योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याकुलाक्षर पद्धति से लिखे गये श्लोक के पादों में ऊपर बताये गये क्रम से अक्षरों का क्रम बदल दिया जाता है। इस क्रम को समझने के लिये भी भास्करराय ने ही १नाथनवरत्नमाला की अपनी स्वोपज्ञ टीका में दूसरा श्लोक दिया है— कटपयवर्गभवैरिह पिण्डान्त्यैरक्षरैरङ्काः । नेत्रे शून्यं ज्ञेयं तथा स्वरे केवले कथिते ॥ इस वचन के अनुसार क से ञ तक, ट से न तक के अक्षरों से एक से दस तक, प से म तक के अक्षरों से एक से पांच तक और य से क्ष तक के अक्षरों से एक से नौ संख्या का ग्रहण होगा। इस पद्धति से ऊपर के पहले श्लोक के दे से ८, व से ४, ता से ६, र से २, य से ७, गो से ३, मू से ५ और क सं १ संख्या गृहीत होगी। इस क्रम से श्लोकों के पादों को व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखने पर पहले पाद का आठवां, फिर चौथा, छठा, दूसरा, सातवां, तीसरा, पांचवां और अन्त में पहला अक्षर लिखा जायगा। जैसे कि सेतुबन्ध में ही आठवें विश्राम के १९९ वें श्लोक के प्रथम पाद को त्स्यं सं था द्यं म मां त म—इस तरह से व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखा गया है। आठवें अक्षर को पहले (म), चौथे अक्षर को दूसरे (द्यं), छठे अक्षर को तीसरे (मां), दूसरे अक्षर को चौथे (सं), सातवें अक्षर को पांचवें (त), तीसरे अक्षर को छठे (था), पाँचवें अक्षर को सातवें (म) और अन्त में पहले अक्षर को आठवें (त्स्यं) क्रम से लिखने पर व्याकुलाक्षर पाद का सही स्वरूप इस प्रकार बन जाता है—म द्यं मां सं त था म त्स्यं। अन्यत्र भी इसी तरह से व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखे गये वाक्यों का उद्धार कर उनका सही स्वरूप जाना जा सकता है। क्रम-व्युत्क्रम योगिनीहृदय और दीपिका में अनेक स्थानों पर किसी न किसी कारण से परम्परा प्राप्त क्रम बदल दिया गया है। जैसे कि श्लोक १८-१९ में रौद्री, ज्येष्ठा और वामा शक्ति के क्रम को बनाये रखने के लिये चतुष्कोण का पहले और अश्रिमिश्रय का पाठ बाद में किया गया है। इसी प्रकार "शाक्ते वह्नौ"२ ( २।२५ ) यह क्रम न होकर "वह्नौ शाक्ते" यह क्रम होना चाहिये। कामरूप आदि पीठों की योगिनीहृदय प्रतिपादित मन, अहंकार, बुद्धि और चित्तरूपता के प्रमाण में अपने ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय को उद्धृत करते समय दीपिकाकार ने वहाँ का क्रम बदल दिया है (पृ० ६१)। इसी तरह से योगिनी- हृदय की श्रीचक्र का सृष्टि प्रक्रिया को बनाये रखने के लिये दीपिकाकार ने सुभगोदय- १. यह ग्रन्थ अब श्रीगुरुनवरत्नमाला के नाम से स्वोपज्ञ व्याख्या के साथ पीताम्बरा पीठ, दतिया से प्रकाशित हो चुका है। २. भास्करराय ने यहाँ सङ्केतित पाठ को ही मान्यता दी है।