योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः परमप्रकृतमुपसंहरति— एतत् ते कथितं दिव्यं¹ संकेतत्रयमुत्तमम् ॥२००॥ स्पष्टम्² ॥२००॥ सर्वज्ञानोत्तमत्वादत्यन्तगोपनीयमित्याह— गोपनीयं प्रयत्नेन स्वगुह्यमिव सुव्रते । यथा स्वगुह्यं योनिं परपुरुषेभ्यो गोपायसि प्रयत्नेन, तथैतदपि³ संकेतत्रय- मनर्हेभ्यो गोपनीयमित्यर्थः ॥२०१॥ ननु ⁴केऽनर्हा येभ्यो गोपनीयमित्यत आह— चुम्बके ज्ञानलुब्धे च⁵ न प्रकाश्यं त्वयानघे ॥२०१॥ भक्तिहीनो⁶ऽनेकत्रासक्तस्तत्तत्तन्त्रान्तरेषु विद्यामात्रपाठी⁷ चुम्बकः। ज्ञान- लुब्धः विद्यासाधारणत्वात् काव्यनाटकादिविद्यावदत्रापि ज्ञानं सम्पाद्यमिति मन्वानः। अब परम प्रकृत ( प्रारम्भ में निर्दिष्ट ) विषय का उपसंहार करते हैं— इस तरह से इन तीन दिव्य और उत्तम संकेतों का मैंने तुम्हें उपदेश किया है ॥२००॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥२००॥ अब यह कहते हैं कि सभी ज्ञानों में उत्तम होने से इसको अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये— हे सुव्रते ! अपने गुह्य के समान इस ज्ञान को भी प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये जैसे तुम अपनी योनि को दूसरे पुरुषों से प्रयत्नपूर्वक छिपा कर रखती हो, उसी तरह से चक्रसंकेत, मन्त्रसंकेत और पूजासंकेत नामक इन तीन संकेतों को भी अयोग्य व्यक्तियों से छिपाकर रखना चाहिये ॥२०१॥ प्रश्न होता है कि वे अयोग्य कौन हैं ? जिनसे कि इन संकेतों में उपदिष्ट ज्ञान को छिपा कर रखना चाहिये ? उत्तर है— हे अनघे ! चुम्बक और ज्ञान के लोभी व्यक्ति को तुम्हें इनका प्रकाशन नहीं करना चाहिये ॥२०१॥ भक्तिभाव से रहित, अनेक गुरुओं के पास दौड़ लगाने वाला, सभी तन्त्रों में कुछ न कुछ दखल रखने की आदत वाला व्यक्ति चुम्बक कहलाता है। काव्य, नाटक आदि १. सर्वं-क. ग., देवि-उ. । २. स्पष्टमेतत्-ज. । ३. तथैदमपि-ख. ने. । ४. के के- उ. । ५. वा-ख. ने. छ. झ. । ६. नोऽन्यत्रासक्तः-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. तन्त्रवरेषु- ख. ने., तन्त्रेषु-क. ग., पाठान्तरम्-ख. ज., पाठकृत्-ने. उ. ।