भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८३ वरारोहे "वरारोहा मत्तकाशिन्युत्तमा वरवर्णिनी" (अ० को० २।६।४) इति निघण्टुः । एवम् उक्तप्रकारेण, ज्ञात्वा गुरुमुखादेव। कौलाचारपरः, कौलिकाः पूर्वोक्त(३।१४४,१९१)लक्षणाः, तेषां विहिताः स्वच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रेष्वाचाराः, सदा तदनुष्ठानपरः । आवयोः प्रकाशविमर्शात्मनोः, शबलाकारम् “सुरा शक्तिः शिवो मांसमानन्दो मोक्ष उच्यते” इत्यभियुक्त^१वचनोक्तरीत्या सामरस्या- पादनरूपं तत्पूर्वोक्त(३।९८-१०३)रीत्या शोधितममृतीकृतं ^२मद्यं मांसं निवेद्य । आवयो^३रित्थेव योज्यम् । त्वत्प्रथाप्रसराकाराः । तव विमर्शशक्तेः, प्रथा स्पन्दः, तत्प्रसराः तदुद्भूताः, आकारा यासामावरणदेवतानाम्, तास्तथाविधाः, ^४त्वामेव त्वदन्यतो न ^५प्रथायाताः परिभावयेत्, वरारोहा, मत्तकाशिनी, उत्तमा और वरवर्णिनी—इन चार शब्दों का प्रयोग अमर- कोश में उत्कृष्ट गुणों वाली स्त्री के लिये किया गया है। भगवान् शिव यहाँ देवी को 'वरारोहे' कहकर संबोधित कर रहे हैं। कौलिक पद की व्याख्या पहले (३।१४४,१९१) की जा चुकी है। इनके आचारों का वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह^१ आदि शास्त्रों में किया गया है। ऊपर बताई गई विधि को गुरुमुख से जानकर कौलाचारपरायण साधक को चाहिये कि इन आचारों का सदा पालन करते हुये प्रकाश और विमर्श स्वरूप शिव और शक्ति के शबल आकार को, शिव और शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप को, अभिव्यक्त करने वाले मद्य और मांस को पूर्व प्रदर्शित (३।९८-१०३) अर्घ्यशोधन विधि से पवित्र, अमृतस्वरूप बना कर हम दोनों को समर्पित करे। किसी प्रामाणिक व्यक्ति के वचन के अनुसार—“सुरा शक्ति का, शिव मांस का और आनन्द मोक्ष का वाचक है”। तद नुसार 'आवयोः' पद की आवृत्ति कर पहले इसका संबन्ध मद्य और मांस से तथा बाद में शिव और शक्ति से जोड़ा जाता है, अर्थात् शिवशक्तिमय इन द्रव्यों को शिवशक्ति को ही समर्पित कर देना चाहिये। 'तत्प्रथाप्रसराकाराः' इस समस्त पद का अर्थ है—तुम्हारे, विमर्श शक्ति के स्पन्दन से जिन आकारों, आवरण देवताओं की उत्पत्ति हुई है, वे सब आकार। ये सब आकार तुम ही हो, तुमसे ये आकार अलग नहीं हैं, ऐसी भावना करनी चाहिये। सुभागोदयकार शिवानन्द मुनि ने कहा है— १. क्तोक्त- ज. उ. । २. 'मद्यं मांसं' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ३. योनियो- क. ग. । ४. त्वमेव-ज. ने. झ. उ. । ५. पृथग्भूताः-क. ग., पृथग्याताः-ख. ने. उ. । १. पहले (३।१९१) उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में संक्षेप में इन आचारों का उल्लेख हो चुका है।