योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८१ प्रकाशात्मनो विश्वबोधकस्य ममांशभूता विमर्शरूपिणी त्वमेव बैन्दवचक्रगता, विश्वमोहिनी संसारित्वोपपादनकारिणी, तासां ब्राह्माद्यादीनामक्षोभ्यादीनां च रूपेण क्रीडसे, एका सती भगवतो परमार्थतोऽपि संदृश्यसे बहुविधा ननु नर्तकीव । (अ० स्त० १८) इत्यभियुक्तोक्तरीत्या तत्तद्रूपेण परिणमसे । अतस्त्वदंशभूतयोगिनीयजनेन त्वमेव प्रीणासीत्यर्थः ॥१९४॥ ननु व्युत्पत्तिबलादेवागमार्थमवगम्य तत्तत्तन्त्रोदितपूजादिषु प्रवृत्तिः स्यात् किं गुरूपदेशेनेत्याशङ्क्याह— अज्ञात्वा तु कुलाचारमयष्ट्वा गुरुपादुकाम् । योऽस्मिन् शास्त्रे प्रवर्तेत तं त्वं पीडयसि ध्रुवम् ॥१९५॥ स्वप्रकाशशिवमूर्तिरेकिका तद्विमर्शत नुरेकिका तयोः । सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः ॥ (चि०१) अपनी प्रकाशात्मकता के कारण सारे विश्व का बोध कराने वाले मुझ शिव की अंशभूत तुम विमर्शरूपिणी शक्ति हो । तुम ही बैन्दव चक्र में निवास करने वाली और सारे विश्व को मोह में डालकर इस संसार-चक्र को चलाने वाली हो । तुम ही ब्राह्मी प्रभृति और अक्षोभ्या प्रभृति योगिनियों के आठ और चौसठ स्वरूपों को धारण कर इस विश्व में क्रीडा करती हो । अम्बास्तवकार ने ठीक ही कहा है— भगवती परमार्थतः (वास्तव में) एक ही है । ऐसा होने पर भी नर्तकी (नटी) जैसे अभिनय करते समय अनेक रूप धारण करती है, उसी तरह से यह देवी भी हमारे सामने अनेक रूपों में प्रकट होती है ॥ इस प्रकार बैन्दव चक्रनिवासिनी भगवती त्रिपुरसुन्दरी ही इन योगिनियों के रूप में परिणत होती है । अतः तुम्हारी अंशभूत इन योगिनियों की पूजा करने पर यह तुम्हारी ही पूजा होती है, तुम ही इस पूजा से प्रसन्न होकर अपने भक्तों पर अनुग्रह करती हो, उनकी मनोकामना पूरी करती हो ॥१९४॥ यहाँ शंका उठती है कि शास्त्रीय व्युत्पत्ति के आधार पर आगमशास्त्र के अर्थ को जानकर उन उन तन्त्रों में बताई गई पूजाविधि का ज्ञान हो जायगा । ऐसी स्थिति में गुरु की क्या आवश्यकता है ? इसका समाधान करते हैं— कुलाचार को बिना जाने, गुरुपादुका की बिना पूजा किये, जो व्यक्ति इस शास्त्र में प्रवृत्त होता है, उसको तुम निश्चय ही पीडा पहुँचाती हो ॥१९५॥ १. श्यते—ख. ने. ज. झ. उ. । २. यसे—क. ज. ड. ।