योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यस्मदुक्तरीत्या सद्वितीयमद्य¹स्वीकारेणोल्लसिते मनसि, ²स्वतः प्राणा- पानयोः संचारे शान्ते, निरस्ते ³त्रित्वलक्षणे भेदे, शिवोऽहमस्मीति स्वान्तरो बलि- रित्यर्थः ॥ ॥१९८-१९९॥ ततः स्वैराचारपरो भूयादित्याह— ⁴नित्यं पिबन् वमन् खादन् स्वेच्छाचारपरः स्वयम् ॥१९९॥ अहन्तेदन्तयोरैक्यं भावयन् विहरेत् सुखम् । नित्यं प्रत्यहम्, पिबन् देवतागुरुनिवेदितशेषं हेतुम्, खादन् तच्छेषं खाद्यम्, वमन् द्वयमपीति सामर्थ्याल्लब्धम् । स्वेच्छाचारपरः यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् । तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं सम्प्रकाशते ॥ (श्लो० ७३) के साथ हेतु द्रव्य को बलि समर्पित करे । व्याख्याकार ने स्वयं अपने किसी ¹अन्य ग्रन्थ में कहा है— प्राण और अपान रूपी दोनों श्वासों का निरोध कर और ²तीनों कुण्डलिनियों का मेलन कर जो जीव और शिव में ऐक्यभाव स्थापित किया जाता है, इसी को आन्तर बलि कहा जाता है ॥ ऐसा करने से द्वितीय द्रव्य के साथ मद्य का प्रसाद ग्रहण करने के उपरान्त जब मन उल्लसित होता है, तो उस समय प्राण और अपान वायु का संचार स्वतः शान्त हो जाता है तथा माता, मान और मेय रूप त्रिपुटी का सारा प्रपंच भी समाप्त हो जाता है । उस समय मात्र 'मैं शिव हूँ' यह अनुभूति बची रहती है । इस अद्वयप्रतिष्ठात्मक अनुभूति का ही यहाँ आन्तर बलि के नाम से विवरण दिया गया है ॥१९८-१९९॥ इसके बाद साधक यथेच्छ आचरण कर सकता है— प्रतिदिन पीता हुआ, वमन करता हुआ, खाता हुआ साधक स्वयं स्वैराचारी हो जाय, अहन्ता और इदन्ता में एकता की भावना करता हुआ सुखपूर्वक विचरण करे ॥१९९-२००॥ प्रतिदिन देवता और गुरु को समर्पित हेतु द्रव्य के बचे भाग को पीता हुआ, बचे हुए खाद्य पदार्थ को खाता हुआ और दोनों को यथेच्छ वमन करता हुआ साधक स्वैरा- चार परायण हो जाय । विज्ञानभैरव भट्टारक ने बताया है— १. स्वीकारणोल्लासिते—ख. ने. झ. । २. अत एव—क. ग. ज. । ३. त्रितत्त्वल- ख. ने. । ४. पिवन्नित्यं—ने. च. छ. ज. झ. उ. । १. यह श्लोक भी व्याख्याकार के तत्त्वविमर्शिनी नामक ग्रन्थ का हो सकता है । २. तीनों कुण्डलिनी हैं—अधः कुण्डलिनी, मध्य कुण्डलिनी (श्लो० १३) और ऊर्ध्व कुण्डलिनी (श्लो० २७) ।