योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः योगिन्यः, तासां प्रत्येकमंशभूतानां कोटि१संख्याकानाम्, महौजसां महाप्रभाव- शालिनीनाम्, योगिनीनामुक्त(१।२, २।१७, २।७९) लक्षणानां मिलित्वा२ चतुः- षष्टिकोटयो यतश्चक्रमेतत् समाश्रित्य संस्थिताः । ३मध्यमभूगृहान्तश्चतुःषष्टि- कोटियोगिनीसमष्टिभूतानामक्षोभ्यादीनाम्, अष्टाष्टकम् अष्टकानामष्टकम्, वित्त- शाठ्यविवर्जितं स्वस्व४विभववञ्चनाहीनं यथा भवति तथा कर्तव्यम् । ५अत्र कृतिर्नाम ६पूजनक्रियायोगोऽभिप्रेतः ॥१९३-१९४॥ ननु तासां पूजने किमायातं ममेत्यत आह— त्वमेव तासां रूपेण क्रीडसे विश्वमोहिनि ॥१९४॥ त्रैलोक्यमोहन चक्र में निवास करने वाली ब्राह्मी आदि आठ योगिनियों की अंशभूत १अक्षोभ्या आदि चौसठ योगिनियाँ हैं । इनमें से भी प्रत्येक योगिनी के अंश से एक एक करोड़ योगिनियाँ निकलती हैं और इनकी संख्या ६४ करोड़ हो जाती है । ये योगिनियाँ महाप्रभावशालिनी हैं । योगिनियों का स्वरूप पहले (१।२, २।१७, २।७९) बताया जा चुका है । ये सब चौसठ करोड़ योगिनियाँ इसी श्रीचक्र में निवास करती हैं । यहाँ मध्य भूगृह में ६४ करोड़ योगिनियों का प्रतिनिधित्व करने वाली अक्षोभ्या प्रभृति ६४ योगिनियों की २अष्टाष्टक (आठ अष्टक) क्रम से पूजा करनी चाहिये । ऐसा करते समय अपने वैभव के अनुसार दिल खोल कर धन खर्च करना चाहिये, इसमें कंजूसी नहीं दिखानी चाहिये । यहाँ कृति (कर्तव्य) पद का संबन्ध पूजन क्रिया से जोड़ना अभिप्रेत है, अर्थात् अष्टाष्टक पूजा करते समय धन का संकोच नहीं करना चाहिये ॥१९३-१९४॥ प्रश्न उठता है कि ऐसा करने से मुझे क्या मिलेगा ? इसी का उत्तर देते हैं— सारे विश्व को मोहित करने वाली तुम ही इन योगिनियों के रूप में क्रीडा करती हो ॥१९४॥ १. कोटिकोटि—ख. ने. झ. । २. इत्युक्तत्वात्—ख. ने. ज. झ. ड. । ३. मध्यभू- गृहोदित—क. ग. उ. । ४. वित्त—क. ग. उ. । ५. 'अत्र कृतिर्नाम' नास्ति—ख. ज. । ६. यागपूजित—ख. ज. झ. । १. अक्षोभ्या आदि चौसठ योगिनियों के नाम प्रतिष्ठा लक्षणसारसमुच्चय (६।३२७- ३३५) में ब्रह्मयामल के प्रमाण से दिये गये हैं । २. अष्टाष्टक शब्द का अर्थ पृ०२११ की दूसरी टिप्पणी में दिया जा चुका है । ब्राह्मी आदि आठ योगिनियों तथा स्वच्छन्द आदि आठ भैरवों में से प्रत्येक के आठ आठ स्वरूप मिलकर इस अष्टाष्टक पद को सार्थक करते हैं । इन चौसठ युगल स्वरूपों की अर्चाविधि ही अष्टाष्टक पूजा कहलाती है ।