्र यत्रेच्छा न जायते तत्तदेव शास्त्रनिषिद्धम्¹। अतः स्वेच्छानुकूल- पदार्थाननु²भवेत्, तत्प्रतिकूलपदार्थान् परित्यजेदित्यर्थः । अहन्तेदन्तयोरैक्यं भावयन् । अहन्ता ज्ञातृधर्मः, इदन्ता ज्ञेयधर्मः, तयोरैक्यम् "यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते" इत्यादिपूर्वं(२।७९, ३।१४१)प्रतिपादितरीत्या ज्ञातृज्ञेयचैतन्ययोः समरसीकरणलक्षणं ³ज्ञानम्, तदेवाहमिति भावयन् सुखं विह- रेत् । परिपूर्णज्ञानानन्दो भवेदित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद् भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत् ॥ (श्लो० ७१) इति ।।१९९-२००।। जहाँ जहाँ मन की तुष्टि हो, मन को संतोष हो, उसको वहीं स्थिर कर दे। ऐसा करने से साधक के हृदय में उसी स्थिति में परमानन्दमय स्वात्मस्वरूप प्रकाशित हो उठता है ।। इस तरह से साधक योगी को जिस विषय को प्राप्त करने की इच्छा हो, उसी को शास्त्रविहित माने; जहाँ जहाँ इच्छा न हो, उसी को शास्त्रनिषिद्ध समझे । इस प्रकार अपनी इच्छा के अनुकूल स्वरूप वाले पदार्थों का उपभोग करे और इसके प्रतिकूल पदार्थों का परित्याग कर दे । ऐसा करते समय अहन्ता और इदन्ता में एकता की भावना अवश्य करता रहे । अहन्ता ज्ञाता का धर्म है और इदन्ता ज्ञेय का । इन दोनों में एकता की भावना पहले (पृ० २११, ३३३) उद्धृत स्तोत्रावली के वचन में प्रतिपादित इस पद्धति से की जाती है—"जहाँ जहाँ संवित् की किरणें मिलती हैं, इन्द्रियों का विषयों के साथ संपर्क होता है, वहीं वहीं भगवान् शिव का व्यापक स्वरूप आलोकित हो उठता है"। इस तरह से ज्ञाता और ज्ञेय के रूप में स्फुरित हो रहे चैतन्य को समरस करने वाला ज्ञान ही 'मैं वही हूँ' इस प्रत्यभिज्ञा ज्ञान के रूप में अभिव्यक्त होता है। इसी की भावना करता हुआ योगी सुखपूर्वक विचरण करे, अर्थात् परिपूर्ण ज्ञान और आनन्द से सराबोर हो जाय । विज्ञानभैरव भट्टारक ने इस स्थिति का वर्णन इस तरह से किया है— ¹जग्धि और पान के कारण अभिव्यक्त उल्लास, रस और आनन्द की दशाओं का विस्तार होने पर साधक योगी अपनी भरितावस्था की, अपने परिपूर्ण भैरव स्वरूप की भावना करे । ऐसा करने से वह साधक महानन्द से परिपूर्ण हो उठता है ।।१९९-२००।। १. मपि वर्तते-क. ग. । २. भावयेत्-ख. ने. ज. उ. । ३. जानन्-क. ।
- जग्धि, पान आदि पदों का अभिप्राय विज्ञानभैरव के भाषानुवाद में देखना चाहिये।
३८८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः परमप्रकृतमुपसंहरति— एतत् ते कथितं दिव्यं¹ संकेतत्रयमुत्तमम् ॥२००॥ स्पष्टम्² ॥२००॥ सर्वज्ञानोत्तमत्वादत्यन्तगोपनीयमित्याह— गोपनीयं प्रयत्नेन स्वगुह्यमिव सुव्रते । यथा स्वगुह्यं योनिं परपुरुषेभ्यो गोपायसि प्रयत्नेन, तथैतदपि³ संकेतत्रय- मनर्हेभ्यो गोपनीयमित्यर्थः ॥२०१॥ ननु ⁴केऽनर्हा येभ्यो गोपनीयमित्यत आह— चुम्बके ज्ञानलुब्धे च⁵ न प्रकाश्यं त्वयानघे ॥२०१॥ भक्तिहीनो⁶ऽनेकत्रासक्तस्तत्तत्तन्त्रान्तरेषु विद्यामात्रपाठी⁷ चुम्बकः। ज्ञान- लुब्धः विद्यासाधारणत्वात् काव्यनाटकादिविद्यावदत्रापि ज्ञानं सम्पाद्यमिति मन्वानः। अब परम प्रकृत ( प्रारम्भ में निर्दिष्ट ) विषय का उपसंहार करते हैं— इस तरह से इन तीन दिव्य और उत्तम संकेतों का मैंने तुम्हें उपदेश किया है ॥२००॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥२००॥ अब यह कहते हैं कि सभी ज्ञानों में उत्तम होने से इसको अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये— हे सुव्रते ! अपने गुह्य के समान इस ज्ञान को भी प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये जैसे तुम अपनी योनि को दूसरे पुरुषों से प्रयत्नपूर्वक छिपा कर रखती हो, उसी तरह से चक्रसंकेत, मन्त्रसंकेत और पूजासंकेत नामक इन तीन संकेतों को भी अयोग्य व्यक्तियों से छिपाकर रखना चाहिये ॥२०१॥ प्रश्न होता है कि वे अयोग्य कौन हैं ? जिनसे कि इन संकेतों में उपदिष्ट ज्ञान को छिपा कर रखना चाहिये ? उत्तर है— हे अनघे ! चुम्बक और ज्ञान के लोभी व्यक्ति को तुम्हें इनका प्रकाशन नहीं करना चाहिये ॥२०१॥ भक्तिभाव से रहित, अनेक गुरुओं के पास दौड़ लगाने वाला, सभी तन्त्रों में कुछ न कुछ दखल रखने की आदत वाला व्यक्ति चुम्बक कहलाता है। काव्य, नाटक आदि १. सर्वं-क. ग., देवि-उ. । २. स्पष्टमेतत्-ज. । ३. तथैदमपि-ख. ने. । ४. के के- उ. । ५. वा-ख. ने. छ. झ. । ६. नोऽन्यत्रासक्तः-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. तन्त्रवरेषु- ख. ने., तन्त्रेषु-क. ग., पाठान्तरम्-ख. ज., पाठकृत्-ने. उ. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८९ तयोर्द्वयोरपीदं रहस्यं त्वया न प्रकटीकरणीयमित्यर्थः ॥२०१॥ विध्यति¹क्रमणादन्यायो न करणीय इत्यत आह— अन्यायेन न दातव्यं नास्तिकानां महेश्वरि । विध्यतिक्रम एवान्यायः । नास्ति परलोक इति ये ²मन्यन्ते ³चुम्बका बौद्धा- दयः, ते नास्तिकाः । नन्वत्र को विधिरित्यत आह— एवं त्वयाऽहमाज्ञप्तो मदिच्छारूपया प्रभो ॥२०२॥ प्रभो ! जगत्प्रवृत्ति⁴नियमप्रभावशालिनि ! अत एव—"शक्त्या ⁵विना शिवे सूक्ष्मे⁶ नाम धाम न विद्यते" (४।७) इति चतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्या त्वया विनाऽहं किमपि कर्तुं ⁷न शक्तः, वक्तुं न समर्थः । तन्मदिच्छारूपया ममाऽखिलेश्वरस्याऽ- खिलागमशास्त्रवक्तुरिच्छारूपया ⁸विवक्षारूपयाऽनाश्रितकलया । आज्ञप्तः प्रेरितः । ज्ञानमेवमुक्तलक्षणं प्रोक्तवानस्मि । ⁹ततस्त्वदाज्ञैव विधिरित्यर्थः ॥२०२॥ की तरह तन्त्रशास्त्र को भी सामान्य विद्या मानकर इसका ज्ञान अर्जित करने वाला व्यक्ति ज्ञानलुब्ध कहलाता है। इन दोनों तरह के व्यक्तियों के सामने तुमको इस शास्त्र के रहस्य नहीं प्रकट करने चाहिये ॥२०१॥ अब शिव यह कहते हैं कि इस विधि का अतिक्रमण कर अन्याय न करे— हे महेश्वरि ! नास्तिकों को इस रहस्य ज्ञान का उपदेश कर अन्याय नहीं करना चाहिये ॥ विधि का अतिक्रमण ही यहाँ अन्याय कहलाता है। परलोक नहीं है, ऐसा मानने वाले चुम्बक बौद्ध आदि को नास्तिक कहा जाता है ॥ प्रश्न उठता है कि ऐसा हम क्यों करें ? इसका उत्तर है— हे स्वामिनि ! मेरी इच्छा शक्ति के रूप में प्रकट होकर तुमने ही मुझे ऐसा करने की आज्ञा दी है ॥२०२॥ 'प्रभो' यह संबोधन देवी के प्रति है, क्योंकि वह इस जगत् की सृष्टि और संहार को करने में समर्थ है। इसलिये चतुःशती शास्त्र (४।७) में बताया गया है—"शक्ति के बिना सूक्ष्म निराकार शिव में नाम और धाम (स्थान) की भी कल्पना नहीं की जा सकती।" इस तरह से तुम्हारे बिना मैं कुछ भी करने और कहने में असमर्थ हूँ। इसक। १. क्रमादन्यायेन न—क. ग. । २. मन्वते—ख. ज. झ. उ. । ३. 'चुम्बका' नास्ति— ख. ने. ज. झ. उ. । ४. प्रवृत्तिनिवृत्ति—ख. ने. उ. । ५. हीने—क. ग. । ६. शून्ये— क. ग. । ७. 'न शक्तः' नास्ति—ख. ने. झ. उ. । ८. 'विवक्षारूपया' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ९. 'ततः ····रित्यर्थः' नास्ति—ख. ने. ज. उ., अतो भवदाज्ञैव—झ. ।