योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८५ योगिनीनां महादेवि बटुकायात्मरूपिणे ॥१९८॥ क्षेत्राणां पतये मह्यं बलिं कुर्वीत हेतुना । योगिनीनां पूर्वोक्त(२।३९)रीत्या मातृमानमेयमरोचीनाम्। आत्मरूपिणे परमानन्दस्पन्दरूपिणे बटुकाय। क्षेत्राणां पतये, क्षेत्राणि शरीराणि, तेषां पति- र्जीवात्मा, तस्मै। मह्यं मदहन्ताविष्टाय। हेतुना मद्येन सद्वितीयेन। बलिं कुर्वीत। श्वासद्वयनिरोधेन कुण्डलोत्रयमेलनात्। यज्जीवशिवयोरैक्यं तेनासावान्तरो बलिः॥ हे महादेवि ! योगिनियों के प्राणस्वरूप बटुकभैरव को और मुझ क्षेत्रपाल को इसके बाद हेतु द्रव्य से बलि देनी चाहिये ॥१९८-१९९॥ संवित्स्वरूपिणी भगवती की माता, मान और मेयमय किरणें ही पहले (२।७९) बताई गई पद्धति से योगिनियाँ¹ कहलाती हैं। इन योगिनियों के लिये परम आनन्द को स्पन्दित करते हैं भगवान् स्वात्मस्वरूप बटुकभैरव। क्षेत्र शरीर को कहते हैं। इनका पति है जीवात्मा। यह जीवात्मा मुझ शिव के साथ अहन्ता स्थापित किये हुए है, शिवाहन्ता से ओतप्रोत है। इस तरह से इन गुणों से अलंकृत बटुक और क्षेत्रपाल को द्वितीय द्रव्य १. मातृस्वरूपिणे-ख. ने. ज. झ. उ. ।
- अमृतानन्द ने यहाँ (पृ० ६-७, ११९, २११) योगिनी शब्द की चार तरह की व्याख्या की है। योगिनीहृदय शब्द की व्याख्या के प्रसंग (पृ० ६-७) में वे कहते हैं कि इस ग्रन्थ में योगिनी (स्वसंवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा) का हृदय (स्वरूप) उसी प्रकार प्रकट हुआ है, जैसे सामान्य जन के हृदय में अपना ज्ञान उन्मिषित होता है। यहाँ योग का अर्थ है जगत् की सारी वस्तुओं के साथ अपनी संवित् (ज्ञान) का समवाय (अविनाभाव) संबन्ध। इससे भासित होने वाली है योगिनी। दूसरी जगह (पृ० ११९) योगिनी और वीरशब्द की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं कि जिनका शिव के साथ योग, नित्य संपर्क बना रहता है, वे योगिनियाँ कहलाती हैं। ये हैं विमर्श शक्ति की अंशभूत इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों से अभिव्यक्त हुई भारती, पृथ्वी और रुद्राणी नामक शक्तियाँ। वीर पद का अर्थ पहले (१।६५) बता दिया गया है। प्रकाश की अंशभूत वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों से अभिव्यक्त सृष्टि-स्थिति-संहार कारक ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामक वीरों का उक्त भारती, पृथ्वी और रुद्राणी नामक योगिनियों से सदा संपर्क बना रहता है। तीसरी और चौथी व्याख्या वे इस तरह से करते हैं—माता, मान और मेय रूप संवित्तियाँ ही योगिनियाँ कहलाती हैं। उनके मेलन का अर्थ है उनको अन्तर्मुख बना कर परप्रमाता स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देना। अथवा ब्राह्मी प्रभृति के अष्टाष्टक स्वरूपों की उपासना के लिये सामयिक शक्तिचक्र को भी योगिनी नाम दिया जाता है। प्रस्तुत स्थल में योगिनी शब्द का तृतीय अर्थ गृहीत है।