योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः १इत्यस्मदुक्तरीत्या २त्रिधामगुरोः । “अविदित्वा कुलाचारं कुलं कौलिक- दर्शनम्” । तत्राचारः स्वच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रे विहितः, तं गुरुमुखाद्विज्ञाय योऽ- स्मिन् शास्त्रे प्रवर्तेत ३योऽस्मिन् ४साधने प्रवर्तेत, तदुक्तार्थचरणपरो भवेत्, तं चुम्बकं५ साधकाधमम्, त्वं६ डाकिनीक्रूरयोगिनीरूपेण साधकमांसमज्जादिशोष- णादिरूपेण पीडयसि गृह्णासि, ध्रुवं नात्र शङ्का। अतो गुरुमुखादेवा७खिलागमा- र्थानवगम्यास्मिन् शास्त्रे प्रवर्तितव्यम्, अन्यथा निष्फलं स्यादित्यर्थः ॥१९५॥ एवं ज्ञात्वा वरारोहे कौलाचारपरः सदा । आवयोः शबलाकारं ८मद्यं मांसं निवेद्य च ॥१९६॥ त्वत्प्रथाप्रसराकारैस्त्वामेव ९परिभावयेत् । स्वयं प्रकाशस्वरूप शिव की एक मूर्ति है और उसका विमर्शशक्तिमय दूसरा शरीर है। इन दोनों के सामरस्यमय शरीर से परा पादुका बनती है, जो कि परमशिव स्वरूप गुरु का देह है ॥ इस तरह से स्वयं व्याख्याकार ने अपने १चिद्विलास स्तव में गुरु के प्रकाश, विमर्श और सामरस्यमय तीन तेजस्वी स्वरूपों का वर्णन किया है। इस गुरु से कुलाचार, कुल और कौलिक दर्शन को बिना जानकारी प्राप्त किये किया गया सारा अनुष्ठान निष्फल हो जाता है। स्वच्छन्दसंग्रह प्रभृति शास्त्रों में कुलाचार का उपदेश किया गया है, किन्तु उसको गुरुमुख से जानकर ही इस शास्त्र में प्रवृत्त होना चाहिये। जो गुरुमुख से बिना जाने इस शास्त्र में विहित अनुष्ठान में प्रवृत्त होता है, वह चुम्बक है, अधम साधक है। ऐसे साधक को तुम डाकिनी, क्रूर योगिनी का स्वरूप धारण कर, उस साधक के मांस, मज्जा आदि धातुओं का शोषण कर, पीड़ा पहुँचाती हो, इसमें किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये। इसलिये गुरुमुख से ही समस्त आगमशास्त्र का अर्थ जानकर इस शास्त्र में प्रवृत्त होना चाहिये, अन्यथा सारे किये कराये पर पानी फिर जाता है ॥१९५॥ हे वरारोहे ! ऐसा जान कर कौलाचार का पालन करते हुए साधक को चाहिए कि वह शिव और शक्ति के शबलित आकार वाले मद्य और मांस को समर्पित कर विमर्श शक्ति के स्पन्दन से निकले सभी आकार एकमात्र तुम्हारे ही स्वरूप हैं, ऐसी भावना करे ॥१९६-१९७॥ १. इत्यभियुक्तोक्त-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. 'त्रिधाम' नास्ति-क. । ३. 'यः' नास्ति-क. ग. उ. । ४. शास्त्रे पूर्वोक्तपरमहितपरदेवतायजनपरमार्थसाधक- स्तुदु-क. ग. । ५. कसाधकं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. 'त्वं डाकिनीक्रूरयोगिनीरूपेण' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. । ७. खिलमप्यव-क. ग. । ८. मद्यं तत्र-क. ख. ग., देवि तच्च-च. छ. ज. झ., मद्यं तव-उ. । मद्यं मांसमिति दीपिकाव्याख्यातः पाठः । ९. स्त्वय्येव-ख. ने. छ. ज. झ. उ. । यह श्लोक पहले ही दो बार (पृ० ३४०, ३३६) उद्धृत हो चुका है ।