योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७९ चक्रपूजां विशेषेण योगिनीनां समाचरेत् ॥१९२॥ "नित्यं सम्पूजयेद् देवीं सासनां सावृतिं क्रमात्" इति स्वच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रेषु १यद्यपि प्रतिदिनं पूजा विहिता, तथापि पुष्यभेन पुष्यनक्षत्रेण सह सौरे वारे, गुरो२रुदयव्याप्त्योर्दिने, स्वनक्षत्रे च, चतुर्दश्यष्टमीषु तिथिषु च, चक्रपूजां चतु- रस्रादिबैन्दवान्तचक्रगतानां देवतानां पूजां विशेषेण समाचरेत्। नित्यपूजा३वन्न भवति, किन्तु नैमित्तिकतया ४अष्टाष्टकादियोगिनीगणप्रीणनपुरःसरं पूजये- दित्यर्थः ॥१९१-१९२॥ ननु५ चक्रेऽष्टाष्टकपूजनं कथं संगच्छत इति शङ्कामपनुदन् विशेषपूजामेव विवृणोति— चतुःषष्टिर्यतः कोट्यो योगिनीनां महौजसाम् । चक्रमेतत् समाश्रित्य संस्थिता वीरवन्दिते ॥१९३॥ अष्टाष्टकं तु कर्तव्यं वित्तशाठ्यविवर्जितम् । ७त्रैलोक्यमोहनचक्रनिवासिनीनां ब्राह्म्यादीनामंशभूता अक्षोभ्याद्याश्चतुःषष्टि- नियों (शक्तियों) की पूजा विशेष रूप से करे ॥१९१-१९२॥ स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"आसन और आवरण देवताओं के साथ देवी की नित्य पूजा करे"। इस तरह से यद्यपि प्रतिदिन पूजा का विधान है, तो भी पुष्य नक्षत्र से संयुक्त रविवार के दिन, अपने गुरु के उदय (जन्म) और व्याप्ति (मरण) की तिथि में, अपने जन्म नक्षत्र के दिन और चतुर्दशी तथा अष्टमी तिथियों के आने पर चतु- रस्र से बैन्दव पर्यन्त चक्रों में विराजमान देवताओं की पूजा विशेष रूप से करनी चाहिये । नित्य पूजा की तरह इसका सामान्य अनुष्ठान न कर इन नैमित्तिक अवसरों पर विशेष पूजा का आयोजन करे । इसका अभिप्राय यह है कि अष्टाष्टक विधान द्वारा योगिनियों की पूर्ण तृप्ति के लिये विशेष पूजा का अनुष्ठान करे ॥१९१-१९२॥ श्रीचक्र में अष्टाष्टक पूजा की विधि कैसे संभव हो सकती है ? इस शंका का परि- हार करते हुए विशेष पूजा का विधान बताते हैं— हे वीरवन्दिते ! महाप्रभावशालिनी ६४ करोड़ योगिनियां इस चक्र में निवास करती हैं । अतः धन के लोभ को छोड़कर इस चक्र में अष्टाष्टक पूजा का अनु- ष्ठान करना चाहिये ॥१९३-१९४॥ १. 'यद्यपि' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । २. गुरुदय—ख. ने. ज. झ. ड. । ३. तु न—ख. ने. ज. झ. ड. । ४. 'अष्टाष्टकादियोगिनीनाम्' इत्येव—ख. ने. ज. ड. । ५. 'ननु'''' विवृणोति' नास्ति—ख. ने. ज. । ६. षष्टियुताः—क. ग. ड. । श्लोक एव नि० षो० (४।१७) इत्यत्रापि वर्तते । तत्रापि यत इत्येव पाठः । ७. 'त्रैलोक्यमोहन' नास्ति—ज. झ. ।