योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४१ ] छः अथवा आठ धातु अष्टांगहृदय¹ आदि आयुर्वेद के ग्रन्थों में रस, रक्त आदि सात धातुओं की चर्चा है। योगिनीहृदय (२।६०) की दीपिका में अष्टांगहृदय के इसी श्लोक को उद्धृत कर धातुओं और योगिनियों की संख्या सात बताई गई है, किन्तु आगे (३।३०) छः ही धातुदेवताओं का उल्लेख और व्याख्यान है। सेतुबन्धकार भास्करराय की व्याख्या भी दोनों स्थलों पर परस्पर विरुद्ध है। इसका समाधान हम पृ० १९० की टिप्पणी में कर चुके हैं। तदनुसार इस प्रकरण में धातुओं और धातुदेवता डाकिनियों की संख्या छः ही मानी जायगी। योगिनीहृदय में ही आगे (३।११४) योगिनी पद से ब्राह्मी आदि आठ देवियों का ग्रहण कर धातुओं की संख्या भी आठ मानी गई है। उक्त सात धातुओं के साथ क्रोध (ओज)² को जोड़ने पर धातुओं की संख्या आठ हो जाती है। इस संबन्ध में पृ० ३१० की टिप्पणी देखी जा सकती है। योगिनीहृदय और दीपिका में सर्वत्र रस के स्थान पर 'त्वक्' शब्द प्रयुक्त है। दीपिकाकार (३।११४) ने त्वक् का भ्रूमध्य से, रक्त का नितम्ब, मांस का नाभि, मेदा का हृदय, अस्थि का कण्ठ, मज्जा का मुख, शुक्र का नासापुट तथा क्रोध (ओज) का ललाट चक्र से संबन्ध बताया है। ऐसा करते समय उन्होंने इसके लिये कोई प्रमाण नहीं दिया। व्याकुलाक्षर ख. मातृका को छोड़ कर योगिनीहृदय अथवा दीपिका की अन्य किसी मातृका में व्याकुलाक्षर का प्रयोग नहीं मिलता, जब कि भास्करराय ने योगिनीहृदय के कुछ श्लोकों को ³व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखा हुआ माना है। तन्त्रराजतन्त्र तथा परमानन्दतन्त्र की टीका के पटल समाप्ति के सूचक पद्यों में व्याकुलाक्षर पद्धति का अनुसरण किया गया है। भास्करराय ने सेतुबन्ध (७।८३) में इस पद्धति को समझाने के लिये इस पद्य को उद्धृत किया है— देवतारथगोमूक इति यो वेत्ति न क्रमम्। स व्याकुलाक्षरे मूको देवतारथगोऽपि सन्॥ १. "रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः" (सूत्रस्थान, १।१८)। २. "सर्वेषामन्तःबहिष्करणानां यद् यदनुप्रविशति तत्तन्मध्यनाडोभुवि सर्वाङ्गानुप्राणन- सारायां प्राणात्मना चेतनरूपेणास्ते यदोज इति कथ्यते" (पृ० ४५-४६) परात्रिंशिका की व्याख्या में अभिनवगुप्त ने यह ओज का लक्षण दिया है। ३. हमें सुहृद्वर प० जनार्दन शास्त्री पाण्डेय ने सूचना दी है कि सं. सं. वि. वि. से प्रकाशित वेदविषयक ग्रन्थ 'बैठपरिभाषा' में भी व्याकुलाक्षर पद्धति का प्रयोग किया गया है।